आग में जलते असम का गुनहगार कौन?

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बर्निंग इशू: विपक्ष ने कैब बिल -2019 को मूल समस्या से इतर जोड़ दिया धर्म से


 
राहुल कुमार गुप्त
 
नागरिक बिल-2019 विधेयक लाखों शोषितों-पीड़ितों को जहाँ मानव जीवन देने के लिये अति आवश्यक था वहीं पूर्वोत्तर के मूलनिवासियों के हकों पर अन्य के अतिक्रमण से होने वाले प्रभाव के बारे में भी सोचना और उन्हें संरक्षित करना भी सरकार का प्रथम कर्तव्य था। यह विधेयक वास्तव में वक्त की और भारतीय परंपरा की जरूरत थी लेकिन बिना तैयारी बिना दूरदर्शिता के यह बड़ी जल्दबाजी के साथ क्यूँ पास कराया गया यह हर एक के समझ से बाहर है।
 
मोदी सरकार का यह प्रयास सार्थक दिशा में ही था किन्तु पूर्व में प्राप्त उपलब्धियों और शांति के चलते बड़ी तैयारी से चूकना सरकार के अतिविश्वास का ही नतीजा है कि पूर्वोत्तर दशकों बाद पुनः धधक उठा। यहाँ के मूलनिवासियों के साथ यह समस्या अंग्रेजी शासन के साथ-साथ आजाद भारत में भी आजादी के बाद से बनी रही, कई पूर्वोत्तर राज्यों में स्थिति को नियंत्रण में लाने को अस्पा कानून भी लागू रहा।
 
इस न्याय पूर्ण किन्तु थोड़ा सा जल्दबाजी में लाये गये बिल को विपक्ष व विरोधी मूल समस्या से इतर धर्म से जोड़कर देश को पुनः तोड़ने के लिये गाँठें ढील दीं। विविधिता में एकता का सुंदरतम् उदाहरण पेश करने वाले भारत के साथ खुद उसके अपनों ने अपने-अपने स्वार्थहित को लेकर विश्व की महानतम् संस्कृति को चोट भी पहुंचाई है। जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत के सबसे सुंदर स्थानों के साथ अशांत रहने वाले राज्यों के दर्जे में रहे हैं। यह अशांति पनपने का मौका आखिरकार किसने दिया, इस अशांति की चिंगारी एक दो दिनों से नहीं दशकों से सुलग रही थी कुछ सालों से यहाँ शाँति पनपी ही थी कि पुनः यहाँ अशांति ने अपना कब्जा कर लिया।
 
 
यह कब्जा अपने हक के लिये पूर्वोत्तर के निवासी कर रहे हैं तो सरकार भी अपने संसाधनों व न्याय को साथ रखकर अपने कर्तव्यों के साथ मजबूती के साथ खड़ी नज़र आ रही है। इस समस्या को कांग्रेस अपने शासन में भी रफा-दफा कर सकती थी, धारा 370 को भी निष्प्रभावी कर सकती थी किन्तु समस्या को जन्म देने व उसे पाल पोष कर मजबूत करने वाले, उन समस्याओं के समाधान के विरोध में खड़े नज़र आये वो भी मूल नजरिये को छोड़कर। धार्मिक उन्माद बढ़ाकर देश को अपने तटस्था पर पर्दे डालने का कार्य कर रहे हैं।
 
वोट की राजनीति इसकी मुख्य वजह है। जल्दबाजी से किये एक बेहतर निर्णय को धर्म का चश्मा लगा दिया गया। जबकि इस बिल में कहीं भी धर्म का कहीं जिक्र नहीं है।
 
न ही पूर्वोत्तर की अशांति इसके कारण है। यह तो देश के संसाधनों को ध्यान में रखते हुए पड़ोसी मुस्लिम राष्ट्रों के अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति को देखते हुए बिल का निर्धारण किया गया न कि धर्म को आधार बनाकर। एक छोटा सा उदाहरण आप खुद को लेकर समझिये कि आपके पास कुछ गिलास ही पेयजल है और आपके कुछ प्यासे और कुछ कम या गैर प्यासे हैं तो आप सर्वप्रथम जल किसे देंगे। तो जो आपका उत्तर है, वही कार्य तो सरकार ने किया। तो इसमें हिंदू-मुस्लिम लाने का प्रयास तो अपनी  कमजोर पड़ी सियासत को चमकाने के लिये है।
 
किसी को मूल समस्या नजर नहीं आयी। पूर्वोत्तर व पश्चिम बंगाल में इन्हें मुस्लिम वोट बैंक घटता नज़र आया और गैर मुस्लिम वोट बढ़ता नज़र आया। इसके अलावा यह कुछ और देखना या समझना नहीं चाहते। यह बिल भी मनमोहन सिंह की सरकार की लगभग-लगभग वही जिराॅक्स है। 1985 में राजीव सरकार ने असम की अशांति को सुलझाने के लिये क्लाॅज-6 कमेटी के लिये कहा कि वहां के लोगों के हक की पूरी समीक्षा होगी और उनका हक बरकरार रखा जायेगा किन्तु तब से अब तक यह कार्य पूर्ण न हो सका।
 
कुछ हिदायतों के साथ नागरिकता बिल पारित भी किया गया है जिससे पूरा पूर्वोत्तर आग की चपेट से बचा है और इसे बचाये है आईएलपी। इन राज्यों के लिये विशेष प्रावधान संविधान के अनुच्छेद -371 के उपखण्डों में दिये है जिसकी वजह से ये विशेष दर्जा प्राप्त राज्य हैं। त्रिपुरा में बांग्लादेशी हिन्दुओं व असम में भी इनकी संख्या ज्यादा है। इससे इतर वहाँ के मूलनिवासी खेती और मजदूरी तक सीमित रह गये तथा गुजराती, मारवाड़ियों के अलावा यूपी, बिहार के लोग भी वहां पहले से प्रभावी हैं। उनका ( असम व त्रिपुरा के मूलनिवासी ) गुस्सा अपनी जगह जायज है तो सरकार का नागरिकता बिल भी अपनी जगह जायज है किन्तु सरकार ने इन लोगों को बिना विश्वास में लिये जल्दबाजी कर दी।
 
क्लाॅज-6 के तहत वहाँ के मूलनिवासियों की सारी चीजें यथावत रहेंगी सर्वप्रथम इस पर आपस में कान्फ्रेंस व बैठकें होतीं इस विषय का प्रचार-प्रसार कर उन्हें विश्वास में लेने के बाद ही नागरिकता बिल-2019 को पास कराने के लिये कदम अग्रसर करने चाहिये था। जिससे पूर्वोत्तर आज आग में इस तरह से नहीं झुलसता। आज भी सरकार को इस आग को कम करने के लिये वहाँ के लोगों को विश्वास में लेना पड़ेगा और समझाना पड़ेगा कि उनके हितों में आँच नहीं आने देंगे। विपक्ष और विरोधी तो मौके की ताक् पर बैठा है वो चिंगारी लगाने का कार्य कर रहे है करता रहेगा किन्तु सरकार को भी अपने प्रयास बंदूक से नहीं बल्कि विश्वास के वचन और कार्यों से जारी रखने होंगे।

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