Close Menu
Shagun News India
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Thursday, September 10
    Shagun News IndiaShagun News India
    Subscribe
    • होम
    • इंडिया
    • उत्तर प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • राजस्थान
    • खेल
    • मनोरंजन
    • ब्लॉग
    • साहित्य
    • पिक्चर गैलरी
    • करियर
    • बिजनेस
    • बचपन
    • वीडियो
    • NewsVoir
    Shagun News India
    Home»ब्लॉग»Current Issues

    नालसा का एलएडीसी सिस्टम खत्म करने का फैसला: क्या गरीब कैदियों से छिन जाएगा न्याय का सहारा?

    ShagunBy ShagunSeptember 10, 2026 Current Issues No Comments5 Mins Read
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Share
    Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp
    Post Views: 3

    anurag chaudhryलेखक: अनुराग चौधरी (BALLB(H), LL.M, PhD (P) | संविधान विशेषज्ञ व तीन किताबों के लेखक)

    भारत का संविधान हर नागरिक को बराबरी और न्याय का हक देता है। अनुच्छेद 22 जहां हर गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से बचाव का मौलिक अधिकार देता है, वहीं अनुच्छेद 39A गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता की गारंटी प्रदान करता है। लेकिन आज ये दोनों ही संवैधानिक अधिकार एक बड़े संकट के मुहाने पर खड़े दिख रहे हैं।

    मौजूदा समय में देश की जेलों में 76% से ज्यादा कैदी विचाराधीन (Undertrial) हैं। वे सालों से सलाखों के पीछे सिर्फ इसलिए सड़ रहे हैं क्योंकि उनके पास किसी अच्छे वकील को देने के लिए पैसे नहीं हैं।

    इसी गंभीर मानवीय और कानूनी संकट से निपटने के लिए राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) ने वर्ष 2022-23 में एक क्रांतिकारी पहल की शुरुआत की थी – लीगल एड डिफेंस काउंसिल सिस्टम (LADCS)।

    क्या था यह ‘एलएडीसी’ सिस्टम?

    यह भारत में ‘पब्लिक-डिफेंडर मॉडल’ (Public Defender Model) की दिशा में पहला बड़ा प्रयोग था। अमरीका और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में यह मॉडल बेहद सफल रहा है। इसके तहत गरीबों को केस लड़ने के लिए सरकारी वेतन पर समर्पित (Full-time) वकील उपलब्ध कराए जाते थे। लेकिन विडंबना देखिए कि जिस सफल प्रयोग की तारीफ हो रही थी, अब नालसा ने ही इसे बंद करने का फैसला ले लिया है।

    क्या है पूरा विवाद?

    इस विवाद की शुरुआत पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ की बार एसोसिएशनों के कड़े विरोध से हुई।

    वकीलों का आरोप: सरकारी वेतन पर काम करने वाले एलएडीसी (LADC) वकील एक ‘समानांतर बार’ खड़ी कर रहे हैं।

    इससे प्राइवेट प्रैक्टिस -खासकर युवा वकीलों की कमाई -प्रभावित हो रही है और यह वकालत की स्वतंत्रता के खिलाफ है।

    हड़ताल और दबाव: इस मांग को लेकर वकीलों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरू कर दी। इसी दबाव में आकर नालसा ने 4 अगस्त को एक बड़ा आदेश जारी कर दिया:

    1. पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में कार्यरत एलएडीसी वकीलों के कॉन्ट्रैक्ट सितंबर 2026 से आगे नहीं बढ़ाए जाएंगे।
    2. देश के बाकी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में भी जैसे-जैसे वकीलों का कार्यकाल पूरा होगा, कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर काम वापस पुराने ‘पैनल वकीलों’ को दे दिया जाएगा।

    आलोचकों का पक्ष: आलोचकों का साफ मानना है कि यह फैसला गरीब कैदियों को बंधक बनाने जैसा है  -या तो कैदी बार के वकीलों को मोटी फीस दें, या फिर बिना वकील के जेल में पड़े रहें। नालसा ने एक तरह से असंवैधानिक मांग के आगे घुटने टेक दिए हैं।

    आंकड़े क्या कहते हैं?

    बार एसोसिएशन का यह दावा कि एलएडीसी से उनकी प्राइवेट प्रैक्टिस खतरे में पड़ रही है, सरकारी आंकड़ों की कसौटी पर टिकता ही नहीं:

    एलएडीसी का कार्यभार: नालसा के डैशबोर्ड के अनुसार 2025-26 में देशभर में एलएडीसी को कुल 4,86,354 केस सौंपे गए थे।

    कुल केसों की संख्या: नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के मुताबिक, देश में हर महीने लगभग 24 लाख नए आपराधिक (Criminal) केस दर्ज होते हैं।

    वास्तविकता: इसका मतलब यह है कि एलएडीसी के पास देश के कुल मुकदमों का महज 1.6% हिस्सा ही था।

    क्यों बेहतर और असरदार था यह सिस्टम?

