उपेंद्र राय
बिहार, भारत के उन राज्यों में से एक है, जहां राजनीति न केवल सत्ता का खेल है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन का एक जटिल मंच भी। 2025 के विधानसभा चुनाव, जो दीपावली और छठ पूजा के बीच अक्टूबर-नवंबर में प्रस्तावित हैं, न केवल बिहार की दिशा तय करेंगे, बल्कि देश की राजनीति पर भी गहरा प्रभाव डालेंगे। यह चुनाव एक बार फिर बिहार को ‘सब्जबाग’ (खोखले वादों) के जाल से बाहर निकालने की चुनौती पेश करता है, जहां विकास, रोजगार, और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे मतदाताओं के सामने होंगे।
बिहार का सियासी रंगमंच
बिहार की सियासत हमेशा से गठबंधनों, पाला बदल, और जातीय समीकरणों की जटिल गणित पर टिकी रही है। इस बार भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए), जिसमें जनता दल (यूनाइटेड), भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) शामिल हैं, और महागठबंधन, जिसमें राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), कांग्रेस, और वाम दल हैं, के बीच कांटे की टक्कर होने की संभावना है। इसके अलावा, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी और आम आदमी पार्टी (एएपी) के मैदान में उतरने से मुकाबला और रोचक हो गया है।
चिराग पासवान के विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चा और नीतीश कुमार के नेतृत्व पर बीजेपी के भीतर असहमति जैसे घटनाक्रम सियासी तापमान को और बढ़ा रहे हैं। तेजस्वी यादव, जो युवा वोटरों के बीच लोकप्रिय हैं, रोजगार और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर एनडीए को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, प्रशांत किशोर बिहार को ‘पिछड़ेपन’ से बाहर निकालने का नारा दे रहे हैं, जो युवाओं और मध्यम वर्ग को आकर्षित कर सकता है।
मतदान: लोकतंत्र का उत्सव या उदासीनता का शिकार?
चुनाव, लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है, लेकिन बिहार सहित पूरे देश में मतदान प्रतिशत का लगातार गिरना चिंता का विषय है। 2020 के विधानसभा चुनाव में बिहार में लगभग 57% मतदान हुआ था, जो राष्ट्रीय औसत से कम है। खासकर युवा वोटरों की उदासीनता एक गंभीर चुनौती है। सोशल मीडिया और डिजिटल युग में युवा तो जागरूक हैं, लेकिन उनकी यह जागरूकता मतदान केंद्रों तक कम ही पहुंचती है।
इसके पीछे कई कारण हैं। पहला, राजनीतिक दलों के खोखले वादे और ‘सब्जबाग’ दिखाने की प्रवृत्ति, जिससे मतदाताओं का भरोसा टूटता है। दूसरा, रोजगार, शिक्षा, और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर ठोस प्रगति का अभाव। तीसरा, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में मतदान सुविधाओं की कमी और जागरूकता अभियानों का प्रभावहीन होना। चुनाव आयोग ने इस बार मतदाता सूची को अपडेट करने, नए वोटरों को जोड़ने, और डिजिटल डैशबोर्ड जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन क्या ये कदम युवाओं को बूथ तक ला पाएंगे, यह एक बड़ा सवाल है।
बिहार की चुनौतियां और मतदाताओं की अपेक्षाएं
बिहार के सामने कई गंभीर चुनौतियां हैं, जो इस चुनाव में प्रमुख मुद्दे बन सकते हैं:
- रोजगार और पलायन: बिहार से हर साल लाखों युवा रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों में पलायन करते हैं। तेजस्वी यादव ने 2020 में ’10 लाख नौकरियों’ का वादा किया था, जो अब भी चर्चा में है। एनडीए को इस मोर्चे पर ठोस जवाब देना होगा।
