अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा भारत पर 25% अतिरिक्त टैरिफ और इसे बढ़ाकर 50% करने की धमकी ने वैश्विक व्यापार और कूटनीति में एक नया तनाव पैदा कर दिया है। ट्रम्प का दावा है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध को वित्तीय सहायता दे रहा है, जिसे वे अमेरिकी हितों के लिए खतरा मानते हैं। हालांकि, यह दावा सतही नजर आता है, क्योंकि तथ्य और वैश्विक व्यापार की गतिशीलता कुछ और ही कहानी बयां करती है। यह संपादकीय ट्रम्प की नीति के पीछे के वास्तविक कारणों की पड़ताल करता है, जो रूसी तेल खरीद से कहीं अधिक जटिल और गहरे हैं।
रूसी तेल: बहाना या हकीकत?
ट्रम्प ने भारत पर रूसी तेल खरीदने का आरोप लगाते हुए कहा है कि भारत इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊंचे दामों पर बेचकर मुनाफा कमा रहा है और यूक्रेन में रूसी युद्ध मशीन को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दे रहा है। लेकिन तथ्य इस दावे की पोल खोलते हैं:
चीन बड़ा खरीदार, फिर भी कम टैरिफ:
आंकड़े बताते हैं कि रूस से तेल खरीदने में चीन हम भारत के लोगों से कहीं आगे है। भारत रूस से प्रतिदिन 1.7 से 2.2 मिलियन बैरल तेल आयात करता है, जो उसकी कुल तेल खपत का लगभग 37% है। लेकिन वहीं, चीन रूस से और भी ज्यादा तेल आयात करता है। फिर भी, ट्रम्प ने चीन पर केवल 30% टैरिफ लगाया, जबकि भारत पर 50% टैरिफ की धमकी दी। यह दोहरा मापदंड सवाल उठाता है कि क्या रूसी तेल वास्तव में मुख्य मुद्दा है?
अमेरिका का रूस के साथ व्यापार:
ट्रम्प भारत पर रूस के साथ व्यापार करने का आरोप लगा रहे हैं, लेकिन अमेरिका स्वयं रूस से यूरेनियम और अन्य सामग्री आयात करता है। 2024 में अमेरिका और रूस के बीच 30 हजार करोड़ रुपये से अधिक का व्यापार हुआ। अगर रूसी व्यापार इतना ही आपत्तिजनक है, तो अमेरिका स्वयं इस पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाता?
रूसी तेल पर प्रतिबंध का मिथक:
ट्रम्प और पश्चिमी मीडिया यह दावा करते हैं कि रूस से तेल खरीदना प्रतिबंधों का उल्लंघन है। लेकिन वास्तव में, जी7 और यूरोपीय संघ ने रूसी तेल पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया है, बल्कि एक ‘प्राइस लिमिट’ व्यवस्था लागू की है। भारत इस सीमा के भीतर ही तेल खरीदता है, जिसका मतलब है कि वह कोई नियम नहीं तोड़ रहा।
असली कारण क्या हैं?
