नाबालिक बच्चों के यौन उत्पीड़न में शामिल अपराधियों को कठोर सजा दिलाने के क्रम में सरकार अब एक और बड़ा कदम उठाने जा रही है। इस संबंध में पिछले साल 2018 मे अप्रैल में सरकार ने कठोर कानूनी उपाय किए थे और भारतीय दंड संहिता आईपीसी में संशोधन करके 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म के दोषियों को फांसी की सजा दिलाने का रास्ता साफ किया था, लेकिन इस कानूनी दायरे में बालकों के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न को शामिल नहीं किया गया था।
लेकिन अब सरकार ने इस खामी को भी दूर करते हुए बाल यौन अपराध संरक्षण कानून पास को 2012 में संशोधन के लिए विधेयक के मसौदे को मंजूरी दे दी। अब विधेयक के कानूनी शक्ल में आते ही बालकों के दुष्कर्मी को भी फांसी की सजा दिलाई जा सकेगी। यह कानून ट्रांसजेंडर बच्चों के यौन उत्पीड़न मामले में भी लागू होगा। इस कानून से अब उम्मीद बंधी है कि बच्चों के साथ घिनौने अपराध करने वालों में और भय पैदा होगा और उन्हें अपने अपराध के नतीजों पर भी कई बार सोचना होगा।

तमाम कानूनी उपायों के बावजूद जिस तरह बच्चों के खिलाफ अपराधों का ग्राफ तेजी से ऊंचा उठता जा रहा था उसे देखते हुए काफी पहले से ही ऐसे सख्त कानून की जरूरत महसूस की जा रही थी ताकि ऐसे मामलों में दोषियों को न्याय के कटघरे में लाया जा सके। बच्चों के यौन उत्पीड़न में जितने मामले सामने आते हैं। उनमें अक्सर देखा गया है कि सबसे ज्यादा मामले ऐसे होते हैं जिनमें आरोपी परिवार का ही कोई करीबी व्यक्ति, रिश्तेदार या परिचित ही निकलता है। घर से स्कूल तक रास्ते में भी बच्चों को ऐसे अपराधियों का खतरा बना ही रहता है। बच्चों का यौन उत्पीड़न अब सरकार और पुलिस की लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है। अब लोग भी बच्चों की हिफाजत को लेकर सजग रहते हैं, इसलिए भी अब अपराधियों की पहचान ज्यादा मुश्किल नहीं रह गई है।

पहले ऐसे मामले में समाज के डर और दबाव और शर्म के कारण से दबा दिए जाते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। पीड़ित समाज के लोग अब डर और शर्म का घेरा तोड़कर बाहर आने लगे हैं। अभी तक ऐसे मामले बढ़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण कड़े कानून और सजा के प्रावधान का अभाव भी था। ऐसे अपराधी बेखौफ थे और बच भी निकलते थे लेकिन अब कानून और सजा दोनों सख्त होने से अपराधियों में खौफ तो होगा ही।







