एक सेठ थे उन्होंने अपने जीवन में खूब कमाई की। बाद में मोह माया से उनका मन हट गया और वह ईश्वर की उपासना करने लगे। एक दिन एक आदमी उनके पास आया और बोला देखिए मेरे पिता आपके पिता के मित्र थे। आपके पिता ने मेरे पिता की बड़ी मदद की, उससे हमारा कारोबार जमा और हमें बहुत से धन की प्राप्ति हुई, आज भी भगवान की कृपा और आप के आशीर्वाद से हमारा व्यापार बहुत अच्छी तरह चल रहा है।
सेठ का उस दिन मौन व्रत था, वह चुपचाप उनकी बात सुनते रहे। अंत में वह सेठ बोले आपके पिता का ऋण तो हम क्या चुका सकते हैं, लेकिन लीजिए यह कुछ मोहरे आप की भेंट हैं। इतना कहकर उन्होंने मोहरों की एक रैली निकाली और उनके सामने रख कर चले गए।
जब सेठ का मौन व्रत समाप्त हुआ तो उन्होंने अपने लड़के को बुलाया और कहा जाओ यह थैली उस आदमी को लौटा आओ। पिता ने उस आदमी से जो कहा था। वह बेटे ने भी सुना था। वह बोला ‘आप यह थैली क्यों वापस करवाते हैं वह बिना मांगे दे गए हैं यह हमारे काम आ जाएंगी पिताजी। आखिर हमारे भी तो बाल बच्चे हैं।
यह सुनकर सेठ गंभीर हो गए। उन्होंने कहा जिस चीज से मैंने मुंह मोड़ लिया है तुम चाहते हो कि मैं फिर से उसी चक्कर में फंस जाऊं और वह भी तुम लोगों को की वजह से, यह मुझसे नहीं होगा। मैं तो बस इतना चाहता हूं कि मेरे जीवन के बचे दिन भगवद्भक्ति में बीते और तुम लोग अपनी मेहनत की कमाई पर आगे बढ़ो। इतना कहते-कहते पिता की आंखों से आंसू टपकने लगे। बेटे ने फिर कुछ नहीं कहा और दौड़कर वह थैली उस आदमी को लौटा आया।







