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    विपक्ष का प्रस्ताव: न्यायपालिका पर अनुचित राजनीति

    By April 21, 2018 Current Issues No Comments8 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    जनता की अदालत में लगातार मिल रही हार से कांग्रेस कोई सबक लेने को तैयार नहीं है। नकारात्मक मुद्दे उसको लगातार नुकसान कर रहे है। उसकी विश्वसनीयता का ग्राफ भी कम हो रहा है। अब उसने अपने ही जैसे दलों को लेकर मुख्य न्यायधीश के खिलाफ मोर्चा खोला है। जिन दलों ने प्रस्ताव का समर्थन किया है, जनता के बीच उनकी दशा से अनुमान लगाया जा सकता है।  नकारात्मक राजनीति से ये अपने को चर्चा में रखना चाहते है। कांग्रेस, एनसीपी, सपा, बसपा, भाकपा, और मुस्लिम लीग ने इसका समर्थन किया है। यह अच्छा है कि प. बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस , उड़ीसा की बीजू जनता दल, द्रमुक आदि ने इसका विरोध किया है। कांग्रेस में भी विरोध के स्वर उठे है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किये। सलमान खुर्शीद ने दशकों बाद कोई ठीक बात कही। उन्होंने प्रस्ताव को गैरजरूरी बताया। सपा, बसपा, कांग्रेस अपने सबसे दयनीय दौर में है। सरकार को परेशान करने वाला कोई मुद्दा देखते है, तो उसके पीछे दौड़ जाते है। मुस्लिम लीग को साथ देखा तो लपक लिए। जबकि उत्तर प्रदेश की राजनीति से इस विषय का कोई लेना देना नहीं।
    इसके अलावा इस विषय पर जिस प्रकार प्रेस कांफ्रेंस की गई, वह भी न्यायपालिका की गरिमा के प्रतिकूल थी। सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति ए के सीकरी और अशोक भूषण की पीठ को कहना पड़ा कि जो कुछ हो रहा है उससे व्यथित है। संविधान के अनुच्छेद 121 के अनुसार किसी जज के आचरण पर संसद में भी एक सीमा से अधिक चर्चा नहीं हो सकती। इस पर पाबंदी लगाई गई है। यह प्रावधान बहुत सोच समझ कर रखा गया था। संविधान निर्माता यह नहीं चाहते थे कि न्यायपालिका पर सार्वजनिक चर्चा होती रहे। लेकिन कपिल सिब्बल, गुलाम नवी आजाद आदि नेताओं ने हद कर दी। उन्होंने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके मुख्य न्यायधीश पर हमला बोला। यह कार्य जस्टिस लोया पर आए निर्णय के चौबीस घण्टे के भीतर किया गया।
    ये पार्टियां न्यायपालिका से भी अपने अनुकूल निर्णय की उम्मीद करती है। उसे अयोध्या राम मंदिर की सुनवाई पसन्द नहीं है। कांग्रेस के एक दिग्गज इसे टालने की गुजारिश भी कर चुके है। वह खुद भी सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकील है।  कांग्रेस को तीन वर्ष बाद न्यायमूर्ति लोया का प्रकरण ध्यान आया। इसमें भी वह अपनी मर्जी के अनुरूप फैसले की उम्मीद कर रही थी । सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया तो स्थिति साफ हुई। यह माना गया कि राजनीतिक उद्देश्य से यह मसला उठाया गया था।
    जबकि संविधान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायधीश को उसके पद से केवल प्रमाणित दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है। इसके लिए संसद में  प्रस्ताव लाया जाता है। संसद के दोनों सदनों अर्थात लोकसभा और राज्यसभा को अलग अलग अपने सदस्यों के बहुमत की उपस्थिति और मतदान करने वाले सदस्यों के दो तिहाई मत से प्रस्ताव पारित करना होगा। इसके बाद वह प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास अनुमोदन के लिये भेजा जाता है। राष्ट्रपति उस न्यायधीश की पदच्युति का आदेश जारी करते है। इसे महाभियोग नहीं कहा जाता। यह मोशन फ़ॉर प्रेजेंटिंग  एनमोशन टू द प्रेजिडेंट फ़ॉर रिमिवल ऑफ द जज होता है। अर्थात संसद द्वारा प्रावधानों के अनुरूप पारित प्रस्ताव के बाद राष्ट्रपति संबंधित जज को पदच्युत करेंगे।
