डॉ दिलीप अग्निहोत्री
जस्टिस ब्रिजगोपाल हरिकिशन लोया पर सुप्रीम कोर्ट के केवल निर्णय ही नहीं दिया, बल्कि इस माध्यम से विरोध की राजनीति के स्तर को भी उजागर किया है। एक स्वभाविक प्रकरण को सनसनीखेज बनाने का प्रयास किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने किसी का नाम नहीं लिया। लेकिन सच्चाई स्वतः ही सामने आ गई। जस्टिस लोया की मौत के तीन वर्ष बाद विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाने का प्रयास किया था। वस्तुतः इस बहाने वह सत्ता पक्ष को घेरना चाहता था। न्यायपालिका में इस विषय पर जनहित याचिका दायर की गई। यह न्यायपालिका के प्रयोग का उदाहरण था। राष्ट्रपति देश की कार्यपालिका के संवैधानिक मुखिया होते है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी विपक्ष के डेढ़ सौ सांसदों के साथ इस विषय पर राष्टपति से मिलने पहुंचे थे। इतने सांसद साथ थे इस प्रकार एक हद तक व्यवस्थापिक के प्रयोग का भी प्रयास किया गया। इन तीन के अलावा मीडिया को चौथा स्तम्भ कहा जाता है।राहुल गांधी ने इस विषय को मीडिया के सामने भी रखा था। यह लगा कि कांग्रेस की संवेदना किसी न्यायमूर्ति के लिए नहीं थी। उसका मकसद हंगामा खड़ा करने का था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान उल्लेखनीय है। उनका कहना है कि राहुल राष्ट्रपति के यहां गुहार लगाकर राजनीतिक ढोंग कर रहे थे। उन्हें अपने षड्यंत्रकारी प्रयास, देश के माहौल को बिगाड़ने और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को बदनाम करने की साजिश के कारण देश से माफी मांगनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि उनकी मौत प्राकृतिक थी। न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश की जा रही थी। न्यायपालिका की इस टिपण्णी पर कांग्रेस को आत्मचिन्तन करना चाहिए था। लेकिन उसने लज्जाजनक राजनीति का दूसरा अध्याय शुरू कर दिया ।

राहुल गांधी ने कहा कि वह लड़ाई जारी रखेंगे। मतलब न्यायपालिका उनके अनुकूल निर्णय नहीं देगी तो वह संघर्ष करेंगे। लोया प्रकरण की स्वतंत्र जांच जांच की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित थी। वह सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे थे। एक दिसंबर दो हजार चौदह को नागपुर में उनकी मौत हुई थी। वह वहां अपने मित्र की बेटी के विवाह में शामिल होने सुप्रीम कोर्ट मे सोहराबुद्दीन केस के ट्रायल को देख रहे सीबीआई के जस्टिस लोया जो सीबीआई केस की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें बीजेपी चीफ अमित शाह आरोपी थे, लेकिन बाद में आरोपमुक्त हो गए, की एक दिसंबर दो हजार चौदह को नागपुर में दिल का दौरा पडने से मौत हो गई थी। उस वक्त वो शादी समारोह में हिस्सा लेने गए थे। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की पीठ ने तीन पहलुओं पर अपना ये निष्कर्ष निकाला।
पहला चारों न्यायाधीशों और न्यायाधीश लोया के सहकर्मियों द्वारा महाराष्ट्र पुलिस को दिए गए लिखित बयान निर्विवाद हैं। दूसरा रवि भवन गेस्ट हाउस में एक ही कमरे में लोया सहकर्मियों के साथ रुके। तीसरा, न्यायाधीश लोया ने तीस नवंबर को अपनी पत्नी को फोन किया था और कहा था कि वह रवि भवन में रह रहे हैं। नवंबर दो हजार चौदह में नागपुर में जज लोया की मौत के बारे में संदेह संबंधी एक पत्रिका में गत वर्ष प्रकाशित लेखों के बाद महाराष्ट्र पुलिस को न्यायाधीशों द्वारा दिए गए बयानों पर अविश्वास करने का कोई आधार नहीं है।

कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों ने जस्टिस लोया पर आये निर्णय के फौरन बाद मुख्य न्यायधीश पर हमला बोला है। जस्टिस लोया की मृत्यु को कोर्ट ने स्वभाविक माना था। तीन साल पहले न्यायाधीश बीएच लोया की मौत स्वाभाविक कारणों हुई थी। इस संबन्ध में दायर जनहित याचिकाओं में कोई योग्यता नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की मौत के बारे में भविष्य के किसी भी सवाल को बंद कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड की पीठ ने तीन पहलुओं पर अपना ये निष्कर्ष निकाला। एक, चारों न्यायाधीशों और न्यायाधीश लोया के सहकर्मियों द्वारा महाराष्ट्र पुलिस को दिए गए लिखित बयान सन्देह से परे थे।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने इस फैसले को लिखा और पीआईएल को न्यायपालिका पर भड़काऊ हमले के रूप में वर्णित किया। न्यायमूर्ति चंद्रचूड ने कहा कि जनहित याचिका न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का एक उदाहरण है।कोर्ट के अनुसार सच्चाई यह थी कि याचिकाकर्ता न्यायाधीश की मौत को सनसनीखेज बनाना चाहते थे। जनहित याचिकाएं केवल संदेहास्पज दावों के साथ न्यायपालिका की विश्वसनीयता को नष्ट करने का एक भद्दा प्रयास थी। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को राजनीतिक स्कोर सुलझाने के लिए अदालतों का उपयोग नहीं करना चाहिए।
पीआईएल की मुकदमेबाजी को बेहिचक तरीके से दुरुपयोग करने के लिए निहित स्वार्थों का उद्योग बनाया गया है। जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण पर बहुत तीखी टिप्पणी की है। इसके बाद तनिक भी शर्म हया होती तो इसे मुद्दा बनाने वाले अपनी गलती स्वीकार करते । लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर इनकी प्रतिक्रिया कहीं ज्यादा लज्जाजनक रही। ये नेता मुख्य न्यायधीश को ही हटाने के प्रयास में जुट गए। यह संविधान की भावना को आहत करने वाली राजनीति है। विपक्ष के ये दल अपने को ही बेनकाब कर रहे हैं।







