डॉ दिलीप अग्निहोत्री
अभी तीन राज्यों की चुनावी संख्या में कांग्रेस की जीत हासिल हुई, लेकिन चुनाव प्रचार में उठाये गए मुद्दे उंसकी नैतिक पराजय को उजागर करने वाले है। इसका खुलासा लंदन कोर्ट और भारतीय सुप्रीम कोर्ट के अलग अलग फैसले से हुआ। फ्रांस सरकार पहले ही कांग्रेस के आरोपों को झूठा बता चुकी है। कांग्रेस ने प्रचार में कह रही थी कि नरेंद्र मोदी ने नोटबन्दी में जमा पैसा विजय माल्या को देकर उसे भगा दिया। जबकि नरेंद्र मोदी उसके प्रत्यर्पण का पूरा प्रयास कर रहे थे, और माल्या कांग्रेस की ही कृपा से किंग बने थे। कांग्रेस ने राफेल खरीद की प्रक्रिया बदलने और कथित घोटाले का मुद्दा चुनाव प्रचार में उठाया, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पूरी प्रक्रिया को सही माना, विमान खरीद को सेना की जरूरत बताया।राफेल समझौते पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केवल याचिका करने वालों के लिए नहीं है। इस पर अमर्यादित अभियान चला रहे लोग भी कठघरे में आ गए है। इसके सूत्रधार कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी थे। उन्होंने राफेल समझौते में न केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत व अमर्यादित आरोप लगाए थे, बल्कि अपशब्दों का प्रयोग भी किया। इसमें आरोप लगाने , तहकीकात करने और फिर फैसला सुनाने का काम राहुल खुद कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह इस पूरे अभियान की हवा निकाली है, उंसकी चर्चा बाद में, पहले बिना किसी प्रमाण के राहुल गांधी के बयानों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। उनका कहना था कि देश का प्रधानमंत्री चोर है, हमने विमान की कीमत कम लगाई थी, प्रधानमंत्री फ्रांस जाते है, पता नहीं खरीद प्रक्रिया में क्या बदलाव करते है, कीमत बढ़ जाती है। वह चौकीदार नहीं बेईमान है।

