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    Home»Featured

    हम सभी को अपने ‘संयुक्त परिवार’ की ओर वापस लौटना चाहिए!

    By April 16, 2020 Featured No Comments6 Mins Read
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    संयुक्त परिवार के फायदे ज्यादा, नुकसान हैं कम

     

    पिछले दिनों फिल्म डायरेक्टर शुजीत सरकार के अपने एक ट्वीट में लिखा, ‘हमें अपने रहने के पुराने सिस्टम यानी कि संयुक्त परिवार की ओर वापस लौटना चाहिए। सभी तरह की मानसिक असुरक्षा, अकेलेपन और डिप्रेशन से बचने का अब शायद यही एकमात्र तरीका बचा है। परिवार नामक छाता हमारे मन को सुरक्षा की भावना देता है। शुजीत के इस ट्वीट पर मसाला बाई के नाम से ट्विटर हैंडल चलाने वाली मीटू एक्टिविस्ट और पत्रकार रितुपर्णा चटर्जी ने लिखा, ‘यह मेरा निजी अनुभव है। मैंने बहुत करीब से संयुक्त परिवार को देखा है, जिसमें महिलाओं के श्रम का शोषण होता है। महिलाएं ही एक-दूसरे के खिलाफ खड़ी होती हैं, सामान के लिए लड़ती हैं और महिलाओं को पितृसत्तात्मकता का सामना करना पड़ता है। इन दोनों ट्वीट्स ने फैंस के बीच एक बहस छेड़ दी है कि संयुक्त परिवार में महिलाओं का शोषण होता है या न्यूक्लियर फैमिली में उनके ऊपर ज्यादा प्रेशर होता है।

     

    रितुपर्णा ने अपने अगले ट्वीट में लिखा, ‘संयुक्त अगलवार परिवार को साथ रखने में बहुत सारा दोहरा काम और रखरखाव की जरूरत होती है। अगर एक आदमी घर के सारे काम करता है, तो शायद कोई संयुक्त परिवार ही नहीं होता। मैं यहां निजी समय, प्रिवेसी और निराशा के समय के बारे में बात ही नहीं कर रही हूं, क्योंकि भारत में केवल एक कमरा ही कई लोगों के लिए काफी आरामदायक होता है।% अपने अगले ट्वीट में वह कहती हैं, %इससे क्या मिलता है, बुजुर्गों का सामूहिक और संचित ज्ञान और बच्चों की तरफ ध्यान, जिससे कि माताओं के लिए बोझ थोड़ा हल्का हो जाता है और मुश्किल समय में मजबूती मिलती है।वह आगे लिखती हैं, लेकिन संयुक्त परिवार को मेंटल हेल्थ से जोड़ना भयानक है। मैं एक बार फिर कहूंगी कि निजी अनुभव है, लेकिन जिन संयुक्त परिवारों को मैंने देखा है, उनमें मानसिक रूप से एक दूसरे को समझने, साथ देने या समझाने का बहुत अच्छा रिकॉर्ड नहीं है। अब ऐसा नहीं होता है।

     

    हालांकि समाजशास्त्रियों का मानना है कि परिवार में महिलाओं की स्थिति क्या होगी, यह परिवार के रूप नहीं, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। मशहूर समाजशास्त्री प्रफेसर आनंद कुमार के अनुसार, परिवार में महिलाओं की स्थिति क्या होगी और उसका शोषण होगा या नहीं, यह काफी हद तक अब उनकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। वह कहते हैं, ‘अगर महिलाएं आर्थिक स्तर पर मजबूत हैं और अपने फैसले खुद लेने में सक्षम हैं, तो परिवार में उसकी स्थिति मजबूत होती है। यहां तक कि अगर उसका अपना मायका अमीर या मजबूत है, तो भी घर में उसे सम्मानजनक स्थान मिलता है। वहीं दूसरी ओर आज अगर वह सिर्फ घर में चूल्हा, चौका करती है, तो उसे दोयम दर्जे का जीवन जीने के लिए मजबूर होना पड़ता है।’ वह आगे कहते हैं, ‘संयुक्त परिवार का एक लाभ यह है कि इसमें तमाम तरह के कामों में मदद के लिए पति-पत्नी के अलावा भी लोग रहते हैं।

     

