बौद्ध साहित्य में अम्बपाली का नाम विख्यात है। वैशाली में आम के पेड़ के नीचे वह नन्हीं बालिका पड़ी पाई गई थी। माली उसे उठाकर अपने घर ले गया और उसका पालन-पोषण किया। अम्बपाली बहुत सुंदर थी। बड़ी होने के साथ-साथ उसका सौंदर्य निखरता गया। संगीत, नृत्य और वाद्य में वह निपुण हो गई। उसके रूप-लावण्य से आकर्षित होकर बड़े-बड़े लोग विवाह का प्रस्ताव लेकर आये, पर उसने सबको इंकार कर दिया।
एक दिन भगवान बुद्ध का वैशाली में आगमन हुआ और संयोग की बात कि वह अम्बपाली के आम्र वन में ठहरे। अम्बपाली उनके दर्शन के लिए गई। उनका अभिवादन करके एक ओर को बैठ गई। भगवान बुद्ध ने उसे उपदेश दिया।
उपदेश सुनने के बाद उसने विनत होकर भगवान बुद्ध से प्रार्थना की, “भंते, अपने संघ सहित आप कल मेरा भोजन स्वीकार करें।” भगवान से स्वीकृति दे दी। अगले दिन भगवान बुद्ध अपने भिक्षु- संघ के साथ अम्बपाली के घर गये और उसके हाथ से आहार ग्रहण किया। भोजन के बाद अम्बपाली ने निवेदन किया, “भन्ते, मैं इस उपवन को आपके संघ को समर्पित करती हूं।” बुद्ध ने उसे स्वीकार कर लिया। भगवान बुद्ध चले गये, लेकिन अम्बपाली एकदम बदल गई। उसे अपनी वास्तविक कुरूपता का भान हुआ।
अब तक वह काम-वासना में अनुरक्त और आनंदित थी। अब उसके जीवन में एक नया अध्याय खुल गया। उसने अपने केश कटवा डाले और भिक्षुणी बन गई। कुछ ही समय में वह साधना के उच्चतम शिखर पर पहुंच गई और पूर्णता- प्राप्त भिक्षुणियों में उसे महत्वपूर्ण स्थान मिल गया। अंतर के प्रकाश से उसका संपूर्ण जीवन आलोकित हो गया।







