जैसा अन्न वैसा मन

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एक राजा था। वह साधु-संतों का बड़ा प्रेमी और भक्त था। सब प्रकार से आदरसत्कार करता था। अपने राज-दरबार में उन्हें ऊंचा स्थान देता था। एक बार वह एक संत का दर्शन करने गया। अपने साथ भांति-भांति के व्यंजन बनवा कर ले गया। इन व्यंजनों में मालपुआ भी थे। संत के पास पहुंचकर राजा ने भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और थोड़ी देर बातचीत करने के बाद व्यंजन निकालकर उनके सामने रख दिये।

उन्होंने आग्रह किया, “स्वामीजी, इन्हें ग्रहण करके कृतार्थ कीजिये।” किंतु संत ने खाना तो दूर उन्हें छुने से भी इन्कार कर दिया। राजा ने बारबार प्रार्थना की, लेकिन संत टस-से-मस न हुए। राजा को बड़ी निराशा हुई। उसका सारा उत्साह भंग हो गया। हैरान होकर उसने पूछा, “महाराज, आखिर बात क्या है ?”

संत ने एक साथ कोई उत्तर नहीं दिया। राजा के बार-बार पूछने पर संत उठे और उन्होंने व्यंजनों में से एक मालपुआ उठाया।

राजा की खुशी का ठिकाना न रहा। अंत में संत ने उसके अनुनय को स्वीकार कर ही लिया। परंतु संत ने जो कुछ किया, उसे देख राजा चकित हो गया। संत ने मालपुए को खाया नहीं। पास में रखे दर्पण पर रगड़ दिया। बोले, “लो, इसे देखो।’

राजा ने दर्पण हाथ में ले लिया। वह धुंधला हो गया था। उसमें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। क्षण भर रुककर संत ने अपनी रूखी-सूखी बाटी उठाई और राजा के हाथ से दर्पण लेकर उसे उस पर वैसे ही रगड़ दिया, जैसे मालपुए को रगड़ा था। फिर उसे राजा की ओर बढ़ाकर कहा, “लो, अब देखो।” राजा ने शीशे को हाथ में लेकर देखा, वह एकदम साफ हो गया था।

संत धीरे-से बोले, “राजन, तुम्हारे मालपुए ने इस दर्पण को धुंधला कर दिया था। उसी तरह तुम्हारे व्यंजन भी हमारे मन को धूमिल कर देंगे। याद रखो, जिस तरह धुंधले दर्पण में मुंह दिखाई नहीं दिया, उस तरह धुंधले मन से ईश्वर का दर्शन नहीं किया जा सकता। तुम्हारे व्यंजन से हमारी रूखी-सूखी रोटी ही अच्छी है, जो मन के मैल को दूर कर देती है और ईश्वर के चरणों में लौ लगा देती है।” राजा को अब आगे कुछ भी कहने को बाकी नहीं रह गया था।

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