- शिक्षा और स्वास्थ्य: बिहार के सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति दयनीय है। शिक्षा सुधार और स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करना मतदाताओं की प्राथमिकता में है।
- जातीय समीकरण बनाम विकास: बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण अभी भी हावी हैं, लेकिन युवा और शहरी मतदाता विकास-केंद्रित राजनीति की मांग कर रहे हैं।
- महिला सशक्तिकरण: ‘माई बहिन मान योजना’ जैसे कदमों से महिला वोटरों को लुभाने की कोशिश हो रही है, लेकिन इन योजनाओं की विश्वसनीयता सवालों के घेरे में है।
- बुनियादी ढांचा: सड़क, बिजली, और पानी की स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है।
सपनों से हकीकत की ओर
बिहार के मतदाताओं को बार-बार सब्जबाग दिखाए गए हैं। हर चुनाव में बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद उन वादों का क्या होता है, यह बिहार की जनता अच्छी तरह जानती है। इस बार मतदाताओं, खासकर युवाओं, को यह तय करना होगा कि वे खोखले नारों पर भरोसा करेंगे या ठोस नीतियों और नेतृत्व को प्राथमिकता देंगे।
प्रशांत किशोर जैसे नए चेहरे और एएपी जैसे नए दल बिहार की सियासत में बदलाव का दावा कर रहे हैं। लेकिन क्या वे एनडीए और महागठबंधन जैसे स्थापित गठबंधनों को चुनौती दे पाएंगे? क्या बिहार की जनता इस बार ‘सब्जबाग’ के जाल से बाहर निकलकर विकास और प्रगति की राह चुनेगी? यह सवाल न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025: क्या बीजेपी के आगे दम भरेंगीं अन्य पार्टियां
बिहार विधानसभा चुनाव 2025, जो अक्टूबर-नवंबर में प्रस्तावित है, एक बार फिर सियासी रणक्षेत्र बनने जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा है, जिसमें जेडीयू, लोजपा (रामविलास), और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा शामिल हैं। दूसरी ओर, महागठबंधन में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), कांग्रेस, और वाम दल हैं, जबकि आम आदमी पार्टी (एएपी) और प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी स्वतंत्र रूप से मैदान में हैं। बीजेपी की रणनीति, जिसमें जातिगत समीकरण, नीतीश के प्रति सहानुभूति, और प्रवासी मतदाताओं पर फोकस शामिल है, उसे मजबूत बनाती है। लेकिन क्या विपक्षी दल बीजेपी के इस दबदबे को चुनौती दे पाएंगे? आइए, संक्षेप में देखें।
अन्य पार्टियों की स्थिति और चुनौतियां
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी):
तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी 2020 में 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, लेकिन सरकार बनाने से चूक गई। इस बार रोजगार, सामाजिक न्याय, और ‘माई बहिन मान योजना’ जैसे वादों के सहारे वह युवा और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रही है। हालांकि, महागठबंधन में कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे पर तनाव और 2020 में चिराग पासवान द्वारा वोट काटने जैसी स्थिति से बचना उनकी चुनौती है।
कांग्रेस:
कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा है, लेकिन उसका प्रदर्शन कमजोर रहा है। 2020 में 70 सीटों पर लड़कर केवल 19 जीत सकी। ‘माई बहिन मान योजना’ पर आरजेडी के साथ मतभेद और गठबंधन धर्म का पालन न करने जैसे मुद्दे उसकी स्थिति को कमजोर करते हैं। फिर भी, रोजगार और सामाजिक मुद्दों पर प्रदर्शन के जरिए वह अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
जनता दल (यूनाइटेड):
