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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    नाकों चने चबाने पड़ेंगे सत्ता की चाबी के लिए?

    ShagunBy ShagunNovember 21, 2021Updated:November 21, 2021 Hot issue No Comments11 Mins Read
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    चित्रगुप्त

    अगला 2022 का चुनाव बेहद दिलचप्स होने वाला है चुनाव में हार के डर से तीनों कृषि कानून की वापसी की घोषणा के बाद सत्ताधारी दल भाजपा और प्रमुख विपक्षी दल सपा के साथ ही बसपा की भी प्रतिष्ठा दांव पर है तो दूसरी ओर अन्य छोटे दल भी कमर कसकर तैयार हैं। खासतौर से केजरीवाल की ‘आप’ ने जिस तरह से दिल्ली के पैटर्न पर यूपी में भी बिजली मॉफ का नारा दिया है उसका असर देखने वाला होगा। मन्दिर-मस्जिद, धर्म-जाति और महंगाई जैसे मुद्दों पर राजनीतिक दलों को वोट करने वाली जनता पर यदि ‘आप’ के लॉलीपॉप ने असर दिखाया तो इस बार के चुनाव में ‘आप’ का खाता खुल सकता है।

    नोटबंदी से लेकर पेट्रोल-डीजल और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतें भाजपा के चिंता का विषय बनी हुई हैं तो दूसरी ओर यही मुद्दा भाजपा विरोधी दलों के लिए किसी ब्रह्मास्त्र से कम नहीं। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस बार किसी भी दल को पूर्ण बहुमत मिलने की उम्मीद नजर नहीं आ रही है। यदि ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में 202 का जादुई आंकड़ा छूने के लिए बाजार सजेगी। विधायक तोड़े जायेंगे, जो नहीं टूटेंगे वे खरीदे जायेंगे। अर्थात ‘साम-दाम-दण्ड-भेद’ का खुला खेल देखने को मिल सकता है।

    मन्दिर-मस्जिद और मण्डल-कमण्डल का आखाड़ा उत्तर प्रदेश कुछ ही दिनों बाद पूरी तरह से चुनावी रंग में रंगा नजर आने लगेगा। 19 मार्च 2022 को योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार का कार्यकाल पूरा हो जायेगा। इससे पहले ही विधानसभा चुनाव सम्पन्न कराए जाने हैं। जाहिर है दिसम्बर के अंतिम दिनों या फिर जनवरी-2022 के शुरुआती दिनों में यूपी में आचार संहिता लग जायेगी। जब तक नयी सरकार का गठन नहीं हो जाता तब तक पूरा प्रदेश चुनाव आयोग के निर्देशों का पालन करेगा।

    वैसे तो हर बार की तरह इस बार भी सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा दांव पर है लेकिन सर्वाधिक चुनौती भाजपा, सपा और बसपा के सामने है। भाजपा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती पिछले चुनाव परिणाम को बरकरार रखने की होगी। विशेषकर योगी आदित्यनाथ के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसा इसलिए कि भाजपा पहली बार पार्टी की परम्परा से हटकर चुनाव से पहले किसी चेहरे को सामने रखकर चुनाव मैदान में उतरने का ऐलान काफी पहले कर चुकी है। वह चेहरा है योगी आदित्यनाथ का। जाहिर है योगी आदित्यनाथ को न सिर्फ अपनी कार्यकुशलता का परिचय देना होगा बल्कि पार्टी को पहले से अधिक सीटों पर जीत दिलानी होगी। देखा जाए तो योगी आदित्यनाथ की स्थिति ठीक वैसी है जैसी कि वर्ल्ड कप क्रिकेट के दौरान फाइनल मैच में टीम के कप्तानों की होती है।

