हास्य व्यंग्य कथा: अरविन्द कुमार “साहू”

एक धोबी का गधा कुछ ज्यादा ही समझदार हो गया था। कपड़ों का गट्ठर लेके अपने आप ही घाट तक चला जाता था और वापस भी ले आता था । कोई कपडा छूट जाता था तो रेंक -रेंक कर धोबी को सावधान कर देता था। कोई चोर दिखाई दे जाय तो दुलत्ती भी झाड़ देता था। यहाँ तक कि वह इन्सान की बात भी समझने लगा था।
ऐसा धोबी का दावा था कि उसका गधा इशारों में सिर हिलाकर हाँ या ना में जवाब भी दे सकता था। धीरे – धीरे धोबी को गधे पर कुछ ज्यादा ही भरोसा हो गया । वह गधे से इन्सान की तरह बात करने लगा । लोगों में इसकी चर्चा फैलने लगी । बहुत लोग उसके घर गधे को देखने भी आने लगे । धोबी सबके सामने उससे पूछता कि ताजा हरी घास खाओगे ? तो जवाब में गधा दो बार ऊपर से नीचे की ओर सिर हिला देता । धोबी चहक कर कहता -“देखा ! मेरी बात समझ कर कह रहा है कि हाँ खाऊंगा।” लोग आश्चर्य से दाँतों तले ऊँगली दबा लेते । जब धोबी कहता कि गधे ! गाना गाओगे? तो गधा दो बार सिर को दायें से बांयी ओर हिला देता। तब धोबी ही – ही करके खीसे निपोर देता ,कहता – “देखा भाई ! मेरा गधा कह रहा है कि अभी मूड नहीं है। इस बात पर लोग तालियाँ बजा कर खुश हो जाते और कुछ लोग सौ -पचास रुपये पुरूस्कार भी दे देते। गधा और धोबी दोनों खुश ,नाम और दाम दोनों मिलने लगा था ।
पर आगे चल कर हुआ क्या कि धोबी को पैसे की लालच बढ़ने लगी। उसने गधे को कुछ और सिखा – पढ़ा कर अपनी ओर मिला लिया कि वह कुछ बातें धोबी के इशारे पर करेगा तो अधिक माल बटोरा जा सकता है । गधे को लालच दिया कि उसे भी बढ़ी हुई आमदनी के हिस्से से दूध – जलेबियाँ खाने को दी जायेंगी । फिर क्या था ,गधा भी साजिश में शामिल हो गया । दोनों में तय हुआ कि अब दर्शकों के बीच एक ऐसी प्रतियोगिता रखी जायेगी कि जिस की बात से गधा सहमति में ऊपर से नीचे की ओर सिर हिला देगा ,उसे पाँच सौ रूपये दिये जायेंगे। लेकिन अगर गधे ने इनकार में दाँये – बायें सिर हिलाया तो उस दर्शक को उल्टा पाँच सौ रूपये धोबी को देने पड़ेंगे । गधे को जान -बूझ कर इस तरह उत्तर देना था ,जिससे दर्शकों को कुछ बेवकूफ बना कर ज्यादा रकम ऐंठी जा सके और धोबी को ज्यादा कमाई हो जाय।
बहरहाल ,योजनानुसार अगले दिन धोबी ने आये हुए दर्शकों के सामने यह घोषणा कर दी । दर्शकों को विस्मय के साथ हर्ष भी हुआ कि यह तो बड़ी रुचिकर प्रतियोगिता है, जिसमे आदमी के गधे से बात करने की योग्यता भी परखी जाएगी और माल भी मिलेगा।
