बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाये

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हिंदी की कमाई खाने वालों के लिए भवानी प्रसाद मिश्र की इस कविता में असरदार और यादगार संवाद की भाषा और शैली के सारे मंत्र छुपे हुए हैं। हिंदी दिवस पर और उसके बाद भी इसको अपनाने की कोशिश करें।
कलम अपनी साध
और मन की बात बिलकुल ठीक कह एकाध
यह कि तेरी-भर न हो तो कह,
और बहते बने सादे ढंग से तो बह.
जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख.
चीज़ ऐसी दे कि स्वाद सर चढ़ जाये
बीज ऐसा बो कि जिसकी बेल बन बढ़ जाये.
फल लगें ऐसे कि सुख रस, सार और समर्थ
प्राण-संचारी कि शोभा-भर न जिनका अर्थ.
– अमिताभ श्रीवास्तव की वॉल से

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