    चेहरे पर भले ही आत्मविश्वास का भाव नजर आता हो लेकिन कप्तान के रूप में तनाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। हालांकि खबरिया चैनलों में साक्षात्कार के दौरान योगी आदित्यनाथ का चेहरा देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि वे भारी दबाव में होंगे लेकिन सच तो यही है कि योगी आदित्यनाथ इस मैच को जीतने के लिए अपनी पूरी प्रतिभा झोंक देंगें। भले ही वर्ष 2017 जैसी स्थिति में भाजपा न आए यदि बहुमत के करीब भी पहुंच गए तो निश्चित तौर पर योगी के कद को बढ़ने से रोका नहीं जा सकेगा। कश्मकश इसलिए कि तीन दशक का इतिहास गवाह है कि यूपी की जनता ने किसी भी दल को लगातार दोबारा सत्ता में नहीं आने दिया है। चाहें वह पूर्ण बहुमत वाली बसपा रही हो या फिर सपा। भाजपा यदि इस मिथक को तोड़ने में कामयाब हो जाती है तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा और इस बार यही चमत्कार योगी आदित्यनाथ को अपने नेतृत्व में दिखाना होगा।

    वैसे देखा जाए तो योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा का परफार्मेंस सपा-बसपा के मुकाबले काफी बेहतर रहा है लेकिन पिछले एक वर्ष के दौरान जिस तेजी से महंगाई बढ़ी है उससे भाजपा की छवि पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। भाजपा विरोधी दल पेट्रोल-डीजल ही नहीं बल्कि खाद्य पदार्थों के मूल्यों की सूची लेकर गांव-देहात में भाजपा के फील गुड की धज्जियां उड़ा रहे हैं। हालांकि भाजपा भी अपने आईटी सेल और बूथ स्तर की कमेटियों के सहारे जनता के बीच अपनी बात रख रही है लेकिन आम जनता से सीधा जुड़ा महंगाई का मुद्दा उनके प्रयासों पर भारी नजर आ रहा है। स्थिति यहां तक खराब हो चुकी है कि गांव-देहातों से भाजपा नेताओं को खदेड़ा जाने लगा है। वोटर भाजपा कार्यकर्ताओं की सुनना ही नहीं चाहता।

    महंगाई मुद्दे को लेकर भाजपा की खराब होती जा रही स्थिति का अंदाजा केन्द्रीय नेतृत्व से लेकर यूपी कैडर के बडे़ नेताओं को भी है। यही वजह है कि हाल ही के दिनों में यूपी सरकार ने अपने टैक्स की कटौती करके पेट्रोल-डीजल के दामों में 12 रुपयों की कमी की है। यूपी भाजपा नेताओं को उम्मीद थी कि इन 12 रुपयों के सहारे वह जंग के मैदान में वापसी कर लेगी लेकिन विपक्ष इस बार भी हावी नजर आया। विपक्ष आम जनता को समझाने में सफल होता नजर आ रहा है।

    विपक्ष जनता के समक्ष 12 रुपए की कमी को भाजपा के बिजनेस से जोड़कर प्रचार कर रहा है। देखा जाए तो ईंधन के दामों में लगभग दोगुने दाम के बाद 10 प्रतिशत की कमी भाजपा के लिए मुफीद साबित नहीं हो रही। महंगाई का असर यह हो रहा है कि आम जनता अब राम मन्दिर निर्माण को भी गंभीरता से नहीं ले रही। हालांकि वर्ग विशेष की कुछ प्रतिशत आबादी राम मन्दिर निर्माण को लेकर भाजपा का गुणगान कर रही है लेकिन भाजपा को गांव-देहात का वह वोट बैंक चाहिए जो धूप-लू, आंधी-तूफान में भी लाइन में लगकर वोट देने के लिए धरों से निकलता है और घण्टों लाइन में लगकर वोट देता है। यही वोट बैंक पार्टियों की हार-जीत तय करता है। बात शहरी क्षेत्रों के वोटरों की करें तो भले ही भाजपा का दबदबा बना हुआ हो लेकिन यह वोट बैंक पार्टियों की तकदीर बदलने में कभी कामयाब नहीं रहा है। गौरतलब है कि वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 312 सीटों पर कामयाबी हासिल हुई थी। अर्थात 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में बहुमत से कहीं अधिक।