लोगों ने करतल ध्वनि से इसका स्वागत किया ,कुछ अति उत्साही लोगों ने गधे के पास जाकर गधे की तरह ” हीपों -हीपों ” की आवाज में रेंक कर भाईचारा जताया और कुछ ने तो बाकायदा दुलत्ती मारने की स्टाइल वाला कुछ -कुछ भांगड़ा जैसा डांस भी कर डाला । सारा माहौल गधामय हो गया । पहली बार गधे को लगा कि वह इस दुनिया में अकेला नही है । उसके स्वभाव की और भी प्रजातियाँ है । विशेष कर आदमी भी एक तरह से गधे जैसा ही है । सच में उसे पहली बार अपने गधेपन पर भारी गर्व महसूस हुआ।
उसने तो यहाँ तक कल्पना कर डाली कि यदि उसके पास काफी रूपया आ गया तो, इनमे से कुछ गधों को छांट कर एक पार्टी बना लेगा और चुनाव जीत कर इन भाई – बन्धुओं पर आसानी से शासन भी कर सकता है । वह सपनों की दुनिया में डूबने ही वाला था कि धोबी की आवाज़ से उसकी तन्द्रा भंग हो गयी । धोबी कह रहा था –“हाँ तो भाइयों आप में से कोई दर्शक आगे आकर शर्त के अनुसार गधे से सवाल पूछकर उससे ” हाँ ” में सिर हिलावाए और पाँच सौ रूपये का नगद इनाम ले जाये।

अरविन्द साहू वरिष्ठ कवि एवं कहानीकार है और उनकी रचनाये तमाम समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं अभी हाल ही में सूरज पॉकेट बुक्स ने उनकी 2 किताबे प्रकाशित की हैं और वह सभी किताबें https://www.amazon.in/dp/B079TCMJ8X/ref=cm_sw_r_wa_awdo_t1_UboHAbKPJ1H06https://www.amazon.in/dp/B079TC83T3/ref=cm_sw_r_wa_awdo_t1_mcoHAbAYVK8BE पर बिक्र्री के लिए उपलब्ध हैं।
मेरे मोहल्ले का बीहड़ कवि बौड़म भी वहाँ घूमते -घूमते पहुँच गया । बीहड़ इसलिए कि एक बार भूल से उसे डाकू उठा ले गये थे। किसी ने फिरौती की रकम तो नही पायी लेकिन अपनी कविताओं से बौड़म ने उनको इतना परेशान किया था कि उनके कई अपहृत बिना फिरौती दिये ही रस्सियाँ तुड़ाकर भाग निकले थे । परेशान डाकुओं ने पाँच हजार रूपये जेब से खुद बौड़म को देकर जान छुड़ाई थी और धन्धा बचाया था। ….. और ” बौड़म ” नाम क्यों पड़ा ?, ये बताने की जरुरत नही पड़ेगी । आगे आप खुद समझ जायेंगे।
–“हाँ -हाँ ,क्यों नही ? मैं आता हूँ “। पहला दर्शक कवि बौड़म गधे के पास आकर उसके कान के पास बोला — “गधे भाई” ! सुना है आप हम आदमियों से भी ज्यादा समझदार हैं, क्या यह सच है ?”
गधे ने आदमी से पहली बार अपने लिए ” भाई ” शब्द सुना था । वह भीतर तक करुणा व प्रसन्नता से भीग गया । ऐसे आदमी के सानिध्य में आकर थोड़ी देर के लिये ही सही , वह सचमुच आदमी हो गया । क्षणिक रूप से उसका गधापन कहीं खो गया । वह सोच में पड़ गया , हाँ में सिर हिलाये कि नही । गधे का लाभ देखे या आदमी का । धोबी की माने या अभी – अभी पैदा हुई गधेनुमा इन्सानियत की । उसे सोच में पड़ा देख कर कवि बौड़म ने फिर पुचकारा – “किस सोच में पड़ गये “भाई” ?”