    पुराने लीगल-एड (पैनल) सिस्टम की तुलना में एलएडीसी प्रणाली कई गुना अधिक प्रभावी साबित हो रही थी:

    1. फुल-टाइम और जवाबदेह वकील: पुराने सिस्टम में पैनल वकीलों को प्रति केस बहुत मामूली फीस मिलती थी, जिसके कारण वे न तो समय पर जेल जाकर कैदी से मिलते थे और न केस की ठीक से तैयारी करते थे। इसके विपरीत, एलएडीसी वकील फुल-टाइम समर्पित थे, वे रोज अदालत में मौजूद रहते थे जिससे जमानत की अर्जियों पर त्वरित सुनवाई संभव हो पाती थी।
    2. गरीबों का वापस लौटा भरोसा: अक्सर गरीब कैदियों को लगता था कि मुफ्त मिलने वाला सरकारी वकील उनकी मदद नहीं करेगा। लेकिन जब एलएडीसी वकील खुद नियमित रूप से जेल जाकर कैदियों और उनके परिजनों से मिलने लगे, तो तंत्र पर भरोसा जागा। परिणाम स्वरूप, अकेले उत्तर प्रदेश में 2025-26 के दौरान एलएडीसी को मिले 15,000 मुकदमों में से 9,000 से ज्यादा का सफल निपटारा हुआ।
    3. जेलों में घटी भीड़: छोटे-मोटे अपराधों में बंद हजारों कैदियों को समय पर जमानत दिलाकर इस व्यवस्था ने जेलों का बोझ कम करने में सीधी और बड़ी मदद की।

    अब आगे क्या? (सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला)

    विवाद के तूल पकड़ने पर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने मार्च 2026 में जस्टिस पी. सैम कोशी की अध्यक्षता में एक 5-सदस्यीय समीक्षा कमेटी का गठन किया था। आरोप है कि इस कमेटी की रिपोर्ट आए बिना और एलएडीसी वकीलों का पक्ष सुने बिना ही इसे बंद करने का तुगलकी फैसला ले लिया गया।

    सुप्रीम कोर्ट में याचिका: इस निर्णय के खिलाफ असम, मेघालय और नागालैंड के एलएडीसी वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दर्ज की है [W.P.(C) No. 1037/2026]। उनका तर्क है कि बिना किसी ‘ट्रांजिशन प्लान’ के पेंडिंग केसों का क्या होगा, इस पर विचार ही नहीं किया गया।

    सुप्रीम कोर्ट का नोटिस: सर्वोच्च अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार और नालसा को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

    पुरानी टिप्पणी का स्मरण: गौरतलब है कि वर्ष 2023 में जब भरतपुर बार एसोसिएशन ने ऐसा ही विरोध जताया था, तब तत्कालीन सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कड़े शब्दों में कहा था कि “अभियुक्तों का बचाव करने से रोकना सरासर आपराधिक अवमानना है।”

    बड़ा सवाल

    जब देश की जेलों में बंद महज 7% से 8% विचाराधीन कैदी ही मुफ्त कानूनी सहायता (Legal Aid) का लाभ उठा पाते हैं, तब एक भली-भांति काम कर रही और त्वरित न्याय दे रही व्यवस्था को बंद कर देना क्या गरीब कैदियों को न्याय की उम्मीद से और दूर नहीं कर देगा?

    Shagun

    Keep Reading

    Nepal Flood Tragedy: The Most Harrowing Incident of Devastation

    नेपाल बाढ़ त्रासदी: तबाही का सबसे दर्दनाक हादसा

    रक्षाबंधन: परंपरा, पहचान और बाजारवाद का संगम

    Trump Trapped in a Labyrinth: US President's Mounting Difficulties Amid the Maze of an Iran War

    चक्रव्यूह में फंसे ट्रंप: ईरान युद्ध की भूलभुलैया में अमेरिकी राष्ट्रपति की बढ़ती मुश्किलें

    Maa Khaira Bhavani had appeared in the form of a divine beam of light.

    ज्योति पुंज के रूप में प्रकट हुईं थीं माँ खैरा भवानी

    People grappling with the unending problem of adulteration.

    मिलावट की अंतहीन समस्या से झूझते लोग

    India's Golden Burst at the Commonwealth Games: Boxing Makes History, Neeraj Shines Again

    कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का स्वर्णिम धमाका: मुक्केबाजी ने रचा इतिहास, नीरज ने फिर कमाल दिखाया

    Leave A Reply Cancel Reply

    Advertisment
    Google AD
    We Are Here –
    • Facebook
    • Twitter
    • YouTube
    • LinkedIn

    EMAIL SUBSCRIPTIONS

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    About



    ShagunNewsIndia.com is your all in one News website offering the latest happenings in UP.

    Editors: Upendra Rai & Neetu Singh

    Contact us: editshagun@gmail.com

    Facebook X (Twitter) LinkedIn WhatsApp
    Popular Posts
    The future belongs to clean, green, and sustainable energy: A. K. Sharma

    आने वाला समय स्वच्छ, हरित व टिकाऊ ऊर्जा का: ए. के. शर्मा

    September 10, 2026
    Axis Bank to accelerate Uttar Pradesh's development; launches ‘Sparsh Week 2026’ from Lucknow.

    उत्तर प्रदेश के विकास को रफ्तार देगा एक्सिस बैंक, लखनऊ से की ‘स्पर्श वीक 2026’ की शुरुआत

    September 10, 2026

    नालसा का एलएडीसी सिस्टम खत्म करने का फैसला: क्या गरीब कैदियों से छिन जाएगा न्याय का सहारा?

    September 10, 2026

    सर्फ पार्क अर्थव्यवस्था में एक नई ताकत

    September 9, 2026

    रूस और चीन के बीच बढ़ता रणनीतिक सहयोग एशिया की ऊर्जा वृद्धि के साथ वैश्विक बाजारों को दे रहा नया आकार

    September 9, 2026

    Subscribe Newsletter

    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading
    Privacy Policy | About Us | Contact Us | Terms & Conditions | Disclaimer

    © 2026 ShagunNewsIndia.com | Designed & Developed by Krishna Maurya

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.

    Newsletter
    Please enable JavaScript in your browser to complete this form.
    Loading