नीतीश कुमार की जेडीयू, बीजेपी की सहयोगी, 2020 में केवल 43 सीटें जीत सकी थी, क्योंकि चिराग पासवान ने उनके वोट काटे। इस बार एनडीए में सीट बंटवारे में जेडीयू को 102-103 सीटें मिलने की संभावना है। नीतीश की सहानुभूति और जातिगत समीकरण उनकी ताकत हैं, लेकिन बीजेपी के भीतर नीतीश के नेतृत्व पर असहमति एक चुनौती है।
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास):
चिराग पासवान ने 2025 में सभी 243 सीटों पर लड़ने का ऐलान कर एनडीए में हलचल मचा दी है, हालांकि सूत्रों के अनुसार उन्हें 25-28 सीटें मिल सकती हैं। उनकी युवा और दलित चेहरे की छवि बीजेपी के लिए तेजस्वी के खिलाफ जवाबी रणनीति हो सकती है, लेकिन जेडीयू के साथ तनाव उनकी राह मुश्किल कर सकता है।
आम आदमी पार्टी (एएपी):
एएपी ने सभी सीटों पर अकेले लड़ने का फैसला किया है। सौरभ भारद्वाज ने बीजेपी और कांग्रेस को ‘नूरा-कुश्ती’ करार देकर क्षेत्रीय दलों के प्रति हमलावर रुख अपनाया है। दिल्ली मॉडल को बिहार में लागू करने का वादा उनकी ताकत है, लेकिन बिहार में सीमित संगठनात्मक ढांचा उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है।
जन सुराज पार्टी:
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी विकास और ‘पिछड़ेपन’ से मुक्ति के नारे के साथ मैदान में है। कुछ सर्वे, जैसे कि BNJ, उन्हें 102 सीटों के साथ आगे दिखा रहे हैं, लेकिन यह दावा संदिग्ध है। उनकी ताकत युवा और मध्यम वर्ग के बीच अपील है, लेकिन स्थापित दलों के सामने संगठन और संसाधन की कमी उनकी राह में रोड़ा है।
बीजेपी की मजबूत स्थिति
बीजेपी ने बिहार में अपनी रणनीति को मजबूत किया है। वह हरियाणा जैसे राज्यों में बिहारी प्रवासी मतदाताओं को लुभाने के लिए छठ पूजा जैसे आयोजनों का सहारा ले रही है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और जातिगत समीकरणों पर जोर, साथ ही नीतीश के प्रति सहानुभूति, उसे फायदा पहुंचा सकता है। 2020 में 74 सीटें जीतने के बाद, 2024 के उपचुनावों में उसने अपनी ताकत बढ़ाकर 80 विधायक कर लिए हैं। एनडीए का अनुकूल माहौल और सीट बंटवारे की रणनीति उसे मजबूत बनाती है।
बीजेपी और एनडीए की संगठनात्मक ताकत, संसाधन, और रणनीति उन्हें बिहार में मजबूत स्थिति में रखती है। आरजेडी और कांग्रेस के नेतृत्व वाला महागठबंधन तेजस्वी की लोकप्रियता और सामाजिक न्याय के मुद्दों के सहारे चुनौती दे सकता है, लेकिन आंतरिक मतभेद और कमजोर स्ट्राइक रेट उनकी राह मुश्किल करते हैं। एएपी और जन सुराज जैसे नए खिलाड़ी त्रिकोणीय मुकाबला बना सकते हैं, लेकिन उनकी सीमित पहुंच और संसाधन बीजेपी के दबदबे को तोड़ने में नाकافی दिखते हैं। बिहार का मतदाता इस बार क्या फैसला लेता है, यह आने वाला समय बताएगा, लेकिन फिलहाल बीजेपी के आगे अन्य दलों को अपनी रणनीति और एकजुटता को और मजबूत करने की जरूरत है।
2025 का बिहार विधानसभा चुनाव एक कांटे की टक्कर तो होगा ही, साथ ही यह बिहार के भविष्य को आकार देने का अवसर भी है। मतदाताओं, खासकर युवाओं, को चाहिए कि वे इस लोकतांत्रिक उत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और अपने वोट की ताकत से बिहार को सब्जबाग से हकीकत की ओर ले जाएं। चुनाव आयोग को भी चाहिए कि वह त्योहारों के बीच सुचारु और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करे, ताकि हर मतदाता का विश्वास लोकतंत्र पर बना रहे। आखिरकार, बिहार का भविष्य उसी के हाथों में है, जो मतदान केंद्र तक पहुंचकर अपने मत का प्रयोग करता है।







