नेता जी लोगन क लागल बा बाजार

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देख-देख आज नेता जी लोगन क लागल बा बाजार,
चाल चरित्तर सब काल्ही तक रहुए,
आज त सब हो गईल बा तार-तार।
अरब-खरब में लागत बा बोली,
बीच क दलाल भी पावत बा कई हजार।
आज ना केहुक कवनो दल बा,
ना केहुक बा आज कवनो विचार।
आज जे फेंक दिही जेतना अधिका,
ओहिसे नेता जी क लिहें प्यार।
जवन पार्टी देखाई अधिका रुपया,
ओहिक बनी जाई ईंहां सरकार।
अगुआ भी सब बंद कईले बाड़न होटल में,
कि कहीं से न पड़ जाव नेता जी के गला म़े हार।
पार्टी क नीति, चाल, चरित्तर त ढोंग रहे सब,
तोहरा के ठगे के खातिर।
खादी में छुपल रहे दिल क चोरवा,
दिमाग क ई पहिले से ही बा बड़ा शातिर।।
फिर ई आई अगिला बारी कवनों पार्टी ले के,
आंसू बहा के खूब जताई तोहरा से प्यार।
एक बार बा अरब-खरब क खेल,
एही से तोहरो पर फूंक दे ला दो-चार हजार।
देश भले जात चूल्हे भाड़ में,
नेता जी क त बा खाली पइसे से प्यार।।

  • उपेन्द्र नाथ राय “घुमंतू”

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