कूड़ा बेचकर राजा बन गये
कैसे तुम हीरा बेचोगे
बोलो अब तुम क्या बेचोगे!
सब कुछ त्याग जो बदला ऐसे
उसका था बस यही कहना
तुम उदारवाद पर अटल रहना!
सत्ता जाये
जनाधार जाये
पार्टी जाये
स्वास्थ्य जाये
या
जीवन ही छिन जाये
उसका बस सिर्फ यही कहना
तुम उदारवाद पर अटल रहना
उदारवाद का दामन लिया था थाम
फासिज्म की छवि तब ही हो गई थी धड़ाम
बस फिर क्या था
जनसमर्थन गया
सत्ता गई
पार्टी छिन गई
स्वास्थ्य भी गया
और फिर..
जिन्दगी भी चली गई
ढांचे के विध्वंस ने फासिस्ट बनाया और बहुत कुछ दे दिया
सक्रिय सियासत के अंतिम चंद बरस में दिल में दबा-कुचला उदारवाद का वायरस उभर गया
उसने सर्वप्रथम फासिज्म की छवी को मारा
जनाधार, सत्ता और पार्टी पर हक को भी मार दिया गया
उनसे सब कुछ छीनने वाले अब तुम क्या बेचोगे
भावनाओं को बेचने के इरादे अब तुम क्या बेचोगे!
उनका फासिज्म या उदारवाद
फासिज्म तो बहुत पहले ही उदारवाद की तलवार से मर गया था
उनकी शख्सियत की उदारता के पहाड़ के नीचे विध्वंस का फासिज्म तो कब का दफन हो चुका
सब भूल चुके है उसके फासिज्म को
बोलो अब तुम क्या बेचोगे !
बस अब उनकी उदारता याद है सबको
क्या सियासत के बाजार में बेच पाओगे उदारता!
नहीं
उदारता बेचने का साहस करने वाली सियासत खुद बिक जाती है
आज उनके साथ राख हो जाने दो उदारता के संस्कार
बोलो अब तुम क्या बेचोगे !
गड़े मुर्दे नहीं बिकते
कहा तो- बरसों पहले उदारता की मिट्टी के नीचे उनके फासिज्म का मुर्दा दफन हो चुका है।
बोलो अब तुम क्या बेचोगे!
छोड़ दो, जाने दो पवित्र आत्मा को परमात्मा तक
उदारता के पंखों पर सवार होकर वो स्वर्ग सिधार गया
कुछ नहीं छोड़ गया तुम्हारे लायक
तुम नालायक, बेचो वो जो तुम्हारे पास पर्याप्त है
जिसकी तुमको आस है
तुम्हारे पास फासिज्म का सैलाब है
बोलो अब तुम ये बेचोगे।
हां अब अब तुम ये बेचोगे
कबाड़ी के पास हीरे के खरीदार नहीं होते
बोलो अब तुम क्या बेचोगे !
– नवेद शिकोह







