बिहार में पदोन्नति में आरक्षण का आदेश लागू, तो यूपी ने क्यों साधा है मौन
लखनऊ, 23 जुलाई 2018: आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति, उप्र का कहना कि भारत सरकार द्वारा जारी आदेश के क्रम में बिहार सरकार द्वारा पदोन्नति में आरक्षण का आदेश जारी किये जाने से एक बात तो स्पष्ट हो गयी है कि किसी भी राज्य सरकार की मंशा यदि ठीक है तो वह अपने दलित कार्मिकों को उनका संवैधानिक हक देने के लिये आगे रहती है। लेकिन वहीं दूसरी ओर पदोन्नति में आरक्षण का कानून उप्र की सरकार के लिये क्यों उच्च प्राथमिकता का विषय नहीं है। जबकि पिछली सरकार में 2 लाख से ज्यादा दलित कार्मिक पदों व वरिष्ठता में रिवर्ट किये गये, उस समय भी केन्द्र में मोदी जी की ही सरकार थी।
समिति ने कहा कि यदि केन्द्र सरकार द्वारा उस समय लोकसभा में लम्बित पदोन्नति में आरक्षण बिल पास कर दिया गया होता तो स्वतः दलित कार्मिक रिवर्शन से बच जाते। लेकिन जिस प्रकार से बाबा साहब के नाम पर मोदी सरकार बड़ी बड़ी बातें करती है और जब बाबा साहब द्वारा बनायी गयी व्यवस्था के तहत दलितों कार्मिकों को उनका संवैधानिक हक देने की बात आती है तो सरकार चुप्पी साध लेती है।
इस मौके पर आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति, उप्र के संयोजक अवधेश कुमार वर्मा, केबी राम, डा. रामशब्द जैसवारा, आरपी केन, अजय कुमार, श्याम लाल, अन्जनी कुमार, पीएम प्रभाकर, एसपी सिंह ने एक सयुंक्त बयान में कहा कि वास्तव में यदि यूपी की सरकार दलित कार्मिकों की हितैषी है तो वह अविलम्ब आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 3(7) को 15-11-1997 से बहाल कर बिहार सरकार की तरह दलित कार्मिकों को पदोन्नति में आरक्षण का लाभ दे।
उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा आदेश पारित होने के बाद उप्र सरकार के किसी भी अधिकृत प्रतिनिधि द्वारा कभी भी दलित कार्मिकों के लिये पदोन्नति में आरक्षण का कानून भारत सरकार के आदेश के क्रम में बनाने की बात नहीं की गयी। जिससे पूरी तरह सिद्ध हो रहा है कि उप्र की सरकार को दलित कार्मिकों से कोई लेना देना नहीं है।