    इस बार स्थिति पहले जैसी नहीं है। भले ही योगी सरकार ने गुण्डे-माफियाओं को सबक सिखाने में सफलता हासिल कर ली हो लेकिन आम जनता को महंगाई मुद्दा सर्वाधिक प्रभावित कर रहा है। खासकर पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दामों में बढ़ोत्तरी ने योगी सरकार के किए कराए पर पूरी तरह से पानी फेर दिया है। यूपी भाजपा कार्यालय में मीटिंग के दौर और बडे़ नेताओं का लगातार आवागमन इस बात की तस्दीक कर रहा है कि इस बार का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए आसान नहीं होगा। जिस तरह से महंगाई ने आम जनता को बुरी तरह से प्रभावित किया है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इस बार न मोदी मंत्र काम आने वाला है और न ही ‘डिवाइड एंड रूल’ की पॉलिसी। हालांकि योगी सरकार ने अपने पूरे कार्यकाल के दौरान जिस तरह से वर्ग विशेष के खिलाफ अभियान चलाया है उससे राज्य की एक बड़ी आबादी खासा प्रभावित है। ये आबादी भाजपा को दोबारा सत्ता में लाने में कितनी सफल होगी इसका फैसला तो चुनाव परिणाम ही तय करेंगे लेकिन इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस बार का चुनाव भाजपा और खासकर योगी आदित्यनाथ के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं होगा।

    भाजपा के बाद यूपी के दूसरे बड़े राजनीतिक दल (समाजवादी पार्टी) की चमक भी इस बार कसौटी पर परखी जानी है। हालांकि महंगाई मुद्दे को लेकर यूपी में आम जनता के बीच भाजपा के खिलाफ हवा बह रही है लेकिन इस हवा को सपा अपनी तरफ कितना मोड़ पायेगी, इस पर सन्देह है। ऐसा इसलिए कि इस बार पार्टी की कमान राजनीति के दिग्गज पहलवान मुलायम सिंह यादव हाथों में नहीं बल्कि युवा सोंच रखने वाले अखिलेश यादव के हाथों में है। मुलायम अस्वस्थ हैं। हालांकि वे राजनीति की मुख्य धारा में रहकर सपा को जिताने की बात कर रहे हैं लेकिन उनके स्वास्थ्य की जानकारी रखने वालों का कहना है कि वे सक्रिय राजनीति में उस दमखम के साथ नजर नहीं आ पायेंगे जिस दमखम के साथ वे पिछले विधानसभा चुनाव में नजर आते रहे हैं।

    राजनीति में परिपक्व हो चुके शिवपाल यादव का इस बार भी अपनी नयी-नवेली पार्टी प्रसपा के सहारे मैदान में नजर आने की बात एक बार फिर से कही जा रही है। हालांकि हाल ही के दिनों में यह चर्चा हुई थी कि शिवपाल यादव जल्द घर वापसी कर सकते हैं। अखिलेश के खेमे ने भी इसकी पुष्टि करते हुए हर्ष व्यक्त किया था। अखिलेश का बयान भी आया था कि यदि चाचा (शिवपाल यादव) पार्टी में वापसी करते हैं तो उन्हें सम्मान दिया जायेगा। ये सम्मान क्या होगा? किस तरह का होगा? इस पर खुलासा न किए जाने से शिवपाल की घर वापसी अभी भी अधर में लटकी हुई है।
    सपा के एक और दिग्गज नेता आजम खां की भूमिका चुनाव के दौरान महत्वपूर्ण मानी जाती रही है। इस बार योगी सरकार ने उन्हें जेल में ही आराम करने की व्यवस्था कर दी है लिहाजा वे सपा के लिए किसी काम के नहीं। वैसे भी जौहर विश्वविद्यालय को लेकर उनकी राजनीतिक छवि इतनी खराब हो चुकी है कि वे अपने गृह जनपद रामपुर से भी किसी को चुनाव जिताने की हैसियत नहीं रखते, मुसलमानों की राजनीति तो दूर की बात। वे जब तक सरकार में मंत्री रहे जौहर विश्वविद्यालय के लिए गरीबों के आशियाने उजाड़ते रहे। स्थिति यह हो गयी है कि अब ये इलाकाई जनता को फूटी आंख नहीं सुहाते।

