डॉ दिलीप अग्निहोत्री
संविधान निर्माता डॉ आंबेडकर को न्यायिक व्यवस्था पर बहुत विश्वास था। संविधान में उल्लखित संवैधानिक उपचारों के अधिकार को उन्होंने सर्वश्रेष्ठ बताया था। न्यायिक निर्णय से असहमति की दशा में विशेष प्रावधान किए गए। उन्होंने कभी यह नही सोचा होगा कि न्यायिक निर्णय के विरोध में हिंसक प्रदर्शन होगा।जिस निर्णय के विरोध में हिंसक आंदोलन हुआ, वैसा ही मायावती ने बतौर मुख्यमंत्री ने भी लागू करने का प्रयास किया था। लेकिन तब ऐसा आंदोलन नहीं किया गया। ये बात अलग है कि बाद में मायावती सरकार का निर्णय निरस्त कर दिया गया था। क्योंकि इसमें तकनीकी गड़बड़ी थी। राज्य सरकार को ऐसा आदेश पारित करने का अधिकार नहीं था। दूसरा उदाहरण भी आज बसपा की सहयोगी सपा से संबंधित है। प्रमोशन में आरक्षण समाप्त करने का आदेश पर सपा सरकार ने बड़ी मुस्तैदी से अमल किया था। तब भी इस प्रकार का हिंसक आंदोलन नही हुआ था। मतलब साफ है। इस बार मंशा केवल एक्ट में सुधार के विरोध तक सीमित नहीं थी। बल्कि नरेंद्र मोदी की सरकार के विरोधियों ने इस आंदोलन में घुस कर अराजकता उतपन्न की।
ऐसे अराजक आंदोलन ने कई अन्य तथ्य भी उजागर किये है। बहुत संभव है कि इसमें शामिल हुए असमाजिक तत्व ही डॉ आंबेडकर की मूर्तियां तोड़ने का गुनाह कर रहे है। यह सत्ता पक्ष और सरकार को बदनाम करने का प्रयास हो सकता है।
जबकि नरेंद्र मोदी की सरकार ने दलित समुदाय की आर्थिक उन्नति के लिए विशेष प्रयास किये है। प्रधानमंत्री आवास योजना, मुद्रा बैंक, उज्ज्वला योजना आदि के तहत बड़ी संख्या में दलित लाभान्वित हुए है। यह सही है कि सरकारी नौकरी कम हो रही है। यह तो तीन दशक पहले अपनाई गई नीति का परिणाम है। वैश्वीकरण और उदारीकरण ने स्थिति बदली है। इसके लिए मोदी सरकार को दोष देना ठीक नहीं है। यूपीए सरकार को तो दस वर्ष तक सपा, बसपा का समर्थन था। उस समय प्रमोशन में आरक्षण पर रोक लगी, सरकारी नौकरी कम हुई, निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने के विषय मे सोचा तक नहीं गया। सपा ने खुला ऐलान किया था कि वह प्रमोशन में आरक्षण बहाल करने के प्रस्ताव का विरोध करेगी। तब सपा और बसपा की दुश्मनी थी। आज दोनों में दोस्ती की बात चल रही है। इसमें भी इस आंदोलन ने पेंच उतपन्न कर दिया है। सपा समर्थक इस एक्ट के विरोध करते रहे है। लेकिन बसपा की नजर में आज वह दलित हितैषी और भाजपा दलित विरोधी हो गई है। ऐसी राजनीति से केवल नेताओं का भला हो सकता है। समाज को इससे कोई लाभ नहीं होगा। अब ऐसे कहा जा रहा है जैसे पूरी स्थिति के लिए नरेंद्र मोदी दोषी है।

दिल्ली में डॉ आंबेडकर सेंट्रल का शिलान्यास अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने किया था। यूपीए सरकार के दस वर्ष में वहां कुछ नहीं हुआ। बसपा उसका समर्थन कर रही थी। लेकिन एक बार भी उसके निर्माण के लिए दबाब नहीं बनाया गया। इस आंबेडकर सेंट्रल का निर्माण नरेंद्र मोदी ने कराया। लंदन के उस घर को स्मारक बनवाया, जहाँ डॉ आंबेडकर रहे थे। इसी प्रकार उनके जन्म स्थान और मुम्बई इंदु मिल में स्मारक निर्माण भी मोदी ने कराया।
कितना अजीब है कि दलितों के हित और डॉ. आम्बेडकर के सम्मान में कार्य करने वाली सरकार पर हमला हो रहा है। यह भी कहा गया कि सरकार अराजकता रोकने में विफल रही। ऐसे आंदोलनों को ज्यादा सख्ती से रोका जा सकता है। लेकिन तब इसे दलितों पर सरकार के हमले के रूप में प्रचारित किया जाता।
ऐसे आंदोलन केवल सरकार का विरोध नहीं करते, बल्कि इनसे समाज का भी नुकसान होता है। दलित एक्ट के तहत सर्वाधिक मुकदमे पिछड़े वर्ग के लोगों के खिलाफ बताए जा रहे है। जाहिर है ऐसे आंदोलनों से पिछड़ा वर्ग, सवर्ण और शांति अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले दलित भी आहत है। हिन्दू धर्म में किसी को मूर्ति पूजा के लिए आज तक विवश नहीं किया गया। इसमें तो मूर्तिपूजा के विरोधी और नास्तिकों को भी हिन्दू माना गया। ऐसे में आंदोलन के दौरान देवी देवताओं की मूर्तियों के प्रति पशुवत व्यवहार करना क्या दर्शाता है। नाराजगी यदि सरकार और कोर्ट से थी, तब मंदिर कहा से आ गए।
