डॉ दिलीप अग्निहोत्री
इसमें कोई संदेह नहीं उत्तर प्रदेश की वर्तमान सरकार शिक्षा में व्यापक सुधार की दिशा में कदम बढ़ा रही है। इसमें नकल विहीन परीक्षा, शैक्षिक कलेंडर के अनुपालन,नियमित सत्र, दीक्षांत समारोह,आदि के साथ ही शिक्षकों की समस्याओं के निराकरण के प्रयास शामिल है। सरकार का सभी तथ्यों पर ध्यान है। समाज मे शिक्षक की गरिमा होती है। समाज के साथ साथ शिक्षक को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए। शिक्षकों के सरकार से कुछ मांगने में भी मर्यादा होनी चाहिए। चाहे जो मजबूरी हो, हमारी मांगें पूरी हो, जैसा विचार समाजहित के अनुकूल नहीं होता। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और उच्च व माध्यमिक शिक्षा मंत्री डॉ दिनेश शर्मा यही मानते है। उनका कहना है कि शिक्षकों की प्रत्येक मांग पर वह गंभीरता से विचार करते है। प्रयास यह होता है कि शिक्षकों को मांगना न पड़े, उनकी न्यायोचित मांग पूरी हो जाएं। समाज मे शिक्षक की गरिमा होती है। समाज के साथ साथ शिक्षक को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए। शिक्षकों के सरकार से कुछ मांगने में भी मर्यादा होनी चाहिए। चाहे जो मजबूरी हो , हमारी मांगें पूरी हो, जैसा विचार समाजहित के अनुकूल नहीं होता। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और उच्च व माध्यमिक शिक्षा मंत्री डॉ दिनेश शर्मा यही मानते है। उनका कहना है कि शिक्षकों की प्रत्येक मांग पर वह गंभीरता से विचार करते है। प्रयास यह होता है कि शिक्षकों को मांगना न पड़े, उनकी न्यायोचित मांग पूरी हो जाएं। उच्च शिक्षा में बेहतर शोध की आवश्यकता है। इस पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
शिक्षा में गुणवत्ता अपरिहार्य है। उत्तर प्रदेश में परीक्षा प्रणाली को लेकर बड़े आरोप लगते रहे है। देश मे इसकी चर्चा भी होती थी। डॉ दिनेश शर्मा को इस बात का श्रेय देना चाहिए कि वह माध्यमिक स्तर पर नकल विहीन परीक्षा कराने में सफल रहे है। उन्होंने कहा कि अब इसी तर्ज पर उच्च शिक्षा की परीक्षाएं होंगी। इसी के साथ पढ़ाई का स्तर भी सुधारा जा रहा है। परीक्षा का महीनों तक चलना भी ठीक नहीं है। प्रदेश की वर्तमान सरकार इस अवधि को कम करने के लिए कदम उठा रही है। माध्यमिक स्तर पर तो यह अवधि बहुत सीमित कर ली गई है।
उच्च शिक्षा की परीक्षाओं की अवधि भी इस सत्र में न्यूनतम कर ली जाएगी। इससे समय की बहुत बचत होगी। इस समय का उपयोग शिक्षण कार्य में हो सकेगा। पाठ्यक्रम में भी सुधार और समानता के प्रयास किया गया। माध्यमिक स्तर पर एनसीआरटी की पुस्तकों से अध्यापन का निर्णय किया गया। शिक्षकों ने वीआरएस की मांग नहीं कि थी। लेकिन राज्य सरकार ने इसे भी लागू कर दिया। डॉ दिनेश शर्मा शिक्षकों से सुविधाशुल्क मांगने को बेहद आपत्तिजनक मानते है। सरकार ऐसे पारदर्शी प्रक्रिया लागू कर रही है, जिनके द्वारा निर्धारित अवधि में न्यायोचित निर्णय किये जायेगे। पहले पांच वर्ष में जितने विद्यालय खोले गए। भाजपा सरकार ने डेढ़ वर्ष में इससे अधिक विद्यालय खोल दिये। उच्च स्तरीय शिक्षण संस्थाओं को भी मान्यता दी जा रही है।
शिक्षकों की कमी को दूर करने का सरकार प्रयास कर रही है। शिक्षक की पहचान पठन पाठन से होती है।
सरकार व्यर्थ के कानूनों को पहचान कर उनको समाप्त कर रही है। सर्वाधिक मुकदमें शिक्षा विभाग में है। अनेक क़ानून अष्पष्ट है। एक दूसरे को लेकर भ्रम की स्थिति बनती रही है। अनेक शिक्षक इसके चलते परेशान होते है। सरकार ऐसी कठिनाइयों को दूर करेगी।
