प्रभु के दर्शन

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एक बड़ा ही धार्मिक व्यक्ति था। वह हमेशा सत्कर्मों में लीन रहता था। उसकी इच्छा थी कि एक दिन भगवान के दर्शन करे। उसके लिए वह बराबर प्रयत्न करता। साधु-संतों से उसका रास्ता पूछता।

संयोग से एक दिन उसकी भेंट एक कपटी आदमी से हो गई। वह साधु के वेश में था। उसने कहा, “अगर तू सचमुच ईश्वर के दर्शन करना चाहता है तो जो कुछ तेरे पास है, उसे बेच दे और पैसे लेकर मेरे साथ चल।”

वह भोला-भाला व्यक्ति उसकी बातों में आ गया। उसने अपना सब कुछ बेच डाला और पैसे लेकर उसके साथ चल दिया। चलते-चलते रास्ते में एक कुआं मिला। कपटी साधु ने कहा, “अपनी माया को यहां रख दे और इस कुएं में झांक, तुझे प्रभु के दर्शन हो जायेंगे।”

उस भक्त ने यही किया। रुपये वहीं रखकर कुएं पर गया और ज्यों ही झांका कि उस साधु ने उसको धक्का देकर कुएं में गिरा दिया। कुआं सूखा था। उस आदमी को जरा भी चोट नहीं आयी और अपनी सच्ची लगन के कारण उसे ईश्वर के दर्शन हो गये।

उधर साधु ज्योंही रुपये लेकर चला कि उसे एक सिपाही मिल गया। साधु ने अपने को छिपाने का प्रयत्न किया तो सिपाही ने उसे पकड़ लिया। मारे डर के साधु ने सारी बात कह दी।

सिपाही उसे लेकर कुएं पर आया और उस आदमी को निकालना चाहा, पर उसने इन्कार कर दिया। बोला, ” भगवान का रूप कितना आनंददायक है। मैं कृतार्थ हो गया। मैं बाहर नहीं आऊंगा।”
उसने कहा, “जिसने मुझे दुनिया की माया से छुटकारा दिलवाकर ईश्वर के दर्शन करा दिये, उसका मैं आभारी हूं। आप उसे छोड़ दो।” सिपाही ने उसे छोड़ दिया।

उस कपटी के मन पर इस घटना का इतना असर हुआ कि उसने छल-कपट का रास्ता छोड़ दिया और प्रभु की भक्ति करने लगा।

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