    संविधान के इस अनुच्छेद 124 पर विचार करें तो कांग्रेस और उसके साथियों का प्रस्ताव हास्यस्पद लगेगा। ये सब जमीन आसमान एक कर दें , तब भी मुख्य न्यायधीश के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं होगा। यह विपक्ष का मात्र राजनीतिक पैतरा है। इसका निंदनीय पक्ष यह है कि उसने अपनी राजनीति के लिए कोर्ट को मोहरा बनाने में संकोच नहीं किया। चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस का हवाला दिया गया। लेकिन उससे ज्यादा पूर्व न्यायधीशों ने उनसे असहमति व्यक्त की थी। आरोपों को पूर्वाग्रह से प्रेरित भी बताया गया था। कांग्रेस के नेता सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था को बचाने का दावा कर रहे है। जबकि सच्चाई यह कि भारत की न्यायिक व्यवस्था या सुप्रीम कोर्ट पर किसी प्रकार का खतरा नहीं है। कांग्रेस , कम्युनिस्ट पार्टियों के सामने जरूर खतरा है। आमजन में इनकी लोकप्रियता और विश्वसनीयता दोनों दांव पर लगी है।
    संविधान के अनुसार जज को केवल संविधान में उल्लखित प्रस्ताव से ही हटाया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 124 (4)-217(1) में सुप्रीम कोर्ट या किसी हाई कोर्ट के जज को हटाए जाने का प्रावधान है। किसी जज को हटाने के लिए जरूरी महाभियोग की शुरुआत लोकसभा के सौ सदस्यों या राज्यसभा के पचास सदस्यों की सहमति वाले प्रस्ताव से की जा सकती है। ये सदस्य संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को जज के खिलाफ प्रस्ताव चलाने की नोटिस दे सकते हैं। प्रस्ताव पारित होने के बाद संबंधित सदन के अध्यक्ष तीन जजों की एक समिति का गठन करते हैं।
    समिति में सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा जज, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और एक कानून विशेषज्ञ को शामिल किया जाता है। ये समिति संबंधित जज पर लगे आरोपों की जांच करती है। जांच पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष को सौंपती है। इसके बाद भी आरोपी जज, जिनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है, को भी अपने बचाव का मौका दिया जाता है। अध्यक्ष को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में अगर आरोपी जज पर लगाए गए आरोप सिद्ध हो रहे हैं तो बहस के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए सदन में वोट कराया जाता है। इसके बाद भी किसी जज को तभी हटाया जा सकता है जब संसद के दोनों सदनों में 2/3 मतों से यह प्रस्ताव पारित किया जासकता है। विपक्षी दलों ने कांग्रेस की अगुवाई में शुक्रवार को उपराष्‍ट्रपति वेंकैया नायडू से मुलाकात की और उन्‍हें इस संबंध में नोटिस दिया। इस पर सात विपक्षी दलों के  चौसठ सांसदों ने हस्‍ताक्षर किए हैं।
    लेकिन प्रेस काफ्रेंस में जो तर्क दिए गए उनके आधार पर जज के खिलाफ प्रस्ताव लाया ही नहीं जा सकता। अनेक संविधान विशेषज्ञों ने भी इस मुहिम का  विरोध किया है। इसमें कोई दम नहीं है।  उनका यह भी कहना है कि महाभियोग प्रस्ताव का कारण पद का दुरुपयोग और दुर्व्यवहार नहीं बल्कि यह पूरी तरह से राजनीतिक है। पूर्व अटर्नी जनरल सोली सोराबजी ने कहा कि न्यायापालिका की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाने वाला  घातक कदम है।   महाभियोग का कोई आधार नहीं है। जस्टिस ढींगरा के अनुसार इस प्रताव में  विगत बारह जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के चार जज की प्रेस कांफ्रेंस में उठाए गए मुद्दे ही झलक  हैं।
