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    Shagun News India
    Home»बच्चों की दुनिया

    शत्रु की पहचान

    By December 13, 2017 बच्चों की दुनिया No Comments4 Mins Read
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    Post Views: 663

    जीके चक्रवर्ती

    वरगद के पेड़ पर एक चिडियाँ घोंसला बनाकर मजे से अपना दिन गुजार रही थी। एक दिन वह दाना पानी के चक्कर में एक किसान के अच्छी फसल वाले खेत में पहुंच गई। वहां पर उसे भरपूर खाने पीने को अन्न मिलने से उसने उस खेत में बहुत मौज मस्ती की और बहुत ही खुश हुई। उस खुशी को पाकर वह रात को घर वापस आना ही भूल गई फिर वह उसी खेत के पास एक पेड़ में अपना घोंसला बना कर वही पर रहने लगी उसके दिन मजे में वहीं पर बीतने लगे।

    उधर एक दिन शाम को एक खरगोश उस पेड़ के पास आया जहां उस चिड़िये का सुन्दर सा घोंसला था। वह घोसला पेड़ के विल्कुल नीचे वाली डाल पर बना था वह डाल जमींन से इतने नीचे झुका हुआ था कि कोई भी उस पर चढ़ सकता था घोसला जरा भी ऊंचा नहीं था। इसलिए खरगोश अपने दोनों टांगों पर खड़े हो कर उस घोंसलें में झांक कर देखा तो पता चला कि घोंसला खाली पड़ा है। घोंसला अच्छा खासा बड़ा था इतना बड़ा था कि वह खरगोश उसमे आराम से रह सकता था। उसे यह बना बनाया घोंसला बहुत भागया और उसने इसी में रहने का फैसला कर लिया।
    कुछ दिनों बाद उस चिड़िया को एक दिन उसे अपने घोंसलें की याद आई और वह अपने पुराने घर की ओर वापस लौटी । घोसले के पास पहुंच कर उसने देखा कि घोंसलें में तो एक खरगोश आराम से बैठा हुआ है। उसे बहुत गुस्सा आया, उसने जोर से खरगोश से कहा, ‘चोर कहीं के, मैं घर पर नहीं थी तो तुम मेरे घर को खाली पाकर मेरे घर में घुस गए हो? चलो निकलो मेरे घर से, तुम्हे जरा भी शर्म नहीं आई दूसरे के घर में रहते हुए?’
    खरगोश बहुत धैर्य पूर्वक शान्ति से कहने लगा, ‘कहां का तुम्हारा घर? कौन सा तुम्हारा घर? यह तो मेरा घर है। तुम क्या पागल हो गए हो। अरे! पेड़ कुआं तालाब और घर एक बार छोड़कर जब कोई जाता हैं तो वह उस पर से अपना हक भी गवां देता हैं। यहां तो जब तक हम हैं, तो यह मेरा अपना घर है। जब इसमें मै नहीं रहूंगा बाद में ईसमें कोई भी रह सकता है। अब यह घर मेरा है। बेकार में मुझे तंग मत करो अब मुझे आराम करने दो।
    खरगोश के मुहँ से इस तरह की बात सुन कर चिडिया आग बबूला होते हुए उससे कहने लगा, हम दोनों के ‘ऐसे बहस करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। चलो किसी ज्ञानी पण्डित के पास चलते हैं। वह जरूर हम दोनों के पक्ष में सही निर्णय करेगा वोह जिसके हक में फैसला सुनायेगा उसे यह घर उसी को मिल जाएगा।’
    यह कह कर दोनों उस जगह पर बहने वाली एक नदी के पास एक पेड़ के नीचे एक बड़ी सी बिल्ली रहती थी। वह बहुत धार्मिक पूजापाठ करते हुए नजर आया करती थी। वह दोनों आपस में झगड़ते हुए उस मोटी बिल्ली के पास अपना झगड़ा ले कर पहुंचे वैसे तो यह बिल्ली इन दोनों की जन्मजात दुश्मन है लेकिन वहां पर निकट में और कोई भी नहीं रहता था इसलिए उन दोनों ने उसी के पास जाना एवं उससे ही अपने लिए न्याय लेना उचित समझ कर सावधानी पूर्वक बिल्ली के निकट जा कर उन दोनों ने अपनी समस्या बताई।
    उन दोनों ने बिल्ली से कहा, ‘हमने अपनी उलझन तो आको बता दी, अब इसका हल क्या है? हम इसका जबाब आपसे सुनना चाहते हैं। जिसका कहना सही होगा उसे वह घोंसला मिल जाएगा और जो झूठा होगा उसे आप खा लेंना’ ‘अरे रे !! यह तुम दोनों कैसी बातें कर रहे हो, हिंसा जैसा बुरा काम और घोर पाप नहीं इस दुनिया में और कुछ नहीं है, दूसरों को मारने वाला खुद नरक में जाता है। मैं तुम्हें न्याय देने में तो मदद करूंगी लेकिन झूठे को खाने की बात है तो वह मुझसे नहीं हो पाएगा। ‘न बाबा न’ मैं एक बात तुम दोनों लोगों को कानों में कहना चाहती हूँ तुम दोनों जरा मेरे निकट आओ तो!!’
    खरगोश और चिडिया दोनों खुश हो गए कि अब तो फैसला हो कर रहेगा। और वे दोनों उसके बिलकुल करीब आ गए। फिर क्या था? करीब आते ही खरगोश को पंजे में पकड़ कर मुंह से चिडिया को बिल्ली ने देखते ही देखते नोंच लिया और दोनों के प्राण निकल गए। दोनों को खा पी कर काम तमाम कर दिया। अपने शत्रु को पहचानते हुए भी उस पर विश्वास करने से खरगोश और चिड़िया को अपनी जानें गवांनी पड़ीं।

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