अब की गधे का संशय पूरी तरह दूर हो गया। दुनिया जाति – बिरादरी पर मरती है , फिर मैं क्यों नहीं । वह पूरी तरह पिघल चुका था । उसने बड़े ही भावपूर्ण ढंग से ऊपर – नीचे सिर हिला कर “हाँ” में सहमति जता दी । कवि बौड़म प्रसन्नता से चीख उठा – ‘मैं जीत गया – मै जीत गया ” , -‘मैं जीत गया – मै जीत गया “। लाओ धोबी जी , मेरे पाँच सौ रूपये दो ।” धोबी ने बुझे मन से रूपये दे दिये । इनाम पाकर वह ख़ुशी से यही कविता जोर – जोर से पढने – गाने लगा , दुलत्ती स्टाइल वाला भांगड़ा भी नाचने लगा । गधे को उसकी ख़ुशी देखकर काफी राहत मिली कि पहली बार अपनेपन से किसी अपने के लिये कुछ करने का मौका मिला था । उसने आदमी और गधे के बीच के अन्तर को पाटने की दिशा में एक महत्व पूर्ण कदम उठाया था, जो इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा । गधा दार्शनिक होने ही वाला था कि धोबी की लताड़ ने उसे फिर गधा होने का आभास दिला दिया । –“अबे ! तू गधे का गधा ही रहेगा क्या ? सारी योजना का बंटाधार कर दिया । इस तरह से तो तू मुझे कंगाल कर देगा । अपनी दूध – जलेबियाँ छोड़, हरी घास खरीदने के पैसे भी नही बचेंगे । इंसानों जैसा सोचेगा तो गधा भी नही रह पायेगा ।“
गधे को अपनी गलती का आभास जल्दी हो गया । उसने सहमति में ऊपर -नीचे सिर हिलाया कि अगली बार ऐसा नही होगा । धोबी ने फिर दर्शकों को बुलाना शुरू किया –“देखा भाइयों ! गधे ने पहले दर्शक को ही पाँच सौ पतिया बना दिया है । इस तरह से आगे आप लोग हजारपति ,पाँच हजारपति या दस हजारपतिया भी बन सकते हैं । अगला दर्शक आये और गधे से हामी भरवा कर दिखाए ” ।
एक नया दर्शक आया । गधे के पास जाकर कान में बोला — “हरी घास खायेगा ?”
गधे का मन तो हुआ कि हाँ कर दे ,किन्तु जैसे ही उसे दूध- जलेबी का खयाल आया , उसने तुरन्त इन्कार में सिर हिला दिया । धोबी चहक उठा –“भाई ! आपके तो पाँच सौ रूपये गये । दर्शक रूपये देकर मुंह लटकाए बाहर निकल गया । धोबी ने फिर कहा – “कोई और भाई आयेगा ?”
एक – एक करके कई लोग आये ,पर गधा सावधान था । उसने ठान ली थी कि इन्सानी भावना में बहकर किसी को भी “हाँ” नहीं करेगा । इस तरह धोबी ने योजनानुसार मोटा माल बना लिया । दर्शक ठगे से खड़े रह गये । –“कोई और है …..?
काफी देर तक कोई नहीं आया । कवि बौड़म काफी देर से देख रहे थे । उनसे बर्दाश्त नही हुआ तो फिर आगे बढ़े और बोले –“मैं दोबारा सवाल पूछना चाहता हूँ “। धोबी के कान खड़े हो गये । इसी ने तो बोहनी खराब की थी , मुआ , फिर आ गया । अबकी गधा भरोसेमन्दी दिखा रहा था । उसने सोचा क्यों ना पहला घाटा इस से वसूल लिया जाय ?, अच्छा मौका मिल गया था। धोबी बोला बिलकुल जनाब ! लेकिन इस बार शर्त पाँच सौ की नहीं ,बल्कि एक हज़ार की होगी ।”
कवि बौड़म ने भी ज्यादा देर नही सोचा, बोले—“ ठीक है ,मेरा भी तो फायदा ज्यादा हो सकता है ” । वह फिर गधे के पास गये ,बोले –“भाई ! एक नई कविता अभी -अभी आप ही पर लिखी है । आप जैसा गधारत्न मैंने कहीं नही देखा । आपकी सुन्दरता , समझदारी और गधेपन की तारीफ का मेरा अन्दाज़ ही निराला है। जो आपको सारी दुनिया में मशहूर कर देगा। गधे भाई ! मेरा मन करता है कि मैं आपको यह जरुर सुना दूँ । सुनाऊँ…… ?”