लेकिन सरकार को जांच करानी चाहिए। ये वही विध्वंशक होंगे जो डॉ आंबेडकर की मूर्ति तोड़ते है। अवसर मिला तो आंदोलन में घुस कर मंदिरों को नुकसान पहुचाया। यह भारतीय समाज के प्रति गहरी साजिश हो सकती है। दलित समुदाय को ऐसे तत्वों की असलियत समझनी होगी। यह दलितों के हिमायती नहीं है। भारतीय समाज को बांटना और कमजोर करना इनका मकसद है। बाद में इनका दलितों से भी लड़ना आसान हो जाएगा।
ऐसे आंदोलन का समर्थन करने वाले अयोध्या मंदिर पर न्यायपालिका का निर्णय मानने का ऐलान करते है। इसमें संदेह नहीं कि इस आंदोलन का अराजक और समाजविरोधी तत्वों ने लाभ उठाया, भारत का दलित समाज इस प्रकार के प्रदर्शन पर विश्वास नही करता। उनकी संविधान में आस्था है। डॉ आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था, यह अहिंसावादी धर्म है।
सुप्रीम कोर्ट ने एसटी/एससी एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी। लेकिन प्रारंभिक तहकीकात के बाद गिरफ्तारी पर रोक नही लगाई गई। मतलब दोषी को छोड़ना नहीं और निर्दोष को छेड़ना नहीं की व्यवस्था तो रहेगी। यह एक्ट डॉ आंबेडकर ने नहीं बनाया था। वह चाहते थे कि दलितों का उत्पीड़न न हो, उन्हें बराबरी का दर्जा प्राप्त हो। इसी के साथ वह दलित समाज को स्वाभिमानी भी बनाना चाहते थे। इसके अनुरूप कानून बनाये गए। समय के अनुरूप उनमें बदलाव की जरूरत होती है। फिर भी दलित समुदाय की अपनी कोई कठिनाई हो सकती है। इसका उन्हीं को अनुभव होता है। इसलिए उन्हें अपने विचार रखने का अधिकार है। लेकिन यह सब संविधान के दायरे में होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल के फैसले में एससी/एसटी एक्ट के तहत तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा थी और अग्रिम जमानत को मंजूरी देने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था इस एक्ट के अंतर्गत मामलों में तुरंत गिरफ्तारी के बजाय पुलिस को दिनों की जांच के बाद उसके आधार पर एक्शन लेना होगा। वहीं सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी उच्च अधिकारी के स्तर की मंजूरी के बिना नहीं हो सकेगी। गैर सरकारी कर्मचारी को गिरफ्तार करने के मामले में एसएसपी की मंजूरी लेना अनिवार्य होगा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद दलित संगठनों का कहना है कि इस तरह के बदलाव से दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार को बढ़ावा मिलेगा।
1989 के अनुसूचित जाति जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम का हवाला देते हुए दलित संगठनों ने कहा कि अगर मामले में अग्रिम जमानत दी जाएगी तो अपराधी के बचने की संभावना भी बढ़ जाएगी। यह ऐसा विषय नहीं था, जिसका समाधान संभव नहीं था। लेकिन इसके लिए कुछ धैर्य रखने की आवश्यकता थी। सरकार इससे संबंधित सभी पहलुओं पर विचार कर रही थी। सैकड़ों की संख्या में उत्पीड़न के आरोप गलत साबित हुए थे। ऐसे में पिछड़ा और सवर्ण वर्ग की भावनाओं का भी ध्यान रखना था। यह भी सच है कि दलितों के साथ भेदभाव होता है। इसको रोकने के लिए कारगर कानून की आवश्यकता है। यथास्थिति बनाये रखने की जिद ठीक नहीं थी। डॉ आंबेडकर स्वयं सुधारवादी थे। समय के साथ बदलाव के हिमायती थे। लेकिन उनके नाम पर अराजक आंदोलन किया गया। यह संविधान, संविधान निर्माता और समाज की अवमानना करने वाला था। ऐसे हिंसक अराजक आंदोलन को सलाम करने भी उतना ही निंदनीय है।
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है







