बसंत क भउजी

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बसंत में ढेर गम क बात ना होखे। काहें कि मौसम ही गुदरावे ला, खिल-खिलावेला। बहुत लोग क गम वाली कविता पर फोन आ गईल। एहिसे आपन गम के कम कईके बसंत जवन कि भउजी लोग के समर्पित होला। हमहूँ आपन समर्पण करी देहनी। अब हमार समर्पण केइसन बा, इ त आप सब जानी।

बसंत क भउजी

सरसो में फुलवा आई गईले,
केराय (मटर) खेतवा में गदराई गईले।
भउजी निकल बाड़ी रोड पर,
भइया घरवे में भुलाई गइले।
आखिर अब आइल बा बसंत,
केतना रहस भउजी अपना मरदा क साथे।
घरवे में बिता दींहे समइया,
त देवरा नाही लागी उनका हाथे।
होठवा पर चमकत लाली लगा के,
चलल बाड़ी रोड पर चाल बना के,
खेतवा क डाड़ें चलतड़ी भउजी,
खुद ही मटर क नीयर गदरा के।।
भउजी क ठुमकत चाल देखी के,
सरसों क फुलवा खुद के भुलाई गइले।
भउजी क रूपवा पर उहो इतरा गईले।
चांद क टुकड़ा जइसे खिलल बाड़ी भउजी,
सरसो क फूल छोड़ भंवरा भउजी पर आ गईले।

  • उपेंद्र नाथ राय ‘घुमन्तु’

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