    जस्टिस सिन्हा और वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने कहा है कि न्यायापालिका के लिए यह दुखद दिन है। यह जज लोया के मौत मामले पर फैसले की अगले दिन की प्रतिक्रिया भर है। प्रस्ताव स्वीकार किए जाने पर सुप्रीम कोर्ट के एक जज, हाई कोर्ट के एक जज और एक कानून के जानकार की तीन सदस्यीय समिति गठित की जाती है जो इस मामले की जांच करते हैं। अगर यह समिति प्रस्ताव का समर्थन करती है तो सदन में इसकी रिपोर्ट पेश करती है। अगर दोनों सदन इस रिपोर्ट को दो तिहाई बहुमत से पास करती है तो महाभियोग पारित हो जाता है।
    यह प्रस्ताव विपक्ष की विश्वसनियता को चौपट करने वाला। इन्होंने जस्टिस लोया पर आये निर्णय के फौरन बाद मुख्य न्यायधीश पर हमला बोला है। इसके लिए बारह जनवरी को चार जजो की प्रेस कांफ्रेंस का सहारा लिया गया। जस्टिस लोया की मृत्यु को कोर्ट ने स्वभाविक माना था। तीन साल पहले न्यायाधीश बीएच लोया की मौत स्वाभाविक कारणों हुई थी और उनकी मौत को संदिग्ध बताने वाली जनहित याचिकाओं में “बिल्कुल कोई योग्यता” नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ये निष्कर्ष निकाला। सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मौत के बारे में भविष्य के किसी भी सवाल को बंद कर दिया।
    मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की पीठ ने तीन पहलुओं पर अपना ये निष्कर्ष निकाला। एक, चारों न्यायाधीशों और न्यायाधीश लोया के सहकर्मियों द्वारा महाराष्ट्र पुलिस को दिए गए लिखित बयान “निर्विवाद” हैं।
    न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने इस फैसले को लिखा और पीआईएल को “न्यायपालिका पर भड़काऊ हमले “ के रूप में वर्णित किया। न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने कहा कि जनहित याचिका न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का एक उदाहरण है।कोर्ट के अनुसार सच्चाई यह थी कि याचिकाकर्ता न्यायाधीश की मौत को सनसनीखेज बनाना चाहते थे। जनहित याचिकाएं केवल “संदेहास्पज” दावों के साथ “न्यायपालिका की विश्वसनीयता को नष्ट करने का एक भद्दा प्रयास थी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को राजनीतिक स्कोर सुलझाने के लिए अदालतों का उपयोग नहीं करना चाहिए।
     पीआईएल की मुकदमेबाजी को बेहिचक तरीके से दुरुपयोग करने के लिए “निहित स्वार्थों का उद्योग” बनाया गया है। अदालत ने उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में दाखिल  जनहित याचिकाओं पर भी सवाल उठाया। कोर्ट ने लोया की मौत की जांच को लेकर दाखिल याचिकाओं को ये कहते हुए खारिज कर दिया कि लोया की मौत प्राकृतिक थी और इसमें कोई संदेह नहीं है। एक विवाह समारोह में दिल का दौरा पड़ने से उनकी मृत्यु हुई थी। विपक्ष और सरकार  का विरोध करने वाले कुछ लोग उनकी मौत को मुद्दा बनाना चाहते थे। न्यायिक कसौटी पर उनकी मुहिम बेमानी साबित हुई। जाहिर है कि  मुख्य न्यायधीश के खिलाफ विपक्ष की मुहिम केवल राजनीतिक है। .लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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