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    देश में सूखे की फिर से आहट

    By October 12, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    देश के 229 जिलों में इस वर्ष औसत से कम बारिश हुई है। इससे सूखे का भयावह संकट खड़ा पैदा होने की आशंका बलवती हो गई है। मानसून सीजन में बादलों के कम बरसने का सीधा असर खेती-किसानी के अलावा पेयजल, पशुपालन सहित कई क्षेत्रों पर होता है। जब सूखे की जानकारी अभी से हमारे पास है तो सरकार व समाज दोनों को कम पानी में काम चलाने, ऐसी ही फसल उगाने, मवेशियों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने आदि पर काम करना शुरू करना चाहिए।

    मौसम विभाग के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि इस साल मानसून ने देश का 21.38 फीसद भूभाग को थोड़े सूखे से बहुत ज्यादा सूखे के बीच छोड़ दिया है। सूखे को मापने का इंडेक्स बताता है कि इस साल मानसून में सूखे की स्थिति साल 2016 और 2017 से भी खराब रही है। इस साल करीब 134 जिलों में थोड़ा सूखे से बहुत ज्यादा सूखे वाले हालात रहे हैं। यह इंडेक्स सूखे के लिए नकारात्मक और नमी वाली स्थितियों के लिए पॉजिटिव होता है। इसके मुताबिक करीब 229 जिलों में हल्की सूखी स्थिति रही जो कि इस मानसून का 43.51 फीसद है। पिछले साल देश का करीब 17.78 प्रतिशत क्षेत्र थोड़े सूखे से बहुत सूखे के बीच रहा था जबकि 2016 में यह 12.28 प्रतिशत था। अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, झारखंड, बिहार, राजस्थान और कर्नाटक में गंभीर सूखे की स्थिति देखी जा सकती है। मराठवाड़ा और विदर्भ के भी कुछ जिलों में सूखा रहा।

    एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक देश के लगभग सभी हिस्सों में बड़े जलाशयों में पिछले साल की तुलना में कम पानी है। यह सवाल हमारे देश में लगभग हर तीसरे साल खड़ा हो जाता है कि ‘औसत से कम’ पानी बरसा या बरसेगा तो क्या होगा? देश के 13 राज्यों के 135 जिलों की करीब दो करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि प्रत्येक दस साल में चार बार पानी के लिए त्रहि-त्रहि करती है। हकीकत जानने के लिए देश की जल-कुंडली भी बांच ली जाए। भारत में दुनिया की कुल जमीन या धरातल का 2.45 प्रतिशत है। दुनिया के कुल संसाधनों में से चार फीसदी हमारे पास हैं व जनसंख्या की भागीदारी 16 प्रतिशत है। हमें हर साल बारिश से कुल 4,000 घन मीटर पानी प्राप्त होता है, जबकि धरातल या उपयोग लायक भूजल 1,869 घन किलोमीटर है। इसमें से महज 1,122 घन मीटर पानी ही काम आता है। जाहिर है कि बारिश का जितना हल्ला होता है, उतना उसका असर पड़ना चाहिए नहीं।

    एक बात सही है कि कम बारिश में भी उग आने वाले मोटे अनाज जैसे ज्वार, बाजरा, कुटकी आदि की खेती व इस्तेमाल कम हुआ है, वहीं ज्यादा पानी वाले सोयाबीन व अन्य नकदी फसलों की वृद्धि हुई है। इस कारण बारिश पर निर्भर खेती बढ़ी है। तभी थोड़ा भी कम पानी बरसने पर किसान रोता दिखता है। अब गंगा-यमुना के दोआब के पश्चिमी उत्तर प्रदेश को ही लें, न तो यहां के लेागों का भोजन धान था और न ही यहां की फसल। लेकिन ज्यादा पैसा कमाने के लिए सबने धान बो कर जमीन बर्बाद की और आदत बिगड़ी सो अलग। देश के उत्तरी हिस्से में नदियों में पानी का 80 फीसद जून से सितंबर के बीच रहता है, दक्षिणी राज्यों में यह आंकड़ा 90 प्रतिशत का है। बरसात गई और नदियों का पानी भी गुम हो जाता है। कहीं अंधाधुंध रेत खनन तो कहीं विकास के नाम पर नदी के रास्ते में पक्के निर्माण तो कहीं नदियों का पानी सलीके से न सहेजने के तरीकों के कारण कीमती जल का नालियों के जरिये समुद्र में बह जाना।

