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जीके चक्रवर्ती
गुजरात के चुनाव परिणाम आये हुए अभी चंद रोज ही गुजरे हैं और यदि इस राज्य में संपन्न हुए चुनाव के संपूर्ण क़वायद को गौर से देखें तो हमें यही कहना पड़ता है कि यह चुनाव मुखयः रूप से भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस के बीच जबरदस्त फाइट हुई वैसे तो इस चुनाव मे ख़ास मुकाबला बीजेपी बनाम कांग्रेस ही थी, लेकिन दूसरे अन्य छोटे-छोटे दलों बसपा जैसी पार्टियां भी यहां बड़ा खेल करने की कूवत रखने में पीछे नहीं थी। इस इलेक्शन में बसपा ने अपनी ताकत तो दिखाई ही साथ ही कई स्थानों पर बड़ी टक्कर भी दी इससे उसका वजूद तो बढ़ा ही साथ ही साथ वोटबैंक।
बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती गुजरात की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थी लेकिन मायावती का ये दांव इस चुनावी समर में दलित नेता जिग्नेश के सहारे बीजेपी को मात देने की कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी फेरने जैसी बातें भी सुनाई दी लेकिन इसमें प्रमुखयः बात यह है कि बीजेपी की धुर विरोधी पार्टी बसपा की मायावती की गुजरात में अपना अहसास कराना नहीं भूली।
राजनीतिक जानकारों की माने तो गुजरात में चूंकि मायावती सभी सीटों पर चुनाव लड़ी तो वे जिग्नेश के चलते दलित वोटों पर अपना हक जताने की कोशिश जरूर करेंगी वहीं पर रही कांग्रेस पार्टी के लिए खतरे की घंटी जैसी बातों के मध्येनजर ऐसा माना जा रहा था कि मायावती की गुजरात में एंट्री से कुछ दलित वोट अवश्य बंटेंगे जबकि अभी मौजूदा समय में बहुजन समाज पार्टी का गुजरात में कोई उल्लेखनीय जनाधार तो नहीं है जैसा कि बसपा पार्टी का अब तक यहाँ से अधिक एक से अधिक विधायक जीते अवश्य नहीं है लेकिन इसके बावजूद हाथी जब-जब यहां के चुनाव मैदान में उतरा है तो वह कई सीटों पर हार के बावजूद यहाँ पर लोगो की जीत तय करने में बड़ी भूमिका निभाई है।
यदि हम गुजरात में दलितों की संख्या की बात करें तो यहाँ पर लगभग 7 प्रतिशत दलित मतदाताओं के अलावा 11 फीसदी आदिवासी मतदाता हैं। इस राज्य की कुल 182 विधानसभा सीटों में से 10 फीसदी दलित बाहुल्य सीटें हैं। इसके अलावा 26 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां आदिवासी लोग चुनाव में जीत हार का फैसला तय करते हैं। यहाँ गुजरात में 40 विधानसभा सीटें ऐसी भी हैं जो दलित एवं आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। इनमें से 27 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए और 13 सीटें अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित हैं।
बहुजन समाज पार्टी के सुप्रीमो एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने 23 सितंबर 2017 को गुजरात में इसी वर्ष होने वाले चुनावो को ध्यान रखते हुए औपचारिक तौर पर अपनी पार्टी का चुनाव अभियान का शुभारंभ करते हुए बड़ोदरा में हुए एक रैली के जनसमूह को संबोधित करते हुए मायावती ने बीजेपी सरकार पर जमकर हमला बोलते हुये कहा कि गुजरात में भारतीय जनता पार्टी के शासन काल में दलितों को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया। इसी सन्दर्भ में अपना भाषण जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि यदि गुजरात में बसपा की सरकार बनी तो उना जैसी घटनायें पुनः दोहराने नहीं दिया जायेगा।
मायावती बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह एवं प्रधानमंत्री मोदी पर भी करारा प्रहार करते हुए कहा कि बाबा साहेब अंबेडकर के नाम पर इन दोनों नेताओं ने दलितों का वोट हासिल करने के लिए अपने आप को नाटकीय ढंग से सबके प्रस्तुत कर रहे हैं। वहीं पर मायावती ने यह भी कहा था कि मोदी एक लम्बे समय तक गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर आसीन रहते हुए उन्होंने वड़ोदरा में कभी भी अंबेडकर स्मारक बनने नहीं दिया।
इस दौरान मायावती ने दलितों पर हो रहे अत्याचारों एवं यहाँ पर फैले भेदभाव की घटनाओं से आहत होकर उन्होंने ऐसी धमकी भी दी थी कि यदि शंकराचार्यों ने दलितों के विरुद्ध होने वाले भेदभावों पर रोक नहीं लगाई तो यह लोग बौद्ध धर्म अपना लेंगे अपनी बात आगे जारी रखते हुए मायावती ने आगे कहा था कि “वर्त्तमान समय में बीजेपी दलितों की हीत के बारे में बात कर रही है। भाजपा शासित गुजरात राज्य में दलितों को कोई अधिकार नहीं है। वहीं पर यदि बसपा पार्टी जीतकर सत्ता में आई तो उना जैसी घटनाये पुनः नहीं होगी बल्कि दलितों को सम्मान भी दिया जायेगा।