    इसमें अगर पति बदचलनी की ओर बढ़ता है या फिर वह पत्नी से मारपिटाई करता है, तो वहां पर पति का बाकी परिवार बीच-बचाव करते हैं और पति को उसकी गलत हरकत के लिए समझाते भी हैं। यह महिलाओं के लिए एक तरह से सेफ्टी वॉल्व की तरह काम करता है। न्यूक्लियर फैमिली में ऐसा नहीं होता है। वहां तो अगर पति कुछ गलत कर भी रहा है, तो उसे समझाने-बुझाने वाला कोई नहीं होता। अगर पति हिंसक है, तो भी महिलाएं किसी से खुलकर अपने दिल की बात नहीं कह पाती हैं।

     

    ज्यादातर मामलों में तो महिलाएं केवल बच्चों की वजह से मजबूर होकर हिंसक पति के साथ रहती हैं।’ बकौल प्रोफेसर आनंद, आजकल यह जरूर देखने में आ रहा है कि कामकाजी महिलाएं अपने पति को समझा-बुझाकर अपने (मायके से) मां-बाप, बहन को अपने साथ रखती हैं, जिससे कि उन्हें सुरक्षा का अहसास होता रहे। इसलिए इन दिनों मायके की ओर झुके परिवार का चलन देखने को मिल रहा है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और पोद्दार वैलनेस लिमिटेड की डॉक्टर प्रकृति पोद्दार के पास मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कई महिलाओं के मामले आते हैं।

     

    अपने अनुभव के आधार पर वह बताती हैं, ‘संयुक्त परिवार के लाभ भी हैं और नुकसान भी। लेकिन अगर दोनों को तोलें, तो लाभ ज्यादा नजर आते हैं। संयुक्त परिवार ज्यादा अच्छा होता है विशेषकर बच्चों के लिए, क्योंकि दोनों पैरंट्स आज कामकाजी हैं, तो बच्चों को समझ, संस्कृति और रिश्तों के बारे में सिखाने वाला कोई नहीं होता है। इसलिए न्यूक्लियर फैमिली के बच्चों में फैमिली बॉन्डिंग कम होती है।’ बकौल डॉक्टर पोद्दार, हालांकि संयुक्त परिवार में भी आजकल कई तरह के उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं। वह बताती हैं, ‘परिवार में आजकल इंसेस्ट रिश्तों की दर काफी बढ़ गई हैं। ऐसे में संयुक्त परिवार में बहुत संतुलन की जरूरत हो गई है। फिर यह भी है कि संयुक्त परिवार में बहू के ऊपर प्रेशर तो होता ही है, क्योंकि उन्हें अच्छा परफॉर्म करना ही होता है, नहीं तो उनको टोका जाता है। यह भी माना जाता है कि एक ही घर में दो रानियों का रहना मुश्किल होता है। तो कई बार किसी एक को नीचे देखना ही पड़ता है।

     

    इसमें फिजिकल और मेंटल एब्यूज भी होता है। इसमें सास ही नहीं, बहू की भी गलती होती है। लेकिन अगर जॉइंट फैमिली में थोड़ा स्पेस दिया जाए, एक दूसरे को सम्मान दिया जाए, तो मुझे लगता है कि जॉइंट फैमिली ज्यादा अच्छी है, क्योंकि वहां पर बच्चों की ज्यादा अच्छी केयर होती है। लेकिन संयुक्त परिवार में महिलाओं के मानसिक शोषण की बात कही जाती है। इस पर डॉक्टर पोद्दार का कहना है, ‘मेंटल शोषण की बात है, तो किसी भी रिश्ते में होता है। पतिपत्नी के बीच भी कई बार मानसिक शोषण होता है। पितापुत्र, मां-बेटी और यहां तक कि भाई-भाई में भी कई बार नहीं पटती है। इंसानी रिश्ते बहुत ही जटिल होते हैं।

     

    एकल परिवार में डिप्रेशन के ज्यादा मामले आते हैं, क्योंकि वहां कोई सहारा नहीं होता है महिलाओं के पास। लेकिन जॉइंट फैमिली में आपके आस-पास लोग रहते हैं, तो वहां पर आपके पास डिस्कस करने के लिए लोग रहते हैं और फिर डिप्रेशन की संभावना कम होती है। पोस्ट पार्टम डिप्रेशन (डिलिवरी के बाद होने वाला डिप्रेशन) बहुत होता है, लेकिन भारत में इसकी दर कम है, क्योंकि यहां पर डिलिवरी के बाद आप अपने मां-बाप या ससुराल की देखरेख में रहते हो। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि संयुक्त परिवार आपको डिप्रेशन जैसी गंभीर बीमारियों से काफी हद तक बचा सकता है।

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