करीब तीन दशक पहले टीवी संस्कृति के जोर पकड़ने की शुरुआत के साथ ही स्कूली बच्चों की शिक्षा में एक बड़ा बदलाव धीरे -धीरे ही सही यह आता गया कि उनके बस्ते भारी होते गए। उस समय जरा-जरा से बच्चों की अपनी पीठ पर घोड़े की तरह बस्ते को लादने और बार- बार उसे ठीक करते रहने के दृश्य आम हो गए थे।
गर्मियों में तो यह दृश्य अच्छे से अच्छे लोगों के दिल में तरस पैदा कर देता है। तर्क था कि बचपन से ही शिक्षा का स्वरूप व्यापक होने से आगे चलकर बच्चों की समझ को तेज गति प्रदान करेगा। नतीजा यह था कि जिस उम्र में बच्चे पढ़ने भी जाते तो चेहरे पर स्वाभाविक रूप से खिलदंड का भाव रहता था। उस उम्र में उनका चेहरा धीरे-धीरे गंभीर और कभी-कभी तो उम्र के मुकाबले काफी परिपक्व नजर आता था।
उसके बाद बच्चों के शाम का खेलने का क्रम भी शुरू हो गया और उस समय या तो बच्चे होमवर्क में बिजी हो जाते थे। होमवर्क का भूत केवल उन पर ही नहीं सवार होता था। बल्कि मम्मी को भी उनके साथ बैठकर वह काम पूरा करना होता था। ऐसा न होने पर अगले दिन बच्चों को जिस ढंग से स्कूल में प्रताड़ित किया जाता रहा, उसकी खबरें आज भी पढ़ने सुनने को मिल जाती हैं। इस तरह मां बेटा दोनों होमवर्क से जूझते रहते थे। यहां तक कि मां की दिनचर्या में बेटे का होमवर्क कराना भी शुमार हो गया, और इसी हिसाब से वह अपने दिमाग में काम की लिस्ट बैठाती थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि भारी भरकम बस्ता और बच्चों का होमवर्क परिवारों को अतिरिक्त तनाव के रूप में प्रभावित करता रहता है।
इस बारे में सरकारी और गैरसरकारी दोनों ही स्तरों पर चिंता जताई जाती रही और सुधार के कदम उठाने के बारे में बातें भी बड़ी बड़ी होती रही लेकिन अमलीजामा उनमें से किसी को नहीं पहनाया गया। ऐसे में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी सीबीएससी का यह निर्णय बच्चों के लिए राहत के रूप में देखा जाएगा कि कक्षा 1-2 तक के बच्चों को ना तो होमवर्क दिया जाएगा और ना ही उनसे बैग लाने के लिए कहा जाए।
मद्रास हाईकोर्ट भी अपने एक निर्णय में ऐसे ही आदेश दे चुका है हालांकि सीबीएससी इस बारे में पहले दो बार इस तरह के परिपत्र जारी कर चुका है लेकिन यह विडंबना ही है कि उसे फिर ऐसा ही परिपत्र जारी करना पड़ा। वास्तव में निर्णय स्वागत योग्य है और इसके ऊपर गंभीरता तथा गति से अमल किया जाए तो निश्चित रुप से बच्चों को बहुत राहत मिलेगी।







