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    अदालत के फैसले के खिलाफ भारत बंद अराजकता और न्यायिक अवमानना

    By April 2, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    मृत्युंजय दीक्षित

    सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति यू यू ललित की खंडपीठ ने एक ऐेतिहासिक फैसले में अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के दुरूपयोग पर सहमति जताते हुए इसके तहत मिलने वाली शिकायत पर स्वतः एफआईआर और गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। कोर्ट का कहना है कि अधिनियम के तहत किसी सरकारी कर्मी की गिरफ्तारी से पहले उपाधीक्षक या उससे ऊर क स्तर के अधिकारी द्वारा प्ररांभिक जांच कराना अनिवार्य होना चाहिये। एफआईआर और गिरफ्तारी को लेकर दिशा निर्देष होना चाहिये । संबंधित प्रशासन की पूर्व अनुमति के बाद ही उसकी गिरफ्तारी हो सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट माना है कि एक्ट का दुरूपयोग हो रहा है। यह बात अक्षरशः सत्य सिद्ध और साबित है कि इस कानून का बेतहाशा दुरूपयोग हो रहा था तथा दलितवाद की राजनीति करने वाले तमाम क्षेत्रीय व स्थानीय दल संगठन इस कानून का अपने पक्ष में दुरूपयोग करते थे। इस कानून के माध्यम से यह सभी दल सवर्ण समाज के प्रति तानाशाही का रवैया अपनाकर उनके ऊपर बेतहाशा फर्जी मुकदमे तक दायर करवा दिये थे। उप्र सहित देश के तमाम अन्य राज्यों में भी स्थानीय स्तर पर दलितों को बहकाकर रखने के लिए इस कानून के माध्यम से सवर्ण समुदाय के लोगों पर अत्याचार किये जा रहे थे। ग्रामीण क्षे़त्रों व छोटे शहरों में इस प्रकार की वारदातें बहुतायत में हुई हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि पंचायत नगर निगम या अन्य चुनावों में लोग इस एक्ट की आड में राजनैतिक प्रतिद्वंदियों के खिलाफ फायदा उठाने की कोशिश करते हैं।

    Image result for bharat bandविगत 30 वर्षो में संपत्ति विवादों और पैसों के लेनदेन के मामले में इस एक्ट को हथियर के तौर पर इस्तेमाल किया गया। कोर्ट ने कहा कि समाज में सुविधाविहीन तबके के किसी भी तरह के अत्याचारों से बचाने की जरूरत है। कानून जातिगत विद्वेष नहीं फैला सकता कोर्ट को यह सुनिश्चित करना होगा। संविधान की प्रस्तावना मार्गदर्शन करने वाले तारे की तरह है इसी के जरिये स्वतंत्रता, समानता और भातृत्व जैसे मूल्यों को सिखाया गया है।

    भारत में दो ऐसे कानून बने जिनका सर्वाधिक दुरूपयोग हुआ तथा बहुत दिनों से जिसमें एक एससी एससी एक्ट और दूसरा दहेज निवारणा अधिनियम। इस कानून का इतना अधिक दुरूपयोग हो रहा था कि अकेले 2016 में दलित प्रताड़ना के 5347 मामले दर्ज हो गये। इसकी अनदेखी तो नहीं की जा सकती, वैसे भी अदालतों में काम का बोझ बेतहाशा बढ़ गया है तथा बहुत से मुकदमे फर्जी भी लगे हुये है। आज सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को ठीक करने का सराहनीय प्रयास किया है। लेकिन देशहित में सुनाये गये इस फैसले को स्वार्थ की राजनीति करने वाले दलों, संगठनों को कोर्ट की यह बात हजम नहीं हुई तथा अपनी आदतों से मजबूर होकर बयानबाजी, धरना- प्रदर्शन जनसभाये तथा अब भारत बंद के आयोजन होने लग गये। दलितवाद की राजनीति करने वाले सभी तथाकथित दलों को मिर्ची लग गयी और उन्हें केंद्र सरकार व पीएम मोदी की सरकार को घेरने का तथा उन्हेें ध्वस्त करने का एक बड़ा बहाना मिल गया । कोर्ट के फैसले के खिलाफ भारत बंद रखा जा रहा है। जिसका कई जगहों पर व्यापकर असर दिखलाई पड़ा है। कई जगह तोड़ फोड़ हुई, आगजनी की गयी हैं। रेल सेवा बाधित की गयी है। अगर निष्पक्ष नजरिये से देखा जाये तो भारत बंद का ऐलान व देश में मचायी जा रही अराजकता इस बात का संकेत है कि जब सुप्रीम कोर्ट अयोध्या विवाद पर कोई ऐतिहासिक फैसला सुनायेगा तब भी इसी प्रकार की जन भावनाओं का ज्वार सड़कों पर उमड़ पड़ेगा। अब कोर्ट को अब यह सब भी देखना पड़ेगा। एक प्रकार से कोर्ट के फैसले के खिलाफ इस प्रकार की आक्रामक कार्यवाही को न्यायिक अवमानना के दायरे में आना चाहिये। भारत बंद पूरी तरह से राजनैतिक स्वार्थो की पूर्ति के लिए दलित भावनाओं के ज्वार को उभारकर अपना राजनैतिक हित साधने के लिए बुलाया गया है। भारत बंद उन विपक्षी दलों की ओर से किया गया आंदोलन है जो अभी तक पीएम मोदी की लोकप्रियता की जमीन को उखाड़ फेकने में असमर्थ रहे है तथा उनके सभी प्रयास विफल रहे हैं। यह सभी दल नहीं चाहते कि भारत में सामाजिक समरसता का वातवरण बन सके। भारत का समाज मजबूत बन सके तथा भारत एक मजबूत राष्ट्र बन सके। इन दलों व दलित सांसदोें की जमीनी राजनीति के चलते सरकार को भी दबाव में आकर कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने को मजबूर होना पड़ा है।

