मेरा जीवन मेरी पसंदगी!
प्रीति श्रीवास्तव
भारतीय संस्कृति में हमेशा विष्णु-लक्ष्मी, ब्रह्मा-सरस्वती, शिव-पारवती, सीता-राम, राधा- कृष्ण आदि की परंपरा देखने में आती हैं, वैसे भी श्रष्टि की रचना के साथ जैसे आदम हव्वा की कहानी प्रचलित हैं या थी वैसे भारत में भी आदमी और औरत का होना बताया गया हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक रहे हैं । और पहले काल मेंयानि सतयुग में भाई बहिन में शादी का चलन रहा और उनसे उत्पन्न संतानों ने भी ऐसा ही क्रम रखा ,फिर त्रेता ,द्वापर और कलयुग में तो जनसख्या की वृध्दि से शादी में चुनाव का अवसर मिलने लगा।
ईश्वर ने सब जीव जंतुओं में पुरुष या स्त्री या स्त्रीलिंग और पुल्लिंग का जोड़ा बनाया तथा उनमे अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार इन्द्रियों की संरचना की। मानव में मन के अलावा पांच ज्ञान इन्द्रियाँ और पांच कर्मेन्द्रियों की संरचना हैं और पुरुष और स्त्रियों की शारीरिक संरचना ऐसी होने से और मन होने के कारण हम मन के वशीभूत होकर पांच इन्द्रियों के द्वारा भटकते रहते हैं। मन विहीन जीव भी इन्द्रियों के भूख शांत करने चलते फिरते हैं ,यदि यदि मानव और पशुओं को भूख की चिंता न हो तो कोई भी हलन चलन नहीं करना चाहता।
इतिहास में भी महिलायों के उत्थान के लिए अनेक धार्मिक ,पारिवारिक ,समाज सुधारकों का जन्म हुआ और उनके ऊपर कई अत्याचार होने पर ,कुरीतियों के कारण उनका बहुत शोषण हुआ। महावीर ,कृष्ण राम ने भी स्त्री वर्ग का उत्थान किया। राजा राम मोहन राय आदि ने सती प्रथा को समाप्त कर विधवा विवाह को बढ़ावा दिया । स्वतंत्रता संग्राम में भी महिलाओं ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। बीसवीं शताब्दी के अंत में आर्थिक स्थितियां या महगाई बहुत बढ़ी, शिक्षा का प्रसार प्रसार हुआ तो महिलाओं ने भी उच्चतम शिक्षा प्राप्त कर पुरुषों की बराबरी कर उनसे भी आगे बढ़ी पहले कालेज पर प्रतिबन्ध था। उसकी छूट मिलने से नौकरी या व्यवसाय के अवसर उपलब्ध हुए और इसके बाद उनका घर से बाहर कदम बढे और अब वे अब किसी से कम नहीं हैं ।
विगत 30 वर्षो के अंदर अब महिलाये अपने आपको शादी के बंधन में नहीं बंधना चाहती । इसके पीछे उनके तर्क यह हैं की शादी के बंधन से उनकी स्वतंत्रता में कमी आती हैं । और शादी के बाद परिस्थितियां बिलकुल बदल जाती हैं उनमे पारिवारिक जिम्मेदारी बढ़ जाती हैं जो उनकी प्रगति में बाधक होती हैं । दूसरा उन्हें अब पहले जैसे लाड प्यार की न जरुरत हैं और न वे उसको दुहराना चाहती हैं जैसे उनकी माँ ने उन्हें दुलारा।
आज महिलाएं आर्थिक संपन्न होने से वे शादी विवाह के दलदल में नहीं फंसना चाहती हैं उसके बाद बच्चों की देखरेख ,खाना बनाना ,साफ़ सफाई करना और अन्य गृहस्थी की म्मेदारी निभाना और परिवार बनाने के बाद परिवार जनों की देखरेख ,सेवा सुश्रा करना और बच्चों के बोझ को ढोना और पति के अनुरूप चलना । इस साथ एक प्रकार का अप्रत्यक्ष भय से ग्रसित होना की यदि ऐसा नहीं हुआ तो फिर क्या होगा । कोई वचनबद्धता से नहीं बंधना चाहती हैं । कुछ का यह सोचना हैं की शादी के बाद उनका कॅरिअर या उनका भविष्य या उनकी महत्वाकांछा का अंत क्योकि इस स्थिति तक आने में जो उनके द्वारा संघर्ष या कष्ट भोगा गया वह शादी के दांव पर नहीं लगाना चाहती।