पहले जहां दो से ढाई महीने में बोर्ड परीक्षाएं हुआ करती थी उसे एक महीने तक लाया जा सका है। आने वाली बोर्ड परीक्षा सोलह से सत्रह दिनों में ही समाप्त कर मूल्याकन प्रक्रिया शुरू करने की योजना बनाई है। यह व्यवस्था सफल हो इसके लिए शिक्षकों के सहयोग की जरूरत होगी। शिक्षकों का सहयोग रहेगा तो शिक्षा में सुधार जरूर किया जा सकता है। पढ़ाई और रिवीजन के लिए सुनिश्चित करना ही सरकार का लक्ष्य है। किसी भी कीमत पर मांगो को मनवाने के किये रास्ते पर उतर कर आंदोलन करने की जरूरत नही है। बातचीत के लिए दरवाजे खुले रहने चाहिए, जिससे सुधार के विचार आ सके।
उन्होंने कहा कि शिक्षकों की समस्याएं दूर करने की हर कोशिश की जा रही है। पेंशन और स्थानातरण की समस्या को दूर कर दिया गया है। शिक्षकों की समस्या के निवारण के लिए ऑनलाइन शिकायत ली जा रही है। तीस जून तक शिक्षक अपनी समस्या सीधे लिख कर भेज सकते है। एक जुलाई से पन्द्रह जुलाई तक अभियान चलाकर सभी समस्यायों का निस्तारण किया गया। यह क्रम आगे भी जारी रहेगा।
शिक्षा अपने चारों ओर की चीजों को एक नये दृष्टिकोण से समझने की एक सतत प्रक्रिया है और यह विवेक, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व में निखार लाती है।
शिक्षा ही सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी उन्नति का रास्ता प्रशस्त करती है। किसी भी देश का विकास देश के युवाओं के लिए स्कूलों और कॉलेजों में दी जा रही शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। राज्य सरकार द्वारा प्रदेश में शिक्षा के स्तर में सुधार लाने के लिए अनेक कदम उठाये जा रहे हैं।
शिक्षण संस्थान,विश्वविद्यालय और शिक्षक जब कमजोर पड़ते है , तब उसकी कीमत संपूर्ण राष्ट्र को चुकानी होती है। भारत कभी विश्वगुरु के पद पर आसीन था। नालंदा और तक्षशिला को विदेशी आक्रांताओं ने जब नष्ट किया, उसी समय ब्रिटेन में विश्विद्यालय आकर ले रहे थे। भारत और ब्रिटेन दोनों पर इसका प्रभाव भी देखा जा सकता है। ब्रिटेन विश्व की महाशक्ति बनने की दिशा में बढा। भारत विदेशी आक्रांताओं का शिकार होता रहा। हम अपने शैक्षणिक गौरव को कायम नहीं रख सके।
ऐसे में देश के विश्वविद्यालयों को मजबूत बनाने की आवश्यकता है। लेकिन उदारीकरण और वैश्वीकरण ने स्थिति को पहले से ज्यादा बिगाड़ा है। विश्व में अनेक निजी विश्वविद्यालय है। उन्हें उच्च श्रेणी का माना जाता है। इसका कारण यह कि ऐसे संस्थान उन लोगों ने स्थापित किये ,जो मूलतः शिक्षाविद ही थे। शिक्षा के अलावा उनके जीवन का कोई मकसद ही नहीं था। अपने यहां शांतिनिकेतन निजी विश्वविद्यालय था। रविन्द्र नाथ टैगोर का नाम जुड़ा तो शांतिनिकेतन बुलंदी पर पहुंच गया। आज ऐसी स्थिति नहीं है। बड़ी संख्या में ऐसे लोग शिक्षण संस्थान और विश्वविद्यालय स्थापित कर रहे है , जिनका शिक्षा से दूर दूर तक कोई लेना देना ही नहीं रह है।
डॉ दिनेश शर्मा मानते है कि पहले की सरकारों ने इस ओर उचित ध्यान नहीं दिया। इसके चलते उत्तर प्रदेश में शिक्षा का स्तर गिरा। लेकिन वर्तमान सरकार गुणवत्ता से समझौता नहीं करेगी। इसके लिए पर्याप्त व्यवस्था की जा रही है। शिक्षा को केवल व्यवसाय माना जाएगा तो स्थिति में सुधार नहीं होगा। सरकार शिक्षा को गरिमा और गुणवत्ता के साथ संचालित करेगी।