गधा गदगद हो गया । मेरी इतनी इज्जत किया , मेरे ऊपर ही कविता लिख दी । अब तक तो लोग भगवान , प्रकृति ,फूल या अपनी प्रेमिका पर ही कवितायें लिखते थे । इसने मुझे जबान से ही नही बल्कि दिल से भी भाई मान लिया है । मुझे इसकी कविता जरूर सुननी चाहिए । वह पूरी तरह से भावनाओं में बह गया था । उसी झोंक में उसने फिर से ” हाँ” में सिर हिला दिया ।…. दो बार ऊपर से नीचे की ओर ।
कवि बौड़म तो निहाल हो गया । धोबी से एक हज़ार लेकर फटाफट जेब में ठूँसे और चीख -चीख कर कविता सुनाने लगा । लोग पहले तो हँसे ,फिर ऊबे और फिर सिर पकड़ कर भागने लगे । गधे को अब समझ में आया कि माहौल में क्या हो गया था । उसे खुद भी लगा कि यदि जल्द यहाँ से नही भागा तो वह भी पागल हो जायेगा । उसने आनन – फानन में ही दुलत्ती झाड़ी और रस्सी तुड़ा कर भाग निकला । उसके पीछे धोबी भी दौड़ गया , उसे पकड़ने के लिये । सारा माहौल अजीब हो गया । कवि बौड़म ने जब गाना बन्द किया तो वहाँ सन्नाटे के आलावा कोई और नही बचा था .।
बहर हाल , उनकी जेब गरम थी । वे प्रसन्न चित्त अपने घर लौट आये । धोबी से रूपये कमाने का आइडिया उन्हें बहुत अच्छा लगा था | रात बड़े चैन से सोये ।
उधर धोबी भी जब गधे को लेकर घर पहुँचा तो उसकी जमकर खबर ली ।–“घाटा भी कराया और मौके से भाग भी निकला था, भला क्यों हुआ ऐसा ? उसने गधे को प्यार से समझाया कि अपना गधापन और इन्सानियत दोनों को मिलाकर जज्बाती होना ठीक नहीं । उसे केवल अपनी कमाई और फायदे पर ही ध्यान देना चाहिये । “ठीक है “—गधे ने सहमति में सिर हिलाया और अगले दिन फिर दर्शकों की मंडली में धन्धा चालू हो गया । धोबी ने सुबह – सुबह दो लोगों से ही रूपये ऐंठे थे कि तीसरा बनकर कवि बौड़म फिर हाजिर हो गया । धोबी उसे देखते ही गधे की तरह बिदक गया –“आज तुम्हे मेरे गधे से “हाँ” की जगह “ना” करवाना पड़ेगा । कवि बौड़म बोला –“ठीक है | लेकिन इस बार शर्त पाँच हजार रूपये की लगेगी ।“
—- “ठीक है एक ही बार में पुराना घाटा भी निकल आयेगा “। धोबी ने थोडा सोचकर कहा-“आइये !”
कवि बौड़म ने गधे के पास जाकर कहा –“कल की कविता तो आपको बहुत पसन्द आयी होगी ? हाँ या ना ?”
अब गधा इतना भी गधा नही बनना चाहता था कि बौड़म की कविता को अच्छा कहकर फिर मुसीबत मोल ले ले । उसने झट से इनकार करते हुए “ना” कहने के लिए दायें -बाएँ को सिर हिला दिया । बौड़म ख़ुशी से उछल पड़ा –“भाई ! सचमुच तू तो बहुत ही होशियार है “।
गधा बेचारा करे तो क्या ? वह फिर से गधा बन गया था । मन मारकर धोबी ने बौड़म को पाँच हजार दे दिए और कहा कि वह अब चलता बने । बौड़म फूट लिया ।
लेकिन कहते है कि शेर के मुँह एक बार भी अगर आदमी का खून लग जाये तो आदमखोर बनकर ही मानता है । इसी तरह इन्सान को पैसे कमाने का चस्का लग जाये तो वह भी गलत -या सही कैसा भी तरीका हो, जल्दी नहीं छूटता । धोबी – गधे और कवि बौड़म दोनों पर यही बात लागू हो चुकी थी । घाटे को पाटने और नया माल काटने की गरज से धोबी की महफिल अगले दिन फिर जम गयी ।
सिलसिला शुरू हुआ । लोग आते गये , हारते गये । आज धोबी और गधा दोनों चौकस थे ,सो मोटी कमाई हो गयी । महफिल खत्म होने ही वाली थी कि तभी कवि बौड़म वहाँ फिर जा धमके ।–“ मैं आज भी किस्मत आजमाना चाहता हूँ ।“
धोबी को उसे देखते ही बड़ी चिढ़ हुई ,पर करे तो क्या ? मना करता तो दर्शकों के बीच पोल खुल जाती । मन मारकर बोला –“ठीक है, लेकिन आज फिर शर्त बदली जायेगी । तुम्हे एक बार गधे से “हाँ” और दुबारा “ना” भी बुलवाना होगा ।”
कवि बौड़म पहले तो हडबड़ाया ,फिर हिम्मत कर के बोला –“ठीक है, लेकिन रूपये भी दस हजार लूँगा । देने पड़ेंगे ।”
धोबी भी ताव में आकर बोला –“ठीक है, आ जाओ । आज हिसाब बराबर ही हो जाये | बहुत माल काट लिये । बात करो गधे से “।
कवि बौड़म आराम से गधे के पास गया । गधे से बोला –“पहला सवाल –पहचाना मुझे ?”
इतनी भीड़ में गधा भला झूठ कैसे बोल सकता था ? वैसे भी इस कवि का कारनामा वो जिन्दगी भर नही भूल सकता था । भाई बताकर सचमुच का गधा बना गया था | लेकिन गधे का गधापन इतना भी नहीं मरा था कि आदमी की तरह अपने फायदे के लिये इतनी जल्दी बदल जाय । उसे बड़े अफ़सोस के साथ “हाँ” में ऊपर -नीचे सिर हिलाना ही पड़ा । कवि बौड़म बेहद खुश हुआ ,बोला –“अब अगला सवाल –मैं आज भी आपको अपनी कविता सुना दूँ ?”
गधे के तन -बदन में झुर -झुरी सी दौड़ गयी । उसका दिल चाहा कि वह ज़ोरों से चीख पड़े -नही !!!!!!!!!!!
उसने बड़ी तेजी से कई बार दायें – बायें सिर को “इन्कार ” में हिलाया ,फिरकवि बौड़म के डर के मारे रस्सियाँ तुड़ाने के लिये उछल -कूद मचाने लगा । कवि बौड़म भाग कर धोबी के पास पहुँचा —“लाओ , जल्दी से मेरे दस हजार निकालो ,नही तो अभी कविता सुनाना शुरू कर दूँगा ।”
धोबी की सिट्टी -पिट्टी गुम हो चुकी थी । उसने रूपये बिना गिने ही बौड़म की हथेली पर रख दिये । अब तक कविता सुनाने की धमकी पाकर गधा भी रस्सियाँ तुड़ा कर भाग निकला था । धोबी सब छोडकर उसके पीछे भाग निकला । उसके पीछे कवि बौड़म भी भागने लगा ,चिल्लाते हुए कि मेरे रूपये तो पूरे दे दो । लेकिन अब किसको किसकी पड़ी थी ? आगे -आगे गधा ,उसके पीछे धोबी ,उसके भी पीछे लगा कवि बौड़म और यह सब देखकर पूरा मज़ा लेने के लिये तमाशबीन बने लोग भी भागने लगे । हमने देखा कुछ लोगों के हाथ में सड़े टमाटर , अंडे और जूते – चप्पलें तक थी । लेकिन किसके लिये ? पता नही । आपको कुछ पता चले या समझ में आये तो जरूर बताइयेगा ।
लेखक वरिष्ठ कहानीकार है, मोबाइल –09451268214







