गरीबी से भरी कहानी:

लखनऊ, 03 मार्च 2019: यह तस्वीर बस यूही नहीं खींची गयी है! इसके पीछे एक छोटी गरीबी से भरी कहानी है। सुबह का वक्त था बच्चों का स्कूल टाइम शुरू हो चुका था। यही कोई दस बजे का वक्त था अचानक से दूर से दो बच्चें एक ठेले पर लड्डू बेचते आते दिखाई दिए, हमारे जाने वाले ने उन बच्चों से उनकी हालत देखते हुए पूंछा, ” आज आपके पापा नहीं आये? इन बच्चों ने कहा की उनकी तबियत कई दिन से खराब है और घर में पैसे नहीं है इसलिए हम दोनों भाई ये ठेला कई दिन से लगा रहे हैं! उन्होंने पूंछा स्कूल कैसे जाते हो, उन बच्चों का जवाब था जब पिता जी ठीक हो जायेंगे तब जायेंगे फिलहाल अभी नहीं जा रहे हैं, स्कूल फीस भी दो महीने की भरनी बाकी है?
इतना सुनते ही हम सभी खामोश हो गए!
कहने तात्पर्य यह है कि मानव जीवन की सार्थकता इसी में है कि अपने बारे में सोचने के साथ-साथ हम दूसरों के बारे में भी सोचें। परोपकार करने से खुद को भी खुशी मिलती है। कभी किसी जरूरतमंद की मदद करके देखिए, आप पाएंगे कि अपने जीने की सार्थकता का अहसास होने लगा है। परोपकारी व्यक्ति दुखियों के प्रति उदार, निर्बलों के रक्षक और जन-कल्याण की भावना से ओत-प्रोत होते हैं। परोपकार से जो आनंद हमें मिलता है, वह एकदम अलौकिक होता है। इसीलिए परोपकारी व्यक्ति खुद भी सुखी रहता है और दूसरों में भी सुख बांटता चलता है। वह खुद तो ऐसा करता ही है, दूसरों को भी प्रेरित करता है।







