बीते एक सप्ताह में आगरा और उत्तराखंड में दो लड़कियों को सरेराह आग लगाकर जिंदा जलाया गया। दिल्ली में निर्भया कांड के बाद उभरा जनाक्रोश अब वोट व सत्ता की सियासत का दाना बन चुका है। जाहिर है कि उसके बाद बने कानून, जनाक्रोश या स्वयं की अनैतिकता पर न तो अपराधियों को डर रह गया है, न ही आम समाज में संवेदना और न ही पुलिस की मुस्तैदी।
इन दिनों दो कांड संवेदनशील लोगों के बीच विमर्श में हैं। कुछ जगह विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं। आगरा से कोई बीस किलोमीटर दूर नौमील गांव की 15 साल की बच्ची को 18 दिसंबर को स्कूल से घर लौटते समय दो लड़कों ने पेट्रोल डाल कर माचिस दिखा दी। लड़कों ने पहचान छुपाने के लिए हेलमेट पहन रखा था। बच्ची के पिता एक कारखाने में काम करते हैं। उन्होंने बताया कि जलाने के बाद उसे हाईवे के किनारे खाई में फेंक दिया गया। दिल्ली के एक अस्पताल में बच्ची की मौत हो गई।
ठीक उसी दौरान उत्तराखंड के पौड़ी जिले के कफोलस्यूं पट्टी के एक गांव की 18 वर्षीय लड़की परीक्षा देकर स्कूटी से घर लौट रही थी। रास्ते में गहड़ गांव के मनोज सिंह उर्फ बंटी ने एक सुनसान जगह में कच्चे रास्ते पर लड़की को रोक लिया और जबरदस्ती करने की कोशिश करने लगा। छात्रा के विरोध से गुस्साए युवक ने छात्रा पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी और वहां से फरार हो गया। कुछ देर बाद जब वहां से गुजर रहे एक ग्रामीण ने जली हुई छात्रा को देखा तो इसकी सूचना पुलिस को दी। इससे पहले अपराधी लड़की की मां को फोन पर बता देता है कि उसने लड़की को आग लगा दी है, दम हो तो बचा लो। विडंबना है कि रौंगटे खड़े करने वाली इन घटनाओं पर दिल्ली मौन है।

खाप, जाति बिरादरियां, पंचायतें जिनका गठन कभी समाज के सुचारू संचालन के इरादे से किया गया था अब समानांतर सत्ता या न्याय का अड्डा बन रही है तो इसके पीछे वोट बैंक की सियासत होना सर्वमान्य तथ्य है। शायद हम भूल गए होंगे कि हरियाणा में जिन बच्चियों को उनके साहस के लिए (बस में छेड़छाउ़ करने वालों की बैल्ट से पिटाई करने वाली बहनें) सम्मानित करने की घोषणा स्वयं मुख्यमंत्री कर चुके थे, बाद में खाप के दवाब में उन्ही लडकियों के खिलाफ जांच के आदेश दे दिए गए।
ऐसा नहीं है कि समय-समय पर बलात्कार या शोषण के मामले चर्चा में नहीं आते और समाजसेवी संस्थाएं इस पर काम नहीं करतीं। तीन दशक पहले भटेरी गांव की साथिन भंवरी देवी को बाल विवाह के खिलाफ माहौल बनाने की सजा सवर्णों द्वारा बलात्कार के रूप में दी गई थी। उस मामले को कई जन संगठन सुप्रीमकोर्ट तक ले गए थे और उसे न्याय दिलवाया था। लेकिन जानकर आश्चर्य होगा कि वह न्याय अभी भी अधूरा है। हाईकोर्ट से उस पर अंतिम फैसला नहीं आ पाया है। इस बीच भंवरी देवी भी साठ साल की हो रही हैं व दो मुजरिमों की मौत हो चुकी है।
आंकड़े गवाह हैं कि आजादी के बाद से बलात्कार के दर्ज मामलों में से छह फीसदी में भी सजा नहीं हुई। जो मामले दर्ज नहीं हुए, वे न जाने कितने होंगे। फांसी की मांग, नपुंसक बनाने का शोर, सरकार को झुकाने का जोर, सबकुछ अपने- अपने जगह लाजिमी हैं लेकिन जब तक बलात्कार को केवल औरतों की समस्या समझ कर उसपर विचार किया जाएगा, जब तक औरत को समाज की समूची ईकाई ना मान कर उसके विमर्श पर नीतियां बनाई जाएंगी; परिणाम अधूरे ही रहेंगे।
फिर जब तक सार्वजनिक रूप से मां-बहन की गाली बकना, धूम्रपान की ही तरह प्रतिबंधित करने जैसे आघारभूत कदम नहीं उठाए जाते , अपने अहमं की तुश्टि के लिए औरत के शरीर का विमर्श सहज मानने की मानवीय प्रवृति पर अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा। भले ही जस्टिस वर्मा कमेटी कितने सुझाव दे दे, महिला हेल्प लाईन शुरू हो जाए- एक तरफ से कानून और दूसरी ओर से समाज के नजरिये में बदलाव की कोशिश एकसाथ किए बगैर असामनता, कुंठा, असंतुश्टि वाले समाज से ‘‘रंगा-बिल्ला’’ या ‘‘राम सिंह-मुकेश’’ या शिवकुमार यादव की पैदाईश को रोका नहीं जा सकेगा। मोमबत्तियों की ऊष्मा असल में उन लोगों के जमीर को पिघलाने के लिए होनी चाहिए, जिनके लिए औरत उपभोग की वस्तु है, ना कि सियासी उठापटक के लिए।








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