श्याम कुमार
कर्नाटक विधानसभा के चुनाव का जो घटनाक्रम हुआ, उसमें सबसे अधिक हास्यासपद, निन्दनीय एवं घृणित भूमिका कांग्रेस की रही है। ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस सत्ता के लिए अपनी छटपटाहट में कुछ भी कर डालने को तैयार है। उसने ऐसा किया भी। गुजरात के चुनाव में भी उसने ऐसा ही किया था तथा कर्नाटक में पुनः उस नाटक को वैसा ही बुरे रूप में दोहराया। उसने अर्धरात्रि के बाद देश की सबसे बड़ी अदालत को बैठने के लिए विवश कर दिया।
कांग्रेस की छवि अब ऐसी बन गई है कि वह जनसेवा के बल पर नहीं, तरह-तरह की तिकड़मों एवं नौटंकियों के सहारे सत्ता प्राप्त कर लेने के लिए कटिबद्ध है। जिस हिन्दू धर्म का नेहरू वंश ने हमेशा गला काटा और उसे मिटाने के षड्यंत्र किए, उसी हिन्दू धर्म का ढोंगी लबादा ओढ़कर राहुल ने गुजरात में मंदिरों की परिक्रमा की शुरुआत की तथा वह क्रम कर्नाटक में भी जारी रखा। जो राहुल दिल्ली में भी कभी मंदिर नहीं गया था, वह ढोंगी हिन्दू का रूप धारण कर गुजरात एवं कर्नाटक में ढूंढ़-ढूंढ़कर मंदिरों में जाता रहा। राहुल ने पूरे चुनाव में देवगौड़ा की आलोचना की और उनकी पार्टी को भाजपा की ‘बी टीम’ बताकर कोसता रहा। लेकिन चुनाव के बाद जब कांग्रेस की शर्मनाक पराजय हुई तो वह विपक्ष में रहकर देशहित में सार्थक व रचनात्मक भूमिका अदा करने के बजाय भूखे भेड़िए की तरह सत्ता की ओर झपट पड़ी। वह सत्ता पाने के लिए देवगौड़ा की उसी जनतादल (एस) पार्टी के चरणों पर जा गिरी, जिसकी वह चुनाव में आलोचना कर रही थी। उसने स्वयं देवगौड़ा के पुत्र कुमार स्वामी को मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव किया, ताकि उनकी मातहती में सत्ता के कुछ हिस्से उसे भी मिल जाएं।
जिस कांग्रेस पार्टी का कभी पूरे देश में वर्चस्व था, उसने नेहरू वंश की चाकरी में अपना विनाश कर डाला, जिसके परिणामस्वरूप वह इस समय लगभग एक क्षेत्रीय पार्टी बनकर रह गई है। इतना नुकसान हो जाने के बाद भी उसे अभी भी विष्वास है कि यह वंश उसका उद्धार करेगा। वह इस बात को समझने से इनकार कर रही है कि नेहरू वंश को देश के बजाय सिर्फ अपने स्वार्थ की चिंता रहती है। जवाहरलाल नेहरू के समय से यह वंश देश को लूट रहा है। जो सोनिया गांधी अपने मायके इटली में होटल में काम कर खर्च चलाती थी, वह आज अथाह सम्पत्ति की मालिक हैं। केवल वही नहीं, पूरा कुटुम्ब अथाह दौलत में खेल रहा है। नेहरू ने कांग्रेस के वास्तविक महान नेताओं के पुण्य कर्माें को भुनाकर एवं खोखले-लुभावने नारों के बलपर फायदा उठाया। उनके बाद इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे का ढोंग रचा और सत्ता पर लम्बे समय तक काबिज रहीं। राजीव गांधी के मारे जाने पर कांग्रेस को सहानुभूति की लहर का फायदा मिला। लेकिन उसके बाद मनमोहन सिंह को कठपुतली प्रधानमंत्री बनाकर सोनिया गांधी और उनका परिवार दस वर्षों तक सत्ता पर कब्जा जमाय रहा तथा इन दस वर्शों में देश को घरती, आकाश एवं पाताल तक में बहुत बुरी तरह लूटा गया। लाखों करोड़ के घोटाले हुए, जिनसे विश्व भर में भारत की बड़ी बदनामी हुई।
