कितनी बड़ी विडंबना है कि आज लगभग 22 दिन बाद भी मेघालय की एक खदान में फंसे 22 मजदूरों की जिंदगी के बारे में कोई अता पता नहीं है। वह जिंदा भी हैं या नहीं इसकी कोई पुष्ट सूचना तक नहीं मिल पाई है। इस मामले में अभी तक राज्य और केंद्र सरकार का जो रवैया रहा है। उससे यही लगता है कि जैसे इन मजबूर जिंदगी को उनसे किसी को कुछ लेना देना ही नहीं है।
बीते बुधवार को सुप्रीम कोर्ट का भी धैर्य टूट गया और उसने इस मामले में राज्य सरकार को तो कड़ी फटकार लगाई ही साथ ही केंद्र सरकार को भी तलब कर लिया। अदालत में बचाव के कदमों पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह मामला गंभीर और चिंताजनक है। मजदूरों को खदान में फंसे कितने ही दिन हो गए और लगता है कि केंद्र और राज्य सरकार और एजेंसियों के बीच कोई संबंध में ही नहीं है।
अदालत ने निर्देश दिए हैं कि उन मजदूरों को किसी भी स्थिति में बाहर निकाला जाना चाहिए और जरूरत पड़े तो सेना को बुलाया जाए। दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह कोयला खदान काफी समय से अवैध रूप से चलाई जा रही थी लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। बावजूद इसके प्रशासनिक तंत्र वक्त पर तब भी सक्रिय नहीं हुआ। जब खतरनाक हालात में काम करने वाले मजदूर उसमें फंस गए।

यह तो अमानवीयता की पराकाष्ठा ही कही जाएगी कि बचाव कार्य में ऐसी घोर लापरवाही बरती गई और बेबस मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। यहां सोचने की बात है कि कुछ समय पहले जब थाईलैंड की एक गुफा में कुछ बच्चे फंस गए थे तो वहां तेजी से पानी निकालने वाले हाई पावर पंप भेजने को लेकर तुरंत भारत ने सक्रियता दिखाई थी लेकिन अपने ही देश में यहां पिछले 20 दिन से खदान में पानी भरने के कारण जब मजदूर फंस गए तो सरकार ने उनकी सुध लेने में कोई तत्परता नहीं दिखाई।
सवाल अदालत ने ठीक ही उठाया कि जब थाईलैंड में हाई पावर पंप भेजे जा सकते हैं तो यहां क्यों नहीं? सभी जानते हैं कि इन खदानों की बेहद सकरी सुरंगों से गुजर कर मजदूरों को कोयला निकाल कर बाहर लाना होता है और खदानों के भीतर जाने और काम करने के बीच कितना जानलेवा खतरा होता है। सवाल यह भी है कि आखिर किसने और किन वजहों से किसी कोयला खदान के संचालकों को गैरकानूनी रूप से उसमें मजदूरों को भेजने और खनन की इजाजत दी?
प्रशासन की नजर में वहां होने वाली रोज की अवैध गतिविधियों पर नजर क्यों नहीं थी? पता चला है कि यह खदान का काम 4 सालों से कानूनी ढंग से बैन चल रहा था इसके बावजूद प्रशासनिक अमला हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठा रहा सरकार और व्यवस्था को इसका जवाब तो देना ही होगा?







