खेत मुस्काते हैं, किसान और हल-बैल जब आते हैं!

0
709
  • विनायक राजहंस

खेत में हल जोतते किसान को देखकर यह गीत बरबस ही होंठों पर आ जाता है-
बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं,
गम कोसों दूर हो जाता है खुशियों के चमन मुस्काते हैं।

और आए भी क्यों ना, हल-बैल किसानों के जीवन साथी हैं। अच्छे हल और बैल की मदद से जो जोताई होती है, उससे उपज अच्छी होती है।

सुबह तड़के एक कंधे पर हल, दूसरे कंधे पर गमछा लिए और बैलों को हांकते खेतों की ओर जाते हुए किसान को देखना मन को भाता है। ‘हरदा हराई’ और ‘सांव चल’ जैसे शब्द समुच्चय का उच्चारण करते हुए वे जब खेत जोतते हैं तो दुनिया की सबसे खूबसूरत तस्वीर की निर्मिति करते हैं। आसमान में बदरा छाए हों और हल्की-हल्की बूंदें पड़ रही हों तो नजारा अद्भुत हो जाता है। अहा! क्या कहने!! ये नजारे आज भी देखे जा सकते हैं। जैसे कि मैं देख रहा हूं।

नजारे तो दुपहरिया में लंच के वक्त भी दिखते हैं। घर से आया हुआ चना चबेना या कलेवा जीमने जब किसान बैठता है तो असीम सुख पाता है। अथक परिश्रम के बाद जब रोटी का कौर मुंह में जाता है तो उसका स्वाद दैवीय होता है, तमाम थकान वैसे ही उतर जाती है।

किसान के लिए खेत में खाना अक्सर उसकी गोरी या छोरी ही लाती है। यह दिलचस्प संयोग होता है। इस दृश्य को तो सिनेमा ने बहुत सी फिल्मों में दिखाया है। खाना आने के बाद होरी कभी-कभी कह भी उठता है- “तनिक ठहरो, एक बांह और कर लें तो कलेवा पाएं।”

घर में गाय- बैल पालना संपन्नता की निशानी होती है। “मरजाद” भी बनी रहती है। गाय-बैल को नहलाने-धुलाने से लेकर खिलाने-पिलाने का हर काम बड़ी शिद्दत से किया जाता है। खासकर महिलाएं और बच्चे मवेशियों की देखभाल में मदद करते हैं।

खेती और पशुपालन एक-दूसरे के पूरक हैं। लेकिन अब पशुपालन धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। हल-बैल की जगह ट्रैक्टर ले रहे हैं। हालांकि कृषि यंत्रों के इस युग में भी बहुत से किसान ट्रैक्टर के बजाए पारंपरिक हल-बैल के माध्यम से ही खेतों की जुताई करना बेहतर समझते हैं। उन्हें हल-बैल के साथ खेतों में उतरना खुशी का अहसास दिलाता है। खेत भी बना रहता है।

कभी खेत में जुताई करते वक्त किसान आंचलिक गीत भी गाते थे। अब ये गीत तो सुनाई नहीं देते पर किसान और बैल के सामंजस्य का गीत खेत जरूर गा रहा होता है। हम उस सुन नहीं सकते, पर महसूस जरूर कर सकते हैं। किसान और हल-बैल की जोड़ी सृष्टि की सबसे खूबसूरत जोड़ी है।

परंपरागत खेती में बैलों से जुताई, मोट और रहट से सिंचाई और बैलगाड़ी के जरिये फसलों व अनाज की ढुलाई भी की जाती थी। खेत से खलिहान तक, खलिहान से घर तक और घर से बाजार तक किसान बैलगाड़ियों से अनाज ढोते थे। आज बैलगाड़ियां लुप्तप्राय हो गई हैं।

खेत और बैल का रिश्ता भी धीरे-धीरे टूट रहा है। गाय-बैल और मनुष्य के आपसी स्नेह और प्रेम के बंधन खुलते जा रहे हैं। हालांकि इस रिश्ते की तमाम कहानियां अब भी सुनी सुनाई जाती हैं। प्रेमचंद की बेहद चर्चित कहानी ‘दो बैलों की कथा’ कौन भूल सकता है भला! बैल के प्रति किसान के मन में और किसान के प्रति बैल के मन की जो संवेदनशीलता इस कहानी में चित्रित है, अन्यत्र दुर्लभ है। पर अफसोस! खूंटे अब यादों में ही गड़े रह गए हैं।

हालांकि, देश के जाने-माने पत्रकार भारत डोगरा कहते हैं कि आज बिजली और ऊर्जा के संकट के दौर में खेती में पशु ऊर्जा के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बैलों की जुताई से उत्तम खेती आज भी की जा सकती है, कई किसान कर भी रहे हैं।

आज पशुपालन कम होता जा रहा है। लेकिन ऊर्जा संकट, बिजली संकट और मानव श्रम की बहुलता के मद्देनजर हमें टिकाऊ खेती की ओर बढ़ना पड़ेगा और इसमें पशु ऊर्जा की अहम भूमिका हो सकती है।

पशु शक्ति के बारे में कई विशेषज्ञ व वैज्ञानिक भी यह मानने लगे हैं कि यह सबसे सस्ता व व्यावहारिक स्रोत है। मशीनीकरण से ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ेगी, जो आज दुनिया में सबसे चिंता का विषय है। हल और बैल इस चिंता को काफी हद तक खत्म कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here