    असल में हमने पानी को ले कर अपनी आदतें खराब कीं। जब कुएं से रस्सी डाल कर पानी खींचना होता था या चापाकल चला कर पानी भरना होता था तो जितनी जरूरत होती थी, उतना ही जल निकाला जाता था। घर में नल लगने और उसके बाद बिजली या डीजल पंप से चलने वाले ट्यूब वेल लगने के बाद तो एक गिलास पानी के लिए बटन दबाते ही दो बाल्टी पानी बर्बाद करने में हमारी आत्मा नहीं कांपती है। हमारी परंपरा पानी की हर बूंद को स्थानीय स्तर पर सहेजने, नदियों के प्राकृतिक मार्ग में बांध, रेत निकालने, मलबा डालने, कूड़ा मिलाने जैसी गतिविधियों से बच कर, पारंपरिक जल स्त्रोतों- तालाब, कुएं, बावड़ी आदि के हालात सुधार कर, एक महीने की बारिश के साथ सालभर के पानी की कमी से जूझने की रही है। कस्बाई लोग बीस रुपये में एक लीटर पानी खरीद कर पीने में संकोच नहीं करते हैं तो समाज का बड़ा वर्ग पानी के अभाव में कई बार शौच व स्नान से भी वंचित रह जाता है।

    सूखे के कारण जमीन के बंजर होने, खेती में सिंचाई की कमी, रोजगार घटने व पलायन, मवेशियों के लिए चारे या पानी की कमी जैसे संकट उभर रहे हैं। भारत में औसतन 110 सेंटीमीटर बारिश होती है जो दुनिया के अधिकांश देशों से बहुत ज्यादा है। यह बात दीगर है कि हम बरसने वाले कुल पानी का महज 15 प्रतिशत ही संचित कर पाते हैं। शेष पानी नालियों, नदियों से होते हुए समुद्र में बह जाता है।

    गुजरात के जूनागढ़, भावनगर, अमेरली और राजकोट के 100 गांवों ने पानी की आत्मनिर्भरता का गुर खुद ही सीखा। विछियावाडा गांव के लोगों ने डेढ़ लाख रुपये व कुछ दिनों की मेहनत से 12 बांध बनाए व एक ही बारिश में 300 एकड़ जमीन सींचने के लिए पर्याप्त पानी जुटा लिया। इतने में एक नलकूप भी नहीं लगता। ऐसे ही प्रयोग मध्य प्रदेश में झाबुआ व देवास में भी हुए। यदि तलाशने चलें तो कर्नाटक से ले कर असम तक और बिहार से ले कर बस्तर तक ऐसे हजारों सफल प्रयोग सामने आ जाते हैं, जिनमें स्थानीय स्तर पर लेागों ने सूखे को मात दी है।

    कम पानी के साथ बेहतर समाज का विकास कतई कठिन नहीं है, बस एक इस बात के लिए तैयारी करनी होगी कि पानी की कमी है। दूसरा ग्रामीण अंचलों की अल्प वर्षा से जुड़ी परेशानियों के निराकरण के लिए सूखे का इंतजार करने के बनिस्पत इसे नियमित कार्य मानना होगा। कम पानी में उगने वाली फसलें, कम से कम रसायन का इस्तेमाल, पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को जीवित करना, ग्राम स्तर पर विकास व खेती की योजना तैयार करना आदि ऐसे प्रयास हैं जो सूखे पर भारी पड़ेंगे।

    देश के करीब एक-तिहाई जिलों में इस वर्ष औसत से कम बारिश हुयी है जिससे सूखे की आशंका बढ़ गई है। संभावित समस्या से निपटने के लिए अभी से तैयारी कर देनी चाहिए।

    -पंकज चतुर्वेदी, पर्यावरण मामलों के जानकार

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