    आज देश में दलित व पिछडे़ समाज को एक से बढ़कर एक सहायता दी जा रही है। आखिर वह भी देश का नागरिक है लेकिन इन तथाकथित संकीर्ण राजनैतिक विचारधारा वाले दलों के ने केवल इनको अपना वोटबैंक समझ लिया है। सपा और बसपा जैसे दल चाहते है कि यह लोग केवल हमारे है। इन पर किसी और का अधिकार हो नहीं सकता। इस कानून के सहारे सवर्ण समाज पर बेतहाशा अत्याचार हो रहे थे तथा यह दल अपनी विकृत राजनैतिक रोटी सके रहे थे जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा प्रहार किया है। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस फैसले की पूरे देशभर में सराहना होनी चाहिये थी आज उसका विरोध हो रहा है तथा वह भी भारत बंद तथा उसकी आड़ में अराजकता व गंडागर्दी करवाकर। आज जहां -जहां धरना प्रदर्शन हो रहा हैं वहां पर केवल पीएम मोदी विरोधी नारेबाजी ही की जा रही है। जिससे इसका आयोजन करने वाले दलों व संगठनों की मंशा पर वास्तविक सवालिया निशान भी खड़े हो रहे हैं। सामाजिक संतुलन की दृष्टि से दलित कानून के दमनकारी पक्ष को परिमार्जित करने की इस अदालती पहल का सर्वासमाज द्वारा स्वागत होना चाहिये था लेकिन उसका सुनियोजित साजिश के तहत विरोध हो रहा है। जिन लोगों ने आज देश में अराजकता व एक वर्ग विशेष के खिलाफ जो भय का वातावरण उत्पन्न किया है क्या वह सब भी न्यायिक परधि में आ सकता है?

    भारत बंद के खिलाफ पूरे देशभर में जो प्र्रदर्शन किये जा रहे हैं उसमें उप्र के मेरठ में पुलिस चैकी को आग के हवाले कर दिया वहीं दो बसांे को आग लगा दी कई जगह जाम लगा दिया गया है। पूर देश भर से बंद समर्थकों व विरोधियों के बीच मारपीट व हिंसक झड़पों की वारदातें हुई हैं। कई जगहांे पर बंद को देखते हुए रेल, बस सेवा तथा हवाई यातायात और इंटरनेट सेवा को बंद कर दिया । आजादी के 70 साल बाद भी जातिगत और आरक्षण की राजनीति पर अपनी राजनैतिक रोटियां सभी दल कर रहे है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अब किसी को भी सबका साथ सबका विकास का नारा पसंद नहीं आ रहा सभी लोगों ने अपनी पुरानी राह को पकड़ लिया है। किसी भी दल ने देश हित व समाज हित में इस फैसले को नहीं पड़ा और लग गये अपनी राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति करने में।

    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार है 

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