मसूद अजहर को ग्लोअब्ल टेररिस्ट न घोषित कर पाने की राह में आड़े आये चीन की पिचकारी का बहिष्कार करने की घोषणा करने वालों, तनिक जान लो कि यदि उसे ग्लोबल टेरोरिस्ट घोषित भी कर दिया होता तो उसका कुछ नहीं बिगड़ता. इससे पहले हाफीज सईद, लशकर-ए-तैयबा के संस्थापक को 10 दिसम्बर 2008 को ग्लोबल टेरोरिस्ट घोषित किया जा चुका है, उस पर अमेरिका ने दस लाख डोलर का ईनाम भी रखा था, बम्बई हमले के तत्काल बाद संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका ने उसे गोल्बल टेररिस्ट घोषित कर दिया अर्थात, यदि किसी को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करवा देना कोई कूटनीतिक और अंतर्राष्ट्रीय सफलता है तो जाहिर है कि उस समय के सरकार इसमें सफल रही थी, जबकि अभी दुनिया में डंका पीटने का दावा करने वाले अपने सबसे बड़े व्यापारी दोस्त चीन से ही हार गए।
लेकिन वह राजनितिक दल मिल्ली मुस्लिम पार्टी बना कर पाकिस्तान में चुनाव लड़ता है, वह स्कूल, कालेज, मदरसे चलाता है, बड़े-बड़े सियासतदान उससे मिलते हैं, वह जम कर जलसे- सभाएं करता हैं. यह वैश्विक आतंकी पाकिस्तान के उर्दू अखबार “डेली दुनिया” में नियमित कॉलम लिखता हैं।

इंटरपोल ने भले हाफिज मोहम्मद सईद के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी कर रखा हो, मगर पिछले 11 सालों से वह उसे पकड़ नहीं पाया है. अमेरिका ने उस पर एक करोड़ डॉलर का इनाम रखा है, मगर इस एलान के 11 साल बाद भी वह पकड़ में नहीं आया। अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ, रूस और ऑस्ट्रेलिया ने उसके संगