विशेष विवाह अधिनियम के तहत बढ़ रही शादियां, लेकिन बढ़ते तलाक के मामलों ने खड़े किए सवाल
लखनऊ: प्रदेश की राजधानी में विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत हर साल सैकड़ों प्रेमी जोड़े विवाह के बंधन में बंध रहे हैं। इनमें अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों की संख्या अधिक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2023 में 96, 2024 में 98 और 2025 के मार्च तक 26 शादियां इस अधिनियम के तहत अब तक संपन्न हो चुकी हैं। इस अधिनियम के तहत विवाह करने के लिए लड़का या लड़की में से किसी एक को उसी जिले का निवासी होना अनिवार्य है। शादी के लिए आवेदन देने के बाद एक महीने का नोटिस पीरियड दिया जाता है, जिसमें सभी कानूनी वेरिफिकेशन किए जाते हैं। यह सुनिश्चित किया जाता है कि दोनों पक्ष पहले से शादीशुदा न हों या यदि हों तो कानूनी रूप से तलाकशुदा । इस अधिनियम के तहत विवाह करने वाले जोड़ों में अधिकांश प्रेमी जोड़े होते हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसे जोड़े भी इस अधिनियम के तहत शादी कर रहे हैं जो बाद में पति या पत्नी को विदेश ले जाना चाहते हैं, या संपत्ति विवादों से बचने के लिए कानूनी रूप से मजबूत विवाह प्रमाणपत्र चाहते हैं।
जोड़ों को कानूनी सुरक्षा भी प्राप्त इस अधिनियम के तहत विवाह करने वाले जोड़ों को कानूनी सुरक्षा भी प्राप्त होती है। विशेष रूप से वे जोड़े जो अंतरजातीय या अंतरधार्मिक संबंध में होते हैं और परिवार या समाज के विरोध का सामना कर रहे होते हैं। लेकिन क्या यह शादियां टिक रही हैं?
यह अधिनियम प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों के लिए एक संजीवनी साबित हो रहा है, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी सामने आ रहा है। सिविल मामलों अधिवक्ता और विवाह अधिनियम के विशेषज्ञों का कहना है कि जल्दबाजी में की गई कई शादियां उतनी ही जल्दी टूट भी रही हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार एक वरिष्ठ अधिवक्ता सनी हैदरी के अनुसार, हर महीने तीन से चार तलाक के मामले उनके पास आ रहे हैं, जिनमे युवक – युवती ने जल्दबाजी में शादी तो कर ली लेकिन शादी के कुछ महीनों बाद ही रिश्ते में दरार आ गई। युवाओं में शादी का उत्साह तो बहुत होता है, लेकिन जैसे ही जिम्मेदारियां कंधों पर आती हैं, हकीकत सामने आ जाती है। कई मामलों में दो-चार महीनों के भीतर ही तलाक की नौबत आ जाती है। कुछ मामलों में तो शादी के बाद बच्चे भी हो गए और फिर तलाक के लिए अर्जी दाखिल करनी पड़ी, जिससे स्थिति और भी जटिल हो गई। क्या बढ़ाया जाए नोटिस पीरियड ?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि विशेष विवाह अधिनियम में एक महीने के नोटिस पीरियड को बढ़ाया जाना चाहिए, खासकर प्रेम विवाह के मामलों में। अगर प्रेमी जोड़ों को थोड़ा ज्यादा समय एक-दूसरे के साथ बिताने को मिलेगा तो उन्हें अपने रिश्ते की हकीकत का भी एहसास होगा। इसके अलावा, कुछ विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि सरकार को ऐसी शादियों पर कुछ वर्षों तक निगरानी रखनी चाहिए, ताकि विवाह को अधिक स्थायित्व मिल सके।
सरकार को उठाने होंगे ठोस कदम
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, विशेष विवाह अधिनियम ने अंतरजातीय और अंतरधार्मिक प्रेमी जोड़ों को कानूनी सुरक्षा तो दी है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि बढ़ते तलाक के मामलों को देखते हुए सरकार को इस पर ठोस कदम उठाने होंगे। सरकार को चाहिए कि तलाक की दर कम करने के लिए विवाह से पहले काउंसलिंग अनिवार्य करे, ताकि युवक-युवतियां शादी से पहले अपनी जिम्मेदारियों को सही से समझ सकें।
हमारे यहां प्राप्त सभी विवाह के आवेदनों पर एक माह की नोटिस जारी की जाती है। इस समय सीमा में जोड़ों के जरूरी वैरिफिकेशन वगैरह करा लिए जाते हैं। पुलिस जांच भी कराई जाती है। अगर कोई आपत्ति करता है तो उसके सत्यापन के बाद ही विवाह रजिस्टर्ड किया जाता है। इस अधिनियम के तहत विवाह के पहले ही जांच का नियम है न कि विवाह के रजिस्ट्रेशन होने के बाद। – राकेश बहादुर सिंह, एडीएम, ट्रांसगोमती
क्या है विशेष विवाह अधिनियम 1954:
विशेष विवाह अधिनियम, 1954, प्रेम विवाह करने वालों के लिए वाकई एक महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा प्रदान करता है। यह अधिनियम धर्म, जाति या समुदाय की सीमाओं से परे विवाह को मान्यता देता है, जिससे अंतरजातीय और अंतरधार्मिक जोड़ों को कानूनी सुरक्षा मिलती है। यह न केवल सामाजिक स्वतंत्रता को बढ़ावा देता है, बल्कि जोड़ों को सामाजिक दबावों से बचाने में भी मदद करता है। खासकर उन मामलों में जहां परिवार या समाज की सहमति नहीं होती, यह कानून एक संजीवनी की तरह काम करता है।
हालांकि, बढ़ते तलाक के मामले निश्चित रूप से चिंता का विषय हैं। विशेष विवाह अधिनियम के तहत होने वाले विवाहों में भी तलाक की दर में वृद्धि देखी जा रही है, जो कई सवाल खड़े करती है। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं:
सामाजिक दबाव और अपेक्षाएं: प्रेम विवाह में जोड़े अक्सर परिवार या समाज के विरोध का सामना करते हैं। विवाह के बाद भी यह दबाव बना रह सकता है, जो रिश्ते में तनाव पैदा करता है।
आधुनिक जीवनशैली: तेजी से बदलती जीवनशैली, करियर की प्राथमिकताएं, और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की चाहत ने वैवाहिक रिश्तों पर असर डाला है। प्रेम विवाह में जहां जोड़े पहले से एक-दूसरे को जानते हैं, वहीं कई बार अपेक्षाओं का टकराव भी तलाक का कारण बनता है।
कानूनी सहूलियत: विशेष विवाह अधिनियम और अन्य कानूनों ने तलाक की प्रक्रिया को पहले की तुलना में आसान बना दिया है। आपसी सहमति से तलाक या अपरिवर्तनीय टूटन जैसे आधारों ने जोड़ों को अलग होने का विकल्प दिया है, जिससे तलाक के मामले बढ़े हैं।
सामाजिक स्वीकार्यता: तलाक को लेकर समाज में पहले की तुलना में कम कलंक है। यह एक सकारात्मक बदलाव है, क्योंकि यह लोगों को अस्वस्थ रिश्तों से बाहर निकलने की आजादी देता है, लेकिन साथ ही यह तलाक की संख्या में वृद्धि का एक कारण भी है।
इन सबके बावजूद, यह कहना गलत होगा कि विशेष विवाह अधिनियम ही तलाक का कारण है। यह कानून तो जोड़ों को एकजुट होने का अवसर देता है, लेकिन रिश्ते को बनाए रखना व्यक्तिगत और सामाजिक कारकों पर निर्भर करता है। तलाक के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए जरूरी है कि समाज में वैवाहिक रिश्तों को मजबूत करने के लिए जागरूकता, परामर्श सेवाएं, और आपसी समझ को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही, प्रेम विवाह करने वालों को परिवार और समाज का समर्थन मिलना चाहिए, ताकि वे अपने रिश्ते को खुशी और स्थिरता के साथ जी सकें।