ट्रम्प की भारत विरोधी नीति के पीछे रूसी तेल केवल एक दिखावटी बहाना प्रतीत होता है। असली कारणों को समझने के लिए हमें व्यापार, भू-राजनीति और अमेरिकी घरेलू राजनीति की गहरी पड़ताल करनी होगी:
अमेरिकी व्यापार घाटा और बाजार पहुंच:
ट्रम्प का कहना है कि भारत के साथ अमेरिका का व्यापार असंतुलित है। भारत अमेरिका से अधिक निर्यात करता है, लेकिन अमेरिकी उत्पादों, खासकर कृषि और डेयरी उत्पादों, को भारतीय बाजार में पर्याप्त पहुंच नहीं मिल रही। ट्रम्प भारत से मांग कर रहे हैं कि वह अमेरिकी कृषि और डेयरी उत्पादों पर टैरिफ कम करे, ताकि अमेरिकी उत्पादों को भारत जैसे विशाल बाजार में प्रवेश मिल सके। भारत की ओर से इस मांग की अनदेखी ट्रम्प की नाराजगी का एक बड़ा कारण है।
डॉलर का प्रभुत्व और ब्रिक्स चुनौती:
ट्रम्प की नीति का एक गहरा कारण अमेरिकी डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को बनाए रखने की कोशिश है। भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे ब्रिक्स देश वैकल्पिक मुद्रा और व्यापार तंत्र विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जो डॉलर पर निर्भरता को कम कर सकता है। यह अमेरिका के लिए एक बड़ा खतरा है, क्योंकि डॉलर की वैश्विक स्थिति उसकी आर्थिक और भू-राजनीतिक शक्ति का आधार है। ट्रम्प की भारत, ब्राजील और अन्य ब्रिक्स देशों पर टैरिफ धमकियां इस संदर्भ में देखी जा सकती हैं।
भारत की बढ़ती वैश्विक साख:
भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और वैश्विक मंच पर बढ़ता प्रभाव भी ट्रम्प को खटक रहा है। भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध में तटस्थ रुख अपनाया है और शांति की वकालत की है, जो अमेरिका की अपेक्षाओं के विपरीत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक मंच पर भारत के आर्थिक हितों की रक्षा पर जोर दिया है, जिसे ट्रम्प अमेरिकी हितों की अनदेखी के रूप में देखते हैं।
अमेरिकी घरेलू राजनीति:
ट्रम्प की नीति का एक बड़ा हिस्सा उनकी घरेलू राजनीति से प्रेरित है। अमेरिका में कृषि और डेयरी लॉबी बहुत शक्तिशाली है। ये लॉबीज भारत जैसे बड़े बाजारों में अपने उत्पादों की पहुंच बढ़ाने के लिए दबाव डाल रही हैं। ट्रम्प का भारत पर सख्त रुख उनकी घरेलू समर्थक लॉबी को खुश करने और 2024 के चुनावों में अपनी स्थिति मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
चीन के प्रति नरम रुख:
ट्रम्प का चीन के प्रति अपेक्षाकृत नरम रवैया भी सवाल उठाता है। चीन रूस से भारत से अधिक तेल खरीदता है, फिर भी उस पर केवल 30% टैरिफ लगाया गया। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने कूटनीतिक रूप से ट्रम्प के साथ बेहतर तालमेल बनाया है, जिसके कारण उसे कम सख्ती का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, चीन के साथ अमेरिका का व्यापारिक रिश्ता इतना बड़ा है कि ट्रम्प शायद उसे पूरी तरह नाराज करने से बच रहे हैं।
भारत की प्रतिक्रिया और भविष्य :
भारत ने ट्रम्प के टैरिफ को “अनुचित और दुर्भाग्यपूर्ण” करार दिया है और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए उचित कदम उठाने की बात कही है। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा, क्योंकि यह उसकी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए जरूरी है। कुछ सरकारी रिफाइनरियों ने रूस से तेल खरीद अस्थायी रूप से कम की है, लेकिन यह फैसला छूट कम होने के कारण लिया गया, न कि अमेरिकी दबाव के कारण।
भारत की स्वतंत्र नीति और ब्रिक्स जैसे मंचों पर उसकी सक्रियता ने उसे वैश्विक मंच पर एक मजबूत स्थिति दी है। ट्रम्प की धमकियों के बावजूद, भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों से समझौता नहीं करेगा। यह तनाव भारत-अमेरिका संबंधों के लिए एक चुनौती है, लेकिन यह भारत को वैकल्पिक व्यापारिक साझेदारियों (जैसे मध्य-पूर्व और अफ्रीका) और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने का अवसर भी देता है।
ट्रम्प की भारत पर टैरिफ नीति रूसी तेल खरीद से ज्यादा गहरे भू-राजनीतिक और आर्थिक कारणों से प्रेरित है। यह नीति अमेरिकी व्यापार घाटे को कम करने, डॉलर के प्रभुत्व को बचाने, और घरेलू लॉबी को संतुष्ट करने की कोशिश का हिस्सा है। रूसी तेल केवल एक सुविधाजनक बहाना है, जिसका उपयोग भारत पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। भारत को इस स्थिति में अपनी स्वतंत्र नीति को बनाए रखते हुए कूटनीतिक और आर्थिक रणनीति के साथ जवाब देना होगा। वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती साख और ब्रिक्स जैसे मंच इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।







