लोकतंत्र के खतरे बनाम वैवाहिक जीवन के खतरे

0
439

व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी

खतरा कभी कहकर नहीं आता। अक्सर वे चीजें भी, अचानक से, खतरे में आ जाती हैं, जिनके बारे में हमारे पुरखों ने कभी सोचा भी न होगा। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दुनिया में जितनी तरह के लोग हैं, उतनी ही तरह के खतरे भी। सरल शब्दों में- दुनिया खतरों और खतरों के खिलाड़ियों से भरी पड़ी है।

अभी पिछले दिनों चार सम्मानित जजों ने जिस प्रकार ‘लोकतंत्र के खतरे’ में होने की आशंका व्यक्त की, उससे मुझे भी यह ‘नैतिक बल’ मिला कि मैं भी अपने ‘वैवाहिक जीवन के खतरे’ में होने पर कुछ बात रखूं।

इस संसार में मैं कोई अकेला पति नहीं जो इस खतरे को झेल रहा हो! लगभग हर कैटिगरी का पति अपना जीवन इसी खतरे के बीच- रोज जीते हुए, रोज मरते हुए- काट रहा है। यह मेरा निजी विचार है कि वैवाहिक जीवन की जितनी परेशानियां हैं, खतरे भी कम नहीं। खतरों की तलवार हर वक़्त सर पर लटकी रहती है। पति होने के नाते- हर रोज- इस तलवार से कैसे पार पा रहा हूं, यह सिर्फ मैं ही जानता हूं।

पहले मुझे भी औरों की तरह यही लगता था कि वैवाहिक जीवन के अपने मजे हैं, अपना आनंद है। जीवन में प्यार ही प्यार है और कुछ नहीं। जीवन में 24×7 वसंत ही वसंत है। शुरू में तो पत्नी के नखरों में मुझे खुद के प्रति सम्मान दिखाई देता था। उनको पूरा करने को यों तत्पर रहता, इतना तो कभी मैं हाईस्कूल पास करने को तत्पर नहीं रहा।

लेकिन वक़्त जैसे-जैसे बीतता गया, चीजें भी बदलती गईं। नखरे मुसीबत लगने लगे। खुद की आजादी खतरे में पड़ी महसूस होने लगी। वैवाहिक जीवन की रंगत बे-रंग होने लगी। कभी-कभी तो लगता, ये कहां किस झंझट में आकर फंस गया। मगर अब कुछ हो भी तो नहीं सकता था न। एक बार को आप पब्लिक डोमेन में जाकर लोकतंत्र के खतरे में होने के खिलाफ आवाज बुलंद कर सकते हैं लेकिन पत्नी या वैवाहिक जीवन के खिलाफ कहने की हिम्मत नहीं जुटा सकते। अरे, दुनिया के कुछ कहने या हंसी उड़ाने की बात जाने दीजिए, उससे पहले पत्नी और घर वाले ही ऐसी-तैसी कर डालेंगे।

मैंने ऐसे बहुत बड़े-बड़े खलीफा देखे हैं, जो मंचों पर तमाम क्रांतिकारी बातें करते, नारे लगाते हैं पर अपनी पत्नी के आगे यों भीगी बिल्ली बने रहते हैं मानो कुछ पता ही न हो; समाज या देश में क्या चल रहा है। खुद के वैवाहिक जीवन के खतरे में होने का कभी जिक्र तक न करेंगे और लोकतंत्र के खतरे में होने के मसले पर पूरे देश में अफरा-तफरी मचा देंगे।

इसलिए तो मैं लोकतंत्र को छोड़ अपने वैवाहिक जीवन को बचाने में अधिक ध्यान देता हूं। वैसे, मैं अपने देश के लोकतंत्र की तरफ से बिल्कुल निश्चिंत हूं। देश का लोकतंत्र कभी खतरा में हो ही नहीं सकता। मुझे पता है, इस वक़्त देश में 56 इंच छाती वाली सरकार है, जो लोकतंत्र की स्वतंत्रता को बचाए-बनाए रखने को 24×7 प्रतिबद्ध है! देख नहीं रहे आप, सरकार ने कैसे पाकिस्तान और चीन की पुंगी बजा रखी है। अमरीका हमारे देश के लोकतंत्र का लोहा मानता है! इजराइल के प्रधानमंत्री अभी हाल सरकार-ए-आली से इम्प्रेस होके गए ही हैं!
अभी आप हमारे लोकतंत्र का जलवा दोवास में देखिएगा!

वही तो मैं कह रहा हूं कि ईरान से लेकर तुरान तक हमारे देश के लोकतंत्र और लोकतांत्रिक सरकार के चर्चे हैं और यहां चंद लोगों को लोकतंत्र खतरे में जान पड़ रहा है! कमाल है न।

मैं तो कहता हूं, वैवाहिक जीवन के लोकतंत्र को बचाना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि इसी पर मेरे-आपके जीवन की पूरी कायनात टिकी है। यह अगर बचा हुआ है तो मानिए देश, समाज, दुनिया में सबकुछ बचा हुआ है! देश और सरकार से नाराजगी तो फिर भी रखी जा सकती है किंतु पत्नी से नाराजगी रखने का मतलब है, दाना-पानी पर सीधी चोट। मजाक न समझें। सौ परसेंट सही कह रहा हूं मैं।

जैसाकि मैंने ऊपर अपने वैवाहिक जीवन के खतरे में होने का जरा-सा जिक्र किया, यह सच है। जो भी है, इसे बचाए-बनाए रखना तो अब मेरी ही जिम्मेदारी है न। मैं चाहे रोऊं, चाहे हंसूं झेलना मुझको ही है। यह आजमाई हुई बात है कि मुसीबत के वक़्त न अपना न पराया कोई पास नहीं आता। सब कन्नी काट लेते हैं।

अपने-अपने वैवाहिक जीवन के लोकतंत्र को बचाएं। देश का लोकतंत्र बचाए रखने को पूरा सरकार और सेना का अमला है। निश्चिंत रहें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here