Share Facebook Twitter LinkedIn WhatsApp Post Views: 590 इस पाले से वे गए, उस पाले में रेंग। सबके घर में है लगी, इक दूजे की सेंध।। इक दूजे की सेंध, दोपहर- सुबह हो शाम, घर का आयाराम, पता कब गयाराम हो, खुद पर नहीं यकीन, कौन अब किसे संभाले। उस पाले के लोग, भला कब हो इस पाले में।। सीएम त्रिपाठी
‘पुस्तकें मन को एकाग्र कर परंपराओं से जोड़ती हैं’-ब्रजेश पाठक; ईशा-मीशा रतन की कथक प्रस्तुति ने मोहा मन