अच्छे दिनों में बुरे दिन..

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दशकों पहले अतीत के अच्छे दिनों में बुरे दिनों के लिए सुरक्षित किया गया था ये धन
हम समझते थे कि महफूज रहेगी ये रक़म
 इतना बुरा वक्त कभी नहीं आ सकता ..
 इतनी बुरे दिन कैसे आ सकते है !
लेकिन कमाल है !
 अच्छे दिनो मे बुरे दिन आ गये
हम जिसे अच्छा वक़्त मान रहे थे वही वक्त बेहद बुरे वक़्त का अहसास कराने लगा
ये निधि(रक़म) सबसे बद्तर वक्त के लिए ही होती है
हम आखें बंद करके अच्छे दिनों को महसूस कर रहे थे
 हमारे पैरों के नीचे से सामान्य दिन भी खिसक गये
और बद्तर दिनों की पथरीली ज़मीन तैयार हो गयी
 जिसपर बेरोजगारी के कांटे हैं
 मुफलिसी की तपिश है
और मंहगाई की पथरीली राह है..
कब तक डेट पर टहला- टहला कर छलने का छल चलेगा
 कितने दिन तक झूठा सौंदर्य आकर्षित करता रहेगा
कामुकता और भावुकता से कितने दिनो तक जज़्बातों का ऊफान पैदा करके अपनी कश्ती पार करते रहोगे!
सुहाग रात तो आयेगी ही, और पता चल जायेगा कि झूठ के सौंदर्य के पीछे एक थर्ड जेंडर छिपा बैठा है.
– नवेद शिकोह

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