आने वाले समय मे कुछ भी हो सकता है लेकिन आज हमें यह कहना पड़ता है कि मानवता और मानव संस्कृति को प्रभावित करने वाला यह आपदा जहां एक तरफ पूरी दुनिया के लाखों लोगों को अपने चंगुल में लेकर लाखों की संख्या में लोगों की प्राणों की आहुति ली वहीं समाज के लोगों के मध्य एक व्याकुलता, चिंताओं से भरा व्यथित ह्रदय छोड़ गया है। समाज के लोगो को अनेकों तरह की असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा हैं लेकिन वहीं पर हम सभी लोगों को अपने रोजमर्रे के कुछ आचार-विचार, खान-पान में घोर परिवर्तन लाने की ओर सचेत कर अपने दिनचर्या एवं आचार विचारों में बदलाव लाने के लिये हमें विवष भी कर दिया है।
इस वायरस की वजह से विशेषकर हमारे पड़ोसी देश चीन को तो मजबूर कर ही दिया है कि उसे अब सपने खान-पान की व्यवहारों में आमूलचूल परिवर्तन लाना पड़ेगा इसके साथ ही साथ हम भारत के लोगों को भी अपने रोजमर्रे के दिनचर्या में स्वास्थ्य के प्रति सावधानी बरतने के लिए मजबूर होने के साथ ही साथ सचेत एवं जागरुक रहना पड़ेगा।
यदि हम आज से 50 से 60 दशकों के पूर्व काल की बात करें तो हमे यह स्पष्ट दिखाई देगा कि अधिकतर परिवारों में हमारे घरों के बड़े बुजुर्गों को यह कहते और स्वमं करते हुये सहजता से देख सकते थे कि बाहर से आने के बाद व्यक्ति अपने हाथ-मुहँ को साफ एवं शीतल जल से धो कर ही अपने घर मे प्रवेश करते थे और उसके बाद खाना खाने से पहले साबुन से हाथ मुहँ, और कुल्ला कर दाँतो को अच्छी तरह अवश्य धोते थे, यह वह दौर हुआ करता जिस वख्त साबुन का चलन न के बराबर हुआ करता था क्यूंकि साबुन बहुत महंगी वस्तु हुआ करती थी इसलिये सीमित घरों में ही इसका प्रयोग हुआ करता था, उन दिनों एक ही साबुन “सनलाइट” से लोग अपने कपड़े और नहाने के लिये इस्तेमाल किया करते थे।
सुसंस्कृत परिवारों के लोग खाना खाने और घर की महिलाएं खाना बनाने से पहले रेहू मिट्टी या केवल मिट्टी से दोनों हाथ के पंजों को आपस मे रगड़ कर स्वच्छ पानी से हाथ धोने के बाद मुहं में स्वछ जल भर कर अच्छी तरह से कुल्ला करके ही खाना खाते या बनाते थे।
आज इस वायरस की महिमा से वह सारे पुराने पड़ चुके संस्कार व क्रिया कलापों को अपनाने के लिये मजबूर हुये हैं। आज हम मनुष्यों को फिर से एक बार अपनी आदतें और क्रिया-कलापों को फिर से एक बार बदलना पड़ेगा। इसी को कहते हैं कि समय अपने आप को दोहराता है। चलो कम से कम इस वाइरस की वजह से ही दुनिया के लोगों को विशेषकर हम भारतवासियों को पुनः अपने पुरातन स्वास्थ व्यवस्था को अपने रोज मर्रे की जिंदगी में अपनाने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है।
जहां आज इसकी जरूरत महशूस की जाने लगी है। क्यूंकि जान है तो जहांन है और वहीं वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गैजशन की माने तो यह कॅरोना वायरस एक दम निर्मूल हो कर समाप्त नही हो पाऐगा ऐसे में इसका कुछ न कुछ अंश अवशेष इससे प्रभावित लोगों के शरीर मे बचा रहेगा जो समय समय पर दूसरे लोगों कभी भी अपने चपेट में ले सकता है ऐसे में इस वायरस से संक्रमित होने से अपने आप को बचाने के लिये हमेशा लोगों को स्वयं ही सावधनिया वर्तनी पड़ेगी। इस तरह कहा जाये तो हमारे मानव समाज के अनेको तरह के संस्कारें और आचारविचार के साथ ही अपने दिनचर्या को बदलने के लिये हमे मजबूर होना पड़ेगा।
- प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती







