डॉ दिलीप अग्निहोत्री
कुछ निर्णय देखने में सामान्य लगते हैं। लेकिन ये पिछली अनेक सरकारों की नाकामी को उजागर कर देते है। उत्तर प्रदेश और उत्तरंखण्ड के मुख्यमंत्रियों ने मिलकर ऐसा ही एक निर्णय किया गया। इसके तहत दोनों प्रदेशों के बीच बस सेवा के संचालन की बाधाओं को दूर किया गया। यहाँ तक पहुंचने में अठारह वर्ष का समय लग गया। इसका मतलब है कि दोनों प्रदेशों की पूर्व सरकारों ने इस मामले में लापरवाही का परिचय दिया था। जबकि यह मसला सामान्य बस यात्रियों की सुविधा से संबंधित था।उत्तरंखण्ड और उत्तर प्रदेश तकनीकी रूप से अलग प्रशासनिक व्यवस्था में है, लेकिन सांस्कृतिक रूप में अलगाव संभव ही नहीं है। पर्यटन के अन्य स्थानों को छोड़ दे, तब भी उत्तरंखण्ड के बिना चारों धाम की यात्रा पूरी नहीं होती। इसी प्रकार प्रयागराज कुंभ के लिए उत्तरंखण्ड की श्रद्धा कम नहीं है।
ऐसे में बसों के संचालन की बाधाओं को दूर करने में अठारह वर्ष का समय हैरान करने वाला था। दो हजार तीन से यह मसला लंबित था। अब दोनों राज्यों के बीच परिवहन निगम की बसों के संचालन का सपना साकार हुआ। जब से दोनों प्रदेशों में भाजपा सरकार बनी है ,अनेक लंबित मामलों का समाधान निकाला जा रहा है। बस सेवा पर समझौता इसी क्रम में है। उत्तरंखण्ड के मुख्यमंत्री शिवेंद्र सिंह ने ऐसे अन्य उदाहरण बताए। बयालीस वर्ष से लंबित बहुउद्देशीय लखवाड़ बांध परियोजना केंद्र नरेंद्र मोदी सरकार ने एक बैठक में कर दिया। यह सात राज्यों से जुड़ी परियोजना है। हिमाचल में रेणुका और टोंस नदी पर बनने वाले बांध का निर्माण अधर में थे।

उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड राज्य के मध्य अतंर्राज्यीय बस सेवाओं को सुगम एवं सुदृढ़ बनाने उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखण्ड राज्यों के मध्य पारस्परिक समझौते पर हस्ताक्षर किए।
इस अवसर का योगी आदित्यनाथ प्रयागराज कुंभ हेतु बस सेवा को भी संचालित किया। उन्होंने उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की इक्यावन प्रयागराज कुम्भ शटल बसों तीन सीएनजी बसों को झण्डी दिखाकर रवाना भी किया। संवाद लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। संवाद समाधान का सबसे अच्छा रास्ता है। उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश के मध्य कई विवाद थे, उन सभी विवादों का निस्तारण विराट सोच का परिणाम है। त्रिवेंद्र सिंह कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार के सकरात्मक रुख के कारण यह समझौता सम्भव हो सका। उत्तराखण्ड का उत्तर प्रदेश से धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक व भावनात्मक नाता है।
वर्तमान सरकार परिवहन सुविधाओं की बेहतरी के लिए लगातार काम कर रही है। इस समझौते से दिल्ली-ऋषिकेष, दिल्ली-देहरादून, दिल्ली-कोटद्वार, दिल्ली-हल्द्वानी, दिल्ली-हरिद्वार, मथुरा-हरिद्वार, आगरा-सहारनपुर-देहरादून, आगरा-मेरठ-ऋषिकेश, मुरादाबाद-हल्द्वानी, मुरादाबाद-हरिद्वार-सहारनपुर, अलीगढ़-हल्द्वानी, बरेली-हरिद्वार, लखनऊ-देहरादून, कानपुर-ऋषिकेश, बहराईच- रूपैडिहा-हरिद्वार, वाराणसी-लखनऊ-बरेली-हरिद्वार, मथुरा-जयपुर -मथुरा-हरिद्वार, दिल्ली- मुरादाबाद-बनबसा-महेन्द्रनगर नेपाल आदि स्थान सीधे बस सेवाओं से जुड़ जाएंगे। इस समझौते के तहत दो सौ सोलह मार्गों पर उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम द्वारा उत्तराखण्ड राज्य में प्रतिदिन एक लाख उनतालीस हजार किमी से अधिक , उत्तराखण्ड राज्य परिवहन निगम द्वारा उत्तर प्रदेश के तीन सौ पैतीस मार्गों पर प्रतिदिन कुल करीब ढाई लाख किमी का संचालन किया जाएगा।
इस प्रकार योगी आदित्यनाथ और शिवेंद्र सिंह ने जनहित से जुड़ी समस्या का समाधान किया। बस से साधारण आर्थिक स्थिति के लोग ही यात्रा करते है। इन्हीं लोगो को परमिट व्यवस्था से कठिनाई का सामना करना पड़ता था। इसी प्रकार कुंभ मेले के लिए अभी से सरकार परिवहन व्यवस्था को बेहतर करने में लगी है। जिससे सामान्य यात्रियों को असुविधा का सामना न करना पड़े।
बैठक में दोनों राज्य के बीच परिवहन समझौते पर हस्ताक्षर हुए। समझौते के अनुसार उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की बसें उत्तराखंड के दो सौ सोलह मार्गों पर संचालित होगी, जबकि उत्तराखंड परिवहन निगम की बसें तीन सौ पैतीस मार्गों पर चल रही हैं। उत्तराखंड के पास महज छह सौ सड़सठ परमिट हैं, जबकि यूपी परिवहन निगम के पास चौदह सौ इक्यानबे परमिट हैं।
योगी आदित्यनाथ ने उत्तराखंड के साथ समझौते को गंभीरता से लिया। दोनों सरकारों के बीच प्रारंभिक समझौता हुआ। इसके बाद बसों के संचालन को लेकर मार्ग तय होने के बाद इस पर सुझाव और आपत्तियां मांगे गए और अब दोनों प्रदेशों के बीच अंतिम समझौता हो गया। इस समझौते के बाद दोनों प्रदेशों के प्रमुख शहरों के बीच बस सेवा और मजबूत हो जाएगी। उत्तराखंड के प्रमुख शहर देहरादून, हरिद्वार, नैनीताल, अल्मोड़ा आदि शहरों के लिए उत्तर प्रदेश से सीधी बसें चलने लगेंगी। कई प्रमुख मार्गों पर बसों की संख्या भी बढ़ जाएगी। जाहिर है कि दोनों प्रदेशों के बीच बस सेवा को सुगम बनाना कोई जटिल कार्य नहीं था। लेकिन लोगों की कठिनाई के प्रति उदासीनता से यह मसला लंबे समय से लंबित था। इस आधार पर उम्मीद की जा सकती है कि दोनों प्रदेशों के बीच अन्य लंबित मसलों का भी शीघ्र समाधान हो जाएगा।







