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    संविधान में अल्पसंख्यक शब्द परिभाषित नहीं :हृदय नारायण दीक्षित

    ShagunBy ShagunJune 13, 2017 Hot issue No Comments3 Mins Read
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    लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित ने अल्पसंख्यक शब्द को संविधान में परिभाषित नहीं बताकर एक नई बहस को जन्म दे दिया।
    दीक्षित ने यहां कहा कि संविधान में अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित ही नहीं किया गया है, इसलिये यह निर्विवाद नहीं है। हालांकि, वर्तमान राजनीतिक दौर में इस शब्द को परिभाषित किये जाने की जरूरत हैे। उन्होंने कहा कि 1976 में आपातस्थित के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने संविधान में समाजवादी और पंथ निरपेक्षता शब्द जुड़वा दिये थे। यह संशोधन संसद में विपक्ष की नामौजूदगी में कराया गया था, क्योंकि देश के प्रमुख विपक्षी नेता उस समय जेल में थे।
    उनका कहना था कि उस समय सभा अपने स्वरुप में नहीं थी। इन दोनो शब्दों को परिभाषित भी नहीं किया गया था। परम्पराओं के अनुसार विधि निर्माण में प्रयुक्त शब्दों को परिभाषित किया जाना चाहिये। अल्पसंख्यक शब्द भी परिभाषित नहीं है, इसलिये इसको निर्विवाद नहीं कहा जा सकता। चालीस वर्षों से अधिक का राजनीतिक अनुभव रखने वाले और 30 से अधिक किताबों के लेखक दीक्षित को संविधान का मर्मज्ञ भी माना जाता है। उन्होंने कहा कि संविधान सभा के अंतिम भाषण में डा. राजेन्द्र प्रसाद और डा. भीमराव अम्बेडकर दोनों ने कहा है कि संविधान की सफलता या विफलता उन व्यक्तियों पर निर्भर करती है जिन्हें जनता चुनेगी। लेकिन, देश की सबसे बड़ी विधानसभा उत्तर प्रदेश के सदन में राज्यपाल पर कागज के गोले फेंके गये।
    उनका कहना था कि सभा की स्थापना ऋग्वैदिक काल से ही इस देश में है। इससे स्पष्ट है कि विचार विनिमय का क्रम भारत से ही शुरू हुआ। सभा की शक्ति मजबूत होने से राज्य व्यवस्था चुस्त दुरुस्त रहती है। उन्होंने कहा कि महाभारतकाल में सभा की शक्ति घटने की वजह से ही चीरहरण हुआ। जुआ खेला गया। भीष्म और विदुर जैसे लोगों की मौजूदगी में यह घटनायें हुईं जिसका परिणाम महाभारत रहा। इसलिये सभा का मजबूत होना जरुरी है। दीक्षित ने कहा कि सभी का कर्तव्य है कि सभा को हर हाल में मजबूत किया जाये। राज्यपाल पर कागज के गोले फेंकने की उन्होंने भी निंदा की थी। निंदा को कम नहीं आंका जाना चाहिये। सन 1968 में लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान भी विपक्षी सदस्यों ने ऐसा किया था। लोकसभा अध्यक्ष ने निंदा प्रस्ताव पारित कर दिया था। इसके बाद विपक्षी सांसद उच्चतम न्यायालय गये लेकिन न्यायालय ने सदन की व्यवस्था में हस्तक्षेप से साफ इन्कार कर दिया था। उत्तर प्रदेश विधानसभा में इस तरह की हरकत करने वाले विधायकों को स्वयं गौर करना होगा।
    विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि जनप्रतिनिधियों को अध्ययन करना चाहिये। अध्ययन से उन्हें और जनता का भी फायदा होगा। संविधान देश की आत्मा है। इसे परिपूर्ण और निर्विवाद बनाने के लिये हरसंभव कोशिश करनी चाहिये। सत्य, शिव और सौन्दर्य को अपने जीवन का आयाम मानने वाले दीक्षित गरीब परिवार में पैदा होने के बावजूद विधानसभा अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने का श्रेय अपनी कर्मठता के साथ ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ , भारतीय जनता पार्टी और क्षेत्रीय जनता को देते हैं।

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