सोशल मीडिया के इस दौर में आजकल कुछ भी नहीं छुपा है। जिला रायबरेली जेल में अनियमितताओं के आरोप के बाद उत्तर प्रदेश में जेलों की दुर्व्यवहार ही नहीं बल्कि भ्रष्टाचार भी एक बार फिर सामने आ गया है। यह कोई नया मामला नहीं है, क्योंकि करीब- करीब हर साल किसी न किसी जेल में बलवा, हत्या, नशीले पदार्थों की सप्लाई सलाखों के पीछे से भी आपराधिक गतिविधियों का संचालन और इसके लिए हथियार तथा मोबाइल फोन व ऐसे ही अन्य सामान मिलने की खबरें आती रहती हैं।
एक तरफ वहां अपराधियों की यह सक्रियता तो दूसरी ओर जेल प्रशासन द्वारा कथित रूप से कैदियों का उत्पीड़न कर के वित्तीय अनियमितताओं को अंजाम देना तथा इसका विरोध करने पर उनको प्रताड़ित करने जैसी बातें भी सामने आती हैं।
नतीजा कैदियों की हड़ताल, मारपीट जैसी घटनाओं के रूप में सामने आता है। विडंबना यह है कि इस तरह की हर घटना के बाद जांच सजा और कार्यप्रणाली में सुधार जैसी बातें जिम्मेदारों द्वारा की जाती है, लेकिन हर बार की तरह नतीजा ढाक के वही तीन पात ही रहता है। जब तक हम यह सोचते हैं कि जेलों की स्थापना अपराधियों को सजा के साथ सुधारने के लिए हुई थी। यह भी देखते हैं कि जेलों में कैदियों के लिए अध्ययन तथा सुधारात्मक एवं रोजगार कार्यक्रम चलाए जाते हैं। कुटीर उद्योग की श्रेणी में आने वाली वस्तुओं का निर्माण उनके द्वारा किया जाता है। कई कैदियों ने जेलों में रहते हुए पढ़ाई भी की कुछ किताबें लिखी। इसके बावजूद आज कई जिलों का माहौल कुछ अलग ही देखने को मिल रहा है, तो इसकी सबसे बड़ी वजह कई बिंदुओं पर जिम्मेदार लोगों द्वारा समझौता करना या गलत कामों में सहभागिता करना रहा है।
हाल ही में बागपत जेल में माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी की हत्या इसी का एक उदाहरण है। ऐसे में जरूरी यह भी हो जाता है की स्थिति पर गंभीरता के साथ करते हुए आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाए जाएं यदि ऐसा नहीं हो पाया तो जेल की व्यवस्था कायम करने का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा और इसके बेहद दूरगामी विपरीत परिणाम हो सकता है सामने आ जाएं।







