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    ऊँचे-ऊँचे मकान और दुकानें हों बड़ी-बड़ी, उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता

    ShagunBy ShagunMarch 17, 2024 साहित्य No Comments2 Mins Read
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    Post Views: 4,350

    मुझे उतनी दूर मत ब्याहना
    जहाँ मुझसे मिलने जाने ख़ातिर
    घर की बकरियाँ बेचनी पड़े तुम्हे
    मत ब्याहना उस देश में
    जहाँ आदमी से ज़्यादा
    ईश्वर बसते हों
    जंगल नदी पहाड़ नहीं हों जहाँ
    वहाँ मत कर आना मेरा लगन
    वहाँ तो कतई नही
    जहाँ की सड़कों पर
    मान से भी ज़्यादा तेज़ दौड़ती हों मोटर-गाडियाँ
    ऊँचे-ऊँचे मकान
    और दुकानें हों बड़ी-बड़ी
    उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
    उस घर से मत जोड़ना मेरा रिश्ता
    जिस घर में बड़ा-सा खुला आँगन न हो
    मुर्गे की बाँग पर जहाँ होती ना हो सुबह
    और शाम पिछवाडे से जहाँ
    पहाडी पर डूबता सूरज ना दिखे ।
    मत चुनना ऐसा वर
    जो पोचाई[1] और हंडिया में
    डूबा रहता हो अक्सर
    काहिल निकम्मा हो
    माहिर हो मेले से लड़कियाँ उड़ा ले जाने में
    ऐसा वर मत चुनना मेरी ख़ातिर
    जो बात-बात में बात करे लाठी-डंडे की
    कोई थारी लोटा तो नहीं
    कि बाद में जब चाहूँगी बदल लूँगी
    अच्छा-ख़राब होने पर
    जो बात-बात में
    बात करे लाठी-डंडे की
    निकाले तीर-धनुष कुल्हाडी
    जब चाहे चला जाए बंगाल, आसाम, कश्मीर
    ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे
    और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ
    जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया
    फसलें नहीं उगाई जिन हाथों ने
    जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ
    किसी का बोझ नही उठाया
    और तो और
    जो हाथ लिखना नहीं जानता हो “ह” से हाथ
    उसके हाथ में मत देना कभी मेरा हाथ
    महुआ का लट और खजूर का गुड़
    ब्याहना तो वहाँ ब्याहना
    जहाँ सुबह जाकर
    शाम को लौट सको पैदल
    मैं कभी दुःख में रोऊँ इस घाट
    तो उस घाट नदी में स्नान करते तुम
    सुनकर आ सको मेरा करुण विलाप…..
    महुआ का लट और
    खजूर का गुड़ बनाकर भेज सकूँ सन्देश
    तुम्हारी ख़ातिर
    उधर से आते-जाते किसी के हाथ
    भेज सकूँ कद्दू-कोहडा, खेखसा[2], बरबट्टी[3],
    समय-समय पर गोगो के लिए भी
    मेला हाट जाते-जाते
    मेला हाट जाते-जाते
    मिल सके कोई अपना जो
    बता सके घर-गाँव का हाल-चाल
    चितकबरी गैया के ब्याने की ख़बर
    दे सके जो कोई उधर से गुजरते
    ऐसी जगह में ब्याहना मुझे
    उस देश ब्याहना
    जहाँ ईश्वर कम आदमी ज़्यादा रहते हों
    बकरी और शेर
    एक घाट पर पानी पीते हों जहाँ
    वहीं ब्याहना मुझे!
    – निर्मला पुतुल 

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