विधानसभा चुनाव प्रचार में प्रत्येक जगह राहुल गांधी यह लाइन जरूर दोहराते थे। इसका निहितार्थ यह भी है कि पांच राज्यों में कांग्रेस का प्रचार अभियान झूठ पर आधारित था। वैसे तीन राज्यों में मिली जीत के बाद राहुल गांधी का उत्साहित होना स्वभाविक है। पराजय का सिलसिला फिलहाल रुका है। यह संख्या की विजय है, लेकिन इसके तत्काल बाद राहुल गांधी को सिद्धांत और राजनीतिक मर्यादा के मामले में पराजय भी मिली है। मसला तकनीकी रूप में राहुल से संबंधित नहीं था। लेकिन इसके सूत्रधार वही थे।
रक्षा जरूरतों के हिसाब से राफेल विमान यूपीए के कार्यकाल में आ जाने चाहिए थे। लेकिन वह एक दाम लेकर बैठे रहे, विमान नहीं आये। भारतीय वायु सेना के तैयारियों की अवहेलना हुई। नरेंद्र मोदी सरकार ने उस कमी को दूर किया। फ्रांस के साथ राफेल समझौता हुआ। वायु सेना के शीर्ष अधिकारियों और रक्षा विशेषज्ञों ने इसकी सराहना की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सौदे की खरीद प्रक्रिया में कोई कमी नहीं है। कीमत पर सरकार द्वारा दिए गए आधिकारिक जवाब को रिकार्ड कर कहा कि कीमतों की तुलना करना कोर्ट का काम नहीं है। कोर्ट ने कहा कि डील पर किसी भी प्रकार का कोई संदेह नहीं हैै, वायुसेना को ऐसे विमानों की जरूरत है। मोटे तौर पर प्रक्रिया का पालन किया गया है। कोर्ट सरकार के छतीस विमान ख़रीदने के फ़ैसले मे दख़ल नहीं दे सकता। प्रेस इंटरव्यू आधार नही हो सकते। प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने चौदह नवंबर को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। याचिका दायर करने वालों में वकील एमएल शर्मा, विनीत ढांडा, प्रशांत भूषण, आप नेता संजय सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी शामिल थे। इस सभी नामों में एक समानता है। ये सभी नरेंद्र मोदी के प्रति कुंठा और पूर्वाग्रह से भरे है। प्रशांत भूषण ने तो आतंकी कसाव के बचाव में अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी थी।
याचिकाकर्ताओं ने सौदे में अनियमितता का आरोप लगाया था। उन्हींने सीबीआइ को जांच के लिए प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश देने की अपील की थी।
केंद्र ने राफेल सौदे का बचाव करते हुए कीमत को सार्वजनिक करने की मांग का विरोध किया था। केंद्र की तरफ से अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि दो हजार सोलह के एक्सचेंज रेट के मुताबिक खाली राफेल जेट की कीमत छह सौ सत्तर करोड़ रुपये है। लेकिन पूरी तरह से हथियारों से लैस राफेल विमान की कीमत को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे देश के दुश्मन फायदा उठा सकते हैं।
वायुसेना प्रमुख ने स्वयं प्रेस वार्ता में इस समझौतों को उचित बताया था। उन्होंने कहा था कि इसमें पूरी तरह से प्रक्रिया का पालन किया गया। इसके अलावा सेना को इस प्रकार के लड़ाकू विमान की आवश्यकता थी।
राहुल ने इस मसले पर जो स्टैंड लिया, उसने इनकी विश्वसनीयता कम हुई है। राहुल को लगा होगा कि इसे उठाकर वह बोफोर्स का बदला ले सकते है। लेकिन दो तथ्यों पर उन्होंने विचार नहीं किया। बोफोर्स का मुद्दा राजीव गांधी के सरकार में मंत्री रहे कांग्रेसी नेता ने ही उठाया था। बाद में यह मुद्दा बड़ा बना। क्वात्रोची के नाम से भी लोगों का शक गहरा हुआ था।
जबकि नरेंद्र मोदी ने समाज और राजनीति के लिए अपने परिवार का परित्याग किया है। वह चौदह वर्ष मुख्यमंत्री रहे, चार वर्ष से प्रधानमंत्री है, राहुल गांधी को छोड़ दें तो उनकी छवि पर ऐसे आरोप कभी नहीं लगे। ऐसा भी नहीं कि मोदी पर आरोप लगाने वालों की कमी है। भारतीय राजनीति में इतने आरोप किसी को नहीं झेलने पड़े। ये केवल राहुल गांधी थे, जिसने चोर, बेईमान जैसे शब्दों का प्रयोग किया। इसके बाद तो उनके अदने से प्रवक्ता भी यही कहने लगे। राहुल गांधी को यह अनुमान नहीं रहा कि सुप्रीम कोर्ट राफेल पर इस प्रकार का निर्णय देगा। इस निर्णय में न्याय के साथ देशहित का विचार भी मिलता है।

न्यायपालिका ने अपने निर्णय में राष्ट्रीय सुरक्षा को भी अहमियत दी। इसका दूसरा पहलू यह कि कांग्रेस राष्ट्रीय सुरक्षा की अवहेलना कर रही थी। इसके प्रमाण तो नहीं, लेकिन यूरोप तक कांग्रेस को लेकर यही चर्चा थी। राहुल गांधी वहां भी अपना ज्ञान बिखेर आये थे। तब यह कहा गया कि इसके पीछे साजिश हो सकती है। यूरोप में राफेल की प्रतिद्वंदी कम्पनियों को ऐसे विवाद पसंद आते है। दूसरी चर्चा यह थी कि चीन और पाकिस्तान भारत द्वारा खरीदे गए विमान की कीमत जानने को बेकरार थे। संभव है कि इन चर्चाओं में कोई दम न हो, लेकिन राहुल गांधी ने जिस तरह यह मुद्दा चलाया, उसने उनकी गंभीरता कम की है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ठीक कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि डील सरकार से सरकार के बीच में थी, इसमें कोई गड़बड़ी नहीं हुई है। कांग्रेस का झूठ सबके सामने आया है कांग्रेस को सुरक्षा के मामले मे जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए था। देश की सुरक्षा की अनदेखी करने की गलती कांग्रेस ने की है। संसद के कार्य को बाधित करने का काम किया और जनता के सामने जाकर झूठ बोलने का जो काम किया है, उसके लिए कांग्रेस को जनता से सेना से माफी मांगनी चाहिए। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि कांग्रेस ने देश की सुरक्षा से समझौता करने की कोशिश की है। राफेल मुद्दे पर राष्ट्र हितों और आर्थिक हितों दोनों की सुरक्षा की गई। राफेल डील पर संसद के दोनों सदनों में चर्चा हो और जिन्होंने इसपर झूठ बोला वो सामने आएं। राफेल पर झूठ बोलने वालों की हुई हार वित्तमंत्री कोर्ट ने माना कि राफेल पर चौहत्तर बैठकें हुईं थी।








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