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    श्रीलंका संकट का भारत पर असर नहीं

    By November 1, 2018 Current Issues No Comments5 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    भारत यात्रा से लौटने के कुछ समय बाद श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को अपदस्त कर दिया गया। लेकिन यह सब श्री लंका की आंतरिक राजनीति का परिणाम है। इसका विक्रमसिंघे की भारत यात्रा से कोई संबन्ध नहीं है। ऐसे में दोनों देशों के बीच जो सैद्धान्ति सहमति और अनेक योजनाओं पर कार्य आगे बढ़ाने का जो निर्णय हुआ है ,वह कायम रहेगा। क्योंकि अब श्रीलंका के लोग ही चीन से उचित दूरी चाहते है। प्रधानमंत्री चाहे जो हो उसे जनभावना का ध्यान रखना पड़ेगा। इसके अलावा शासन स्तर पर भी चीन की चालबाजी को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।
    श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने रानिल विक्रमसिंघे को हटाकर पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को नया प्रधानमंत्री बनाया है। इसी के साथ संसद को भी भंग कर दिया गया है। वैसे रानिल विक्रमसिंघे का कहना है कि वो अब भी श्रीलंका के प्रधानमंत्री बने हुए हैं। फिलहाल उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रोटोकॉल मिलता रहेगा। दो हजार पन्द्रह के चुनाव में मैत्रीपाला ने रानिल विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल  पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। राजपक्षे ने राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने पिछले राष्ट्रपति चुनावों में हराया था। श्रीलंका में यह राजनीतिक उथल-पुथल सिरीसेना के गठबंधन यूनाइटेड पीपल्स फ्रीडम एलायंस द्वारा रानिल विक्रमसिंघे की यूनाइटेड नेशनल पार्टी  से अलग होने के बाद हुई है।
    भारत अपने इस पड़ोसी देश के राजनीतिक पर नजर बनाए हुए है। विश्वास है कि रानिल विक्रमसिंघे के साथ बनी सहमति आगे बढ़ेगी। दक्षिण एशिया के छोटे देशों की चीन को लेकर गलतफहमी दूर होने लगी है। कुछ समय पहले तक ये देश चीन की सहायता मिलने पर गदगद थे। चीन इन्हें कर्ज दे रहा था, चीन की कम्पनियां यहां निर्माण कर रही थी, चीन की सस्ती वस्तुएं खरीद कर लोग खुश हो रहे थे। लेकिन अब सच्चाई सामने आ गई। चीन ने तो इन देशों के सामने लालच का जाल फेंका थे। जिसमें ये देश खुद ही आकर फंस गए। चीन के कर्ज से ये बेहाल होने लगे है, चीन की कम्पनियां इन देशों में निर्माण के नाम पर बेहिसाब मुनाफा लूट रही है, चीन की सस्ती वस्तुएं सेहत बिगाड़ रही है। अब ये देश चीन के दगाबाजी समझने लगे है। भारत ही इन्हें सच्चा दोस्त नजर आ रहा है। इस माहौल में रानिल विक्रमसिंघे की भारत यात्रा महत्वपूर्ण और उपयोगी थी। यह भी तय हुआ कि चीन पर एक सीमा से अधिक विश्वास करना गलत था।
    नरेंद्र मोदी और विक्रमसिंघे अनेक मुद्दों पर सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए। उनकी इस यात्रा का मकसद दोनों देशों के बीच कारोबार, निवेश, नौवहन सुरक्षा सहित अन्य क्षेत्रों में संबंधों को गहरा करना है। उनका यह दौरा ऐसे समय में हो रहा हुआ जब मीडिया में एक विवादित खबर आई थी कि श्रीलंका के राष्ट्रपति ने आरोप लगाया है कि भारत की खुफिया एजेंसी रॉ उनकी हत्या का षडयंत्र रच रही है। इस दावे को श्री लंका ने खारिज कर दिया। इसके पीछे चीन की साजिश उजागर हुई है।
    विक्रमसिंघे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विभिन्न क्षेत्रों पर वृहत वार्ता की। विकास सहयोग बातचीत के मुख्य एजेंडों में से एक था। जाफना में बन रही आवासीय परियोजना की स्थिति, तमिल वर्चस्व वाले क्षेत्र में सत्ता के विकेंद्रीकरण पर चर्चा की गई।।श्री लंका ने भारतीय भावनाओं के सम्मान का आश्वासन दिया।
    श्रीलंका के घाटे में चल रहे मट्टाला राजपक्षे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का प्रभार भारत के हाथ में लेने की रूपरेखा पर विचार हुआ। विमानों की कमी की वजह से इस हवाई अड्डे को दुनिया का सबसे खाली हवाई अड्डा कहा जाता है। भारत इस देश के साथ संयुक्त रूप से इस हवाईअड्डे को चला सकता है। दोनों देश समुद्री सुरक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए। विक्रमसिंघे ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह गृह मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल से भी  मुलाकात की। विक्रमसिंघे और सिंह ने भारत और श्रीलंका के बीच सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ सहयोग से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। सुषमा स्वराज ने भारत की सहायता वाली विकास परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की।
    चीन की कम्पनी को पांच महीने पहले जाफना में चालीस हजार घर बनाने का टेंडर दिया गया था, लेकिन स्थानीय लोगों को ईंट के पारंपरिक घर चाहिए थे, जबकि चीन कंक्रीट स्ट्रक्चर के हिसाब से घर बनाने वाला था। श्रीलंका ने चीन से टेंडर वापस ले लिया। अब अठ्ठाइस हजार नए घर बनाने का  काम भारतीय कंपनी एनडी एंटरप्राइजेज, दो श्रीलंकाई कंपनियों के साथ मिलकर पूरा करेगी। भारत को ये टेंडर रानिल विक्रमसिंघे के भारत दौरे के ठीक पहले मिला है। इसका यह भी मतलब है कि श्री लंका भारत के प्रति अच्छी भावना दिखाना चाहता था। यह उचित भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पड़ोसी देशों से बेहतर संबन्ध रखने को बहुत महत्व दिया था। अपने शपथ ग्रहण समारोह में दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन के सदस्य देशों को आमंत्रित करके उन्होंने यही सन्देश दिया था। मोदीं ने यह भी कहा था कि वह पड़ोस के देशों से बराबरी के आधार पर दोस्ती चाहते है। हम आंख दिखा कर नहीं आंख मिलाकर बात करने में यकीन रखते है। यह बात छोटे पड़ोसी देशों के साथ ही ड्रैगन चीन पर भी लागू थी। चीन से भी संबन्ध शांतिपूर्ण रखने के प्रयास होने चाहिए। लेकिन उसकी कुटिल नीति में फंसने से खुद को बचाए रखना भी जरूरी है।
    चीन कर्ज के जाल में फंसाने के बाद श्रीलंका को परेशान करने लगा था। चर्चा थी कि उसने  श्रीलंका के हम्बनटोटा बंदरगाह को अपने कब्ज़े में ले लिया था। इसके बाद श्रीलंका सावधान हुआ। क्योकि चीन हवाईअड्डे और बंदरगाह तक सड़क भी बनाने लगा था। इस तरह वह यहां अपनी सैनिक छावनी बनाने जा रहा था। गनीमत है कि समय रहते श्री लंका की आंख खुली है। चीन विस्तारवादी और कुटिल मानसिकता का देश है। उंसकी यह फितरत बदल नहीं सकती। अन्य देशों को समझौते के समय सावधानी रखनी चाहिए।

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