    देखा जाए तो इस बार भले ही महंगाई मुद्दे ने भाजपा की छवि खराब कर रखी हो लेकिन दिग्गजों के अभाव में सपा कोई चमत्कार दिखा पायेगी? इस पर सन्देह है। हालांकि सपा प्रमुख अखिलेश यादव पूरे दम-खम के साथ चुनाव प्रचार में स्वयं जुटे हुए हैं, यहां तक कि उन्होंने स्वयं चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है ताकि उनका ध्यान पार्टी को जीत दिलाने से विमुख न हो इसके बावजूद हालिया तस्वीर सपा के पक्ष में भी नजर नहीं आ रही। ऐसी कोई बयार नहीं बह रही जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि इस बार की बाजी सपा के हाथ में है। ज्ञात हो वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में सपा को 97 सीटें हासिल हुईं थी और बसपा 206 सीटें लेकर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आयी थी।

    वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव का परिणाम आया तो सपा ने 224 सीटों के साथ सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ वापसी की। इसके बाद वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा 224 से 47 सीटों पर ही सिमट कर रह गयी। आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि यूपी की जनता ने पिछले तीन दशकों के दौरान किसी भी दल को लगातार सत्ता नहीं सौंपी है।

    धर्म और जाति के चुनावी अखाडे़ वाले उत्तर प्रदेश में बसपा की दावेदारी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तर प्रदेश में बसपा का एक परम्परागत वोट बैंक है जिसने बसपा को अब तक जीवित रखा है। हालांकि लोकसभा चुनाव (वर्ष 2019) में बसपा का जिस तरह से सूपड़ा साफ हुआ था उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि इस बार के विधानसभा चुनाव में बसपा से किसी प्रकार के चमत्कार की उम्मीद रखना बेमानी होगी, फिर भी बसपा को कमतर आंकना सपा-भाजपा के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। गौरतलब है कि ये वही बसपा है जिसने कभी ‘तिलक तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ का नारा देकर यूपी की राजनीत में हलचल पैदा कर दी थी। इसके बाद ‘चढ़ गुण्डन की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर’ के नारे ने आम जनता को खूब लुभाया।

    बसपा के ये नारे भले ही दलितों के बीच खूब वाहवाही बटोरते रहे हों लेकिन ये अकेला वर्ग बसपा को पूर्ण बहुमत वाली सरकार देने में सक्षम नहीं था। जल्द ही इसका आभास बसपा प्रमुख मायावती को हो गया। वर्ष 2007 में सतीश मिश्रा और ब्राह्मणों की लॉबी साथ लेकर ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ और ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ के नारे ने बसपा को बुलन्दियों तक पहुंचाया और पहली बार बसपा ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनायी। यही वह दौर था जब लखनऊ और नोएडा में मूर्तियों और पार्को के लिए अरबों रुपए खजाने से खाली कर दिए गए। यही वह दौर भी था जब मायावती ने स्वयं की मूर्ति का अनावरण कर विवादों का जन्म दिया। परिणाम भी सामने आया।

    वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को हार का सामना करना पड़ा था। इस बार की तस्वीर पहले जैसी नहीं है। महंगाई मुद्दे की वजह से सत्तारूढ दल भाजपा की वापसी पर सन्देह किया जा रहा है। ऐसे में सपा के बाद बसपा ही एक ऐसा दल है जो दावेदारी में फिट बैठता है। यदि दलित और पिछड़ा वर्ग के साथ सवर्णों ने बसपा का साथ दे दिया तो निश्चित तौर पर बसपा की वापसी से इनकार नहीं किया जा सकता।

    हालांकि भाजपा अभी भी डैमेज कंट्रोल के नुस्खे तलाश रही है और कहा जा रहा है कि जल्द ही एक बार फिर से ईंधन के दामों में कमी की जा सकती है। भाजपा इस अवसर को कैसे अपनी जीत में तब्दील करेगी? ये देखने वाला होगा लेकिन मौजूदा परिस्थितियां बता रहीं हैं कि भाजपा की राह आसान नहीं है।

    Shagun

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