सरकार की नाक के नीचे आये दिन डीजल – पेट्रोल के दाम आसमान छू रहे हैं और सरकार बेबस देख रही है लेकिन इसके साथ ही साथ मँहगाई के कडुवे घूंट पीकर जनता भी सरकार को देख रही है अब अगर कल ही बात करें तो दिल्ली में तेल के दाम बयासी रूपए पार कर गए।
सरकार ने यों तो पेट्रोल-डीजल को सस्ता करने की राह खोली है पर यह कोशिश राजनीतिक बहसबाजी का केंद्र बन गई है। केंद्र सरकार ने अपनी तरफ से पेट्रोल-डीजल के उत्पाद शुल्क में 1.50 रु पये प्रति लीटर की कमी की है। इसके अलावा एक रुपया प्रति लीटर का घाटा सरकारी तेल कंपनियां उठाएंगी। यानी केंद्र सरकार की तरफ से करीब ढाई रु पये की कटौती एक लीटर पर हुई है।
बीजेपी वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकारें जिन राज्यों में हैं, वहां की अधिकांश सरकारों ने पेट्रोल-डीजल पर ढाई रुपये प्रति लीटर का राज्यकर भी कम कर दिया है। तो तमाम भाजपा शासित राज्यों में पांच रुपये प्रति लीटर सस्ता हुआ है लेकिन दूसरे दिन फिर भी वृद्धि जारी रही। पर मामला सिर्फ अर्थशास्त्र का नहीं है। तेल के भावों में राजनीति का आना जरूरी है। अब गैर भाजपा सरकारों के सामने चुनौती है कि वो अपने राज्यकर में कटौती करके पेट्रोल-डीजल को और सस्ता बनाएं। ढाई रुपये लीटर की सस्ताई केंद्र सरकार ने की, अब राज्य सरकारें भी अपने संसाधनों में कटौती करके राहत दें।
मोटे तौर पर स्थिति यह उभरी है कि भाजपा शासित राज्यों में सस्ताई पांच रुपये प्रति लीटर की है और गैर भाजपा शासित राज्यों में सस्ताई ढाई रुपये लीटर की है। इस मसले पर राजनीति शुरू हो गई है। गैर भाजपा सरकारें अपने संसाधनों में कटौती करके डीजल-पेट्रोल को सस्ता करने के काम को आसानी से स्वीकार नहीं करेंगी और इस मसले को राजनीति का विषय बनाया जाएगा कि केंद्र ने सस्ता कर दिया, राज्य सरकारें अपनी तरफ से कोई राहत नहीं दे रही हैं। जो कच्चा तेल कुछ महीने पहले 60 डॉलर का एक बैरल आ रहा था, वह अब 86 डालर के स्तर पर जा रहा है।
पिछले चार सालों का यह अधिकतम स्तर है। ईरान पर अमेरिकन अंकुश, ग्लोबल राजनीतिक स्थितियां इनके लिए जिम्मेदार हैं। कुल मिलाकर उन हालात पर भारत का दखल कुछ खास नहीं है। इसलिए महंगे तेल से निपटने के लिए रणनीतियों की लगातार जरूरत रहेगी। बजाय इसके कि भाजपा और गैर भाजपा दल इस मसले पर सिर-फुटौव्वल करें, सारे महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दल साझा विमर्श करें कि इस किस्म की ग्लोबल परिस्थिति से कैसे निपटाया जाए? पेट्रोल-डीजल के भाव सिर्फ आर्थिक विषय नहीं हैं, इनका भारतीय परिप्रेक्ष्य में गहरा राजनीतिक महत्त्व भी है।








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