भारतवर्ष में शादी दो व्यक्ति का न होकर दो परिवारों की होती हैं जिनमे बहुत सारे परिवार जन ,नाते रिश्तेदार होते हैं उनके साथ संबंधों को निभाने का डर रहता हैं । यह विवाह का डर सताता हैं । और शादी के बाद महिलाओं को अपना नाम के साथ पति की जाति का उल्लेख करने से उनके द्वारा पूर्व में अर्जित प्रतिष्ठा पर प्रभाव पड़ता हैं । इस प्रकार के तर्क बहुत अधिक प्रस्तुत किये जाते हैं । वीएस महिलाएं बहुत शक्तिशाली होती ही हैं पर शारीरिक संरचना उन्हें सुरक्षा चाहती हैं।
शादी एक प्रकार का अनुबंध होता हैं उसके बाद महिला पुरुष पति पत्नी बन जाते हैं और उनमे एक प्रकार का पंजीकरण हो जाता हैं चाहे उसे हम क़ानूनी ,सामाजिक ,पारिवारिक कहे उसके पालन में बंध जाते हैं । बिना शादी किये अनेक महिलायों ने बहुत आर्थिक जगत में उंचाइयी प्राप्त की और वे बहुत हद तक संतुष्ट हो सकती हैं पर शारीरिक इच्छाएं उनके लिए उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती होंगी पर अधिकांश से यह अपेक्षा रखना शायद नहीं होगा, भारत वर्ष में वर्ष 2105 में मात्र 15 । 6 मिलियन गर्भपात हुए हैं ये आंकड़े प्राइवेट ,घरेलु उपचार से ,या दवाइयां खाने से हुए है ,सरकारी आंकड़े अलग हैं । इनमे शादीशुदा ,और बीमारी की वजह से जो हुए हैं उनका रेकॉर्ड मिल जाता हैं पर बिना शादी किये ऑफिस में या लाइव इन रिलेशन में या पढ़ने के नाम पर या नौकरी के नाम पर दूरस्थ शहरों में रहकर जो महिलाएं रहती हैं उनका इसमें योगदान भी रहता हैं।
इसी प्रकार युवा वर्ग भी इस प्रकार की सोच से ग्रसित होकर कई बार झूठ बोलकर दो दो तीन तीन शादियां करते पाए गए हैं और इसका परिणाम अधिकांशतय महिलाएं ही प्रभावित होती हैं । कारण जब महिलाये गर्भवती होती हैं तब उसके दुष्परिणाम उनको भोगने होते हैं । इसकी अपेक्षा यदि वे स्वार्थभावना से दूर रहकर सामाजिक रीति से शादी कर अपना जीवन यापन कर सकती हैं जिससे उन्हें भयग्रस्त भी न होना पड़ेगा और मानसिक तनाव से मुक्त रहकर स्वाभिमान का जीवनयापन कर सके । आज गर्भपात की अधिकतम संख्या शादीविहीन युवतियां करा रही हैं । इसके कारण क्या हो सकते हैं ,खान पान ,अमर्यादित जीवन शैली ,घर से दूर भयरहित ,स्वच्छंदता और आमद कम और खरचा अधिक होने से इसके संत्रास में आती हैं ।
जीवन केवल आपके कॅरिअर पर नहीं बल्कि सुखद जीवन के लिए हैं । दूसरा शारीरिक भूख की पूर्ती के लिए अनैतिक कार्य करना पड़ता हैं या हो जाता हैं उस समय कोई अन्य साधन काम नहीं आता और स्त्रियों की अंतिम इच्छा मातृत्व में होती हैं । जैसे नपुंसक मनुष्य त्रिस्क्रत होता हैं और वैसे ही बंध्या स्त्री या अनब्याही स्त्री भी समाज में हिकारत की निगाह से देखी जाती हैं,इस सम्बन्ध में तर्क बहुत हो सकते हैं पर सच्चाई यह ही हैं । अतः यह विषय व्यापकता का स्थान रखता हैं और इसमें अनेकों विचारधारा काम करती हैं स्वाभाविक हैं कोई कोई इस बात से सहमत न हो पर सच्चाई सच्चाई होती हैं और सत्य पर कोई विवाद नहीं।







