आगरा-मथुरा केस में हाईकोर्ट के सख्त आदेश के बाद अपर मुख्य सचिव गृह ने की CBI जांच की सिफारिश, एएनटीएफ इंस्पेक्टर हरवेंद्र मिश्रा समेत कई वरिष्ठ पुलिसकर्मी जांच के दायरे में
आगरा/लखनऊ, 2 फरवरी 2026 : उत्तर प्रदेश पुलिस के 33 अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सीबीआई जांच का रास्ता साफ हो गया है। यह मामला 2018 का है, जब मथुरा के एक युवक पुनीत कुमार को कथित तौर पर फर्जी तरीके से उठाया गया, थर्ड डिग्री दी गई और फिर चोरी-लूट के पांच झूठे मुकदमों में जेल भेज दिया गया।
मिली जानकारी के अनुसार इस अन्याय के खिलाफ पुनीत के भाई सुमित कुमार ने लगातार लड़ाई लड़ी। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की जांच में 33 पुलिसकर्मी दोषी पाए गए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2022 में ही CBI जांच के आदेश दिए थे, लेकिन सरकार ने पुनर्विचार याचिका दायर की।
22 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट ने सरकार की याचिका खारिज कर दी और अपर मुख्य सचिव गृह संजय प्रसाद को CBI को जांच सौंपने का सख्त निर्देश दिया। अब संजय प्रसाद ने हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल कर जांच CBI को ट्रांसफर करने की पुष्टि कर दी है।
जांच में शामिल प्रमुख नाम (कुछ अभी भी सक्रिय पद पर)
- इंस्पेक्टर हरवेंद्र मिश्रा – वर्तमान में आगरा एएनटीएफ में तैनात
- हेड कांस्टेबल वसीम – आगरा एएनटीएफ
- हेड कांस्टेबल लोकेश – आगरा जीआरपी
- तत्कालीन अपर पुलिस अधीक्षक राजेश सोनकर
- तत्कालीन सीओ आलोक दुबे, प्रीति सिंह, विजय शंकर मिश्रा
- इंस्पेक्टर शिव प्रताप सिंह, रामपाल सिंह, अवधेश त्रिपाठी, नितिन कसाना
- फिरोजाबाद में तैनात इंस्पेक्टर प्रदीप कुमार, अनिल कुमार, राजवीर सिंह, धर्मवीर कर्दम और कई अन्य हेड कांस्टेबल व कांस्टेबल
परिवार पर हुई प्रताड़ना की कहानी और भी दर्दनाक
सुमित कुमार ने जानकारी ने मीडिया को बताया जब न्याय के लिए आवाज उठाई तो जांच में फंसे पुलिसकर्मियों ने कथित तौर पर बदले की कार्रवाई शुरू कर दी।
- फिरोजाबाद में एक महिला को बहला-फुसलाकर अपहरण का फर्जी मुकदमा दर्ज कराया गया।
- उस महिला को नाबालिग दिखाकर केस को और गंभीर बनाया।
- मुकदमे में सुमित, उनके पुलिस में तैनात भाई दीपेंद्र कुमार और उनकी मां का नाम भी जोड़ दिया गया।
- इस मानसिक प्रताड़ना और तनाव के कारण 2022 में सुमित की मां को ब्रेन हेमरेज हुआ और उनकी मौत हो गई।
- भाई दीपेंद्र को निलंबित करना पड़ा (बाद में 2022 में बहाल हुए)।
- परिवार को इतना परेशान किया गया कि उन्हें कुछ समय के लिए भूमिगत रहना पड़ा।
पीड़ित परिवार का कहना है – “बेगुनाह साबित होने की कीमत हमें बहुत भारी पड़ी। हमारी मां हमेशा के लिए चली गईं।”
अब CBI जांच में यह देखा जाएगा कि क्या फर्जी गिरफ्तारी, थर्ड डिग्री, झूठे मुकदमे और बाद में प्रतिशोध की कार्रवाई में कोई साजिश या गलत इस्तेमाल हुआ था।
यह मामला उत्तर प्रदेश पुलिस की जवाबदेही, फर्जी मुकदमों और शक्तियों के दुरुपयोग पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। जांच के नतीजे आने के बाद कई बड़े नामों का भविष्य दांव पर लग सकता है।