कर्नाटक में जनता दल (एस)-जैसी छोटी पार्टी के नेतृत्व में कांग्रेस ने सरकार बनाना स्वीकार किया है, लेकिन भविष्य में यह गठबंधन अधिक मजबूत नहीं रहेगा। स्वाभाविक है कि देवगौड़ा एवं कुमार स्वामी कर्नाटक में अपनी पार्टी का आधार बढ़ाएंगे। यह आधार कांग्रेस की कीमत पर ही बढ़ पाएगा, जिससे वह और सिमटेगी। कुमार स्वामी को मुख्यमंत्री बना देने का फारमूला यदि भारतीय जनता पार्टी अपनाती तो जाहिर है कि कुमार स्वामी भारतीय जनता पार्टी के खेमे में आ जाते। देवगौड़ा की पार्टी एवं कांग्रेस के बीच कोई सैद्धांतिक मिलन नहीं हुआ है। यह सिर्फ स्वार्थ का गठबंधन है। कांग्रेस का चरित्र वैसे भी धोखाधड़ी का रहा है। उसने जिस पार्टी के साथ गठबंधन किया, उसकी जड़ काटी। स्वयं देवगौड़ा भी प्रधानमंत्री के रूप में कांग्रेस की धोखेबाजी का शिकार हो चुके हैं।
कांग्रेस पार्टी ने देश का सबसे बड़ा अहित यह किया कि उसने अन्य राजनीतिक दलों में भी अपना चरित्र प्रविस्ट कर उन्हें अपने ही रंग में रंग दिया। कुछ समय से अमित शाह के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ‘लोहे को लोहा काटता है’ वाले मुहावरे का अनुसरण कर कांग्रेसी फारमूले से ही कांग्रेस को पराजित कर रही है। लेकिन उक्त फारमूला भारतीय जनता पार्टी के चरित्रवाला फारमूला नहीं है। इसीलिए कर्नाटक के चुनाव में जब अल्पकालिक मुख्यमंत्री यदुयेरुप्पा ने अपने मार्मिक भाषण के साथ जब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की घोशणा की तो तत्काल उनका कद बहुत उंचा उठ गया। उन्होंने यह बहुत सही कदम उठाया तथा आगे चलकर इसका भाजपा को बहुत लाभ मिलेगा। यदुयेरुप्पा कर्नाटक में ताकतवर लिंगायत समुदाय के हैं। कांग्रेस पार्टी ने कर्नाटक के पिछले चुनाव में लिंगायत समुदाय को अलग धर्म घोषित कर हिन्दुओं में फूट डालकर चुनावी लाभ उठाने की कोशिश की थी। इससे लिंगायत समुदाय में फूट पड़ी और कांग्रेस ने उस फूट का फायदा उठाया। लेकिन बाद में लिंगायत समुदाय को कांग्रेस की कुटिल चाल समझ में आ गई और उसकी सहानुभूति अपने एकछत्र नेता रहे यदुयेरुप्पा के प्रति पुनः हो रही है। इस्तीफा दे देने से लिंगायत समुदाय महसूस कर रहा है यदुयेरुप्पा ने मजबूर होकर इस्तीफा दिया है और यह उनका अपमान है।
अटल बिहारी वाजपेई ने लोकसभा में एक वोट से अपनी सरकार के पराजित होने पर जब त्यागपत्र दे दिया था तो पूरे देश की सहानुभूति उनके साथ हो गई थी और भाजपा सत्ता पर काबिज होने में सफल हुई थी। यदि कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी ने सिर्फ सत्ता को अपना लक्ष्य बनाने के बजाय जनसेवा को लक्ष्य बनाया तो निष्चित है कि अगला चुनाव भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत दिला देगा। वैसे भी, इस समय कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में जहां कांग्रेस पार्टी सत्ता से बेदखल होकर बहुत सिमट गई है, वहीं भाजपा 104 सदस्यों की गिनती के साथ वहां सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। उसने गुजरात की तरह अति आत्म विश्वास का शिकार होकर कर्नाटक में भी अपना नुकसान किया। अन्यथा इस चुनाव में ही वह भारी बहुमत से विजयी होती। पिछले सत्तर वर्षों से कांग्रेस एवं अन्य फर्जी सेकुलरवादियों के षड्यंत्र का शिकार होकर हिन्दू अपने ही देश में बुरी तरह उपेक्षित व अपमानित स्थिति में हो गया था तथा दूसरे दरजे का नागरिक बना दिया गया था। जबसे हिन्दू जाग्रत हुआ है, देश दो खेमों में बंट गया है- हिन्दू-समर्थक एवं हिन्दू विरोधी। कर्नाटक में कांग्रेसी सरकार ने हिन्दू मंदिरों पर एक ऐसा टैक्स लगाया है, जिसकी आमदनी का अधिकांश हिस्सा मसजिदों एवं मदरसों पर खर्च किया जाता है। भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक की हिन्दू जनता को कांग्रेस का यह अत्याचार नहीं समझा सकी।







