दिलीप अग्निहोत्री
उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक की अपनी विशिष्ठ भाषण शैली है। वह बातचीत या संवाद शैली में अपनी बात रखते हैं। इस तरह श्रोताओं के मन तक उनकी बात पहुंचती है। प्रायः अवसर के अनुरूप उनके भाषण में गंभीर विचारों के साथ हास्य का भी समावेश रहता है। इसका प्रमाण लखनऊ के एक आयोजन में देखने को मिला। इसमें साहित्य की विभिन्न श्रेणियों के लोगों को साहित्यगंधा सम्मान से नवाजा जा रहा था। समारोह में अनवरतगंधा गीतगंधा, ग़ज़लगंधा, लोकगंधा, ओजगंधा कथागंधा, व्यंग्यगंधा, पत्र-साहित्यगंधा, युवागंधा, चित्रगन्धा नाम से ग्यारह विभूतियों को सम्मानित किया गया था। राम नाईक ने यहीं पर अपनी हास्य व्यंग्य शैली का परिचय दिया। कहा कि सम्मान की श्रंखला में आत्मकथा गंधा सम्मान जोड़ देते तो क्या पता वह सम्मान मुझे मिल जाता। इस पर आयोजकों ने तत्काल अमल करते हुए राज्यपाल की पुस्तक ‘चरैवेति!चरैवेति!!’ को भी सम्मानित करने का निर्णय लिया और वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ उदय प्रताप सिंह द्वारा राज्यपाल का भी सम्मान अंगवस्त्र व स्मृति चिन्ह देकर किया गया। नाईक ने गंभीर शैली में भी सारगर्भित बात कही।
उन्होंने कहा कि साहित्य सेवा बड़ी सेवा है, क्योंकि साहित्य के बिना समाज अधूरा है। एक साहित्यकार संवेदनशील होकर महसूस करता है फिर शब्दों के माध्यम से अपना भाव प्रदर्शित करता है, जिसका समाज पर व्यापक असर भी होता है। स्वतंत्रता प्राप्त करने का सबसे बड़ा हथियार साहित्य और पत्रकारिता रहा है। इस लिए कलमगीरों की कलम को तलवार से श्रेष्ठ माना जाता है। कलम की ताकत अद्वितीय होती है, जो समाज पर व्यापक असर डालती है। हिन्दी हमारी राष्ट्र भाषा है, इसकी उन्नति ही हमारी राष्ट्रीय पहचान है। भाषाएं एक दूसरे को जोड़ने का माध्यम होती है। उन्होंने कहा कि आत्मा और शरीर का जो संबंध है वही संबंध साहित्य और समाज का है।
राज्यपाल ने इस अवसर पर प्रख्यात मराठी व्यंग्यकार एवं साहित्यकार पद्म भूषण प्रो पीएल देशपांडे को याद करते हुए कहा कि प्रोफेसर देशपांडे ने लिखा था कि ‘कल अगर मेरी प्रतिमा स्थापित करना तय हुआ तो उसके नीचे केवल इतना लिखिए कि इस व्यक्ति ने हमें हंसाया है।’ उन्होंने इस अवसर पर अपनी पुस्तक ‘चरेवैति!चरेवैति!!’ की यात्रा बताते हुए कहा कि वास्तव में वे एक ‘एक्सीडेंटल लेखक हैं,’ जिन्होंने इससे पहले कभी कोई पुस्तक नहीं लिखी।