वर्ष 2017 सितम्बर माह में बसपा ने लको महासंकल्प दिवस के रूप में मनाया। इसी दिन संविधान के निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेदकर ने समाज में फैले भेद-भाव एवं असामनता जैसे कुरीतियों से लड़ने का प्रण लिया था। इस मौके पर मायावती वड़ोदरा के संकल्प भूमि भी पहुंचीं थीं और वहां पर उन्होंने बीजेपी को आरक्षण विरोधी बताते हुए ये कहा कि भाजपा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने और डॉ. अंबेडकर को भारत रत्न देने तक का विरोध किया था।
बीएसपी पार्टी भले ही इस प्रदेश में अभी तक के हुए विधानसभा चुनावों में से एक भी सीट हासिल नहीं कर पायी हो, फिर भी यहां पर चुनाव लड़ने की उसके उत्साह में कोई अंतर नहीं पड़ा है जिसकी वजह से मौजूदा समय में इस प्रदेश के चुनाव में इस बार भी बसपा गुजरात प्रदेश की 182 सीटों पर अपनी पूरी ताकत के साथ उतरी। मायावती ने वर्ष 2002 के विधानसभा चुनावों में अपने 34 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, यह एक अलग बात है कि जिसमें से कोई उम्मीदवार जीत नहीं पाया था। वर्ष 2002 में बीएसपी को 0.32 फीसदी वोट मिले थे एवं वर्ष 2007 के विधानसभा चुनावों में बीएसपी ने वहां पर अपने 166 उम्मीदवारों को चुनाओं मैदान में उतारा था, उस वर्ष भी सभी को वहां हार का मुंह देखना पड़ा था लेकिन पार्टी को अपना वोट शेयर बढ़ाने में कामयाबी मिली थी। उसे वहां पर 2.62 फीसदी वोट मिले थे एवं वर्ष 2012 में बीएसपी 163 विधानसभा के सीटों पर लड़ी उसे 1.25 फीसदी वोट ही मिला पाया था। यहाँ पर यह स्पष्ट है कि वर्ष 2007 की तुलना में इस बार बीएसपी को अधिक नुकसान का सामना करना पड़ा था।
पिछले वर्षों में से वहां पर वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में जहाँ आदिवासी सीटों पर कांग्रेस का दबदबा हुआ करता था, वहीं पर अनुसूचित जाति की सीटों पर बीजेपी ने सेंध लगाई। इस राज्य की अनुसूचित जातियों (एससी) के लिए आरक्षित 13 सीटों में से केवल तीन वडगाम, कड़ी एवं दाणीलीमडा विधानसभाओं की सीट पर ही कांग्रेस पार्टी जीत हासिल कर पाई थी। वहीं पर बीजेपी वडोदरा, ईडर, गांधीधाम, बारदोली, असारवा जैसे 10 सीटों तक ही सिमट कर रह गई थी।
इसी तरह इस प्रदेश की 27 सीटों पर आदिवासी सीटों की बात करें तो हम यह देखेंगे कि इनमें से केवल एक सीट पर जदयू के छोटू वसावा चुने गए थे, बाकी के 26 सीटों में से 16 पर कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी, इनमें से केवल 10 सीटो ही बीजेपी के खाते में गई थी, मौजूद समय में जातिगत आंदोलनों की वजह से इन सीटों का संपूर्ण सियासी समीकरण ही बदला हुआ था जिस पर इन सबकी नजरें लगी हुई थी।
वहीं पर गुजरात में बीएसपी पार्टी के कारण बीजेपी को ही फायदा पहुँचा। वहीं पर अशोक भारतीय ने कहा कि बीएसपी के गुजरात चुनाव में उतरने से बीजेपी को फायदा और कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ेगा। इस पर कांग्रेस के राहुल गांधी ने जिग्नेश मेवाणी जैसे लोगों को गले लगाया है। फिर भी वे इस चुनाव में बहुत अधिक प्रभाव डालने में कामियाब नहीं हुए जिसका करण यह था कि जिग्नेश का आधार गुजरात में शहरी दलितों के मतदाताओं में है। इसके अतिरिक्त गुजरात जैसे प्रदेश के जमीन से जुड़े दलित नेता लोग बीएसपी के साथ खड़े हैं। इस परिपेक्ष में कांग्रेस पार्टी जिग्नेश का समर्थन लेकर भी बहुत ज्यादा करिश्मा करने में सफल नहीं हो सकी।
सुनील कुमार सुमन जैसे अंबेडकरवादी आदिवासी चेहरे ने कहा कि गुजरात में दलित चेहरे के रूप में जिग्नेश मेवाणी की एक पहचान जरूर बन चुकी है, भले ही वे अंबेडकरवादी आंदोलन से निकल कर न आये हों, लेकिन दलित आंदोलन के माध्यम से जिग्नेश मेवाणी ने गुजरात में अपनी पहचान बनाई। गुजरात में वे एक बहुत बडे चेहरे के रूप में भले ही न हो, लेकिन यह् बात भी सच है कि उनका आधार पूरे गुजरात राज्य में नहीं है, फिर भी ऊना जैसे क्षेत्र के आसपास के लिए वे काफी है। मायावती के स्वतंत्र चुनाव लड़ने से कांग्रेस को भी नुकसान अवश्य हुआ। लेकिन जिग्नेश जैसे दलित चेहरे के राहुल ग़ांधी के साथ होने पर भी इस बात का पार्टी को बहुत अधिक लाभ नहीं मिल पाया, वहीं पर सुमन जैसे दलित चेहरे का ऐसा कहना हैं कि गुजरात में दलित समाज के लोगों से ज्यादा आदिवासियों की अधिक भागीदारी है, परन्तु इन लोगों के अंदर राजनीतिक चेतना का अभाव होने के कारण उनका कहीं भी उल्लेख तक नहीं होता है। इनसब के अतिरिक्त आदिवासी समुदाय के लोगों के साथ कोई बड़ा नेता नही होने से गुजरात में इन लोगों की कोई पहचान नहीं है। मौजूदा समय में केवल इन आदिवासियों के मध्य एकमात्र RSS ही काम कर रहा है, जिसका फायदा बीजेपी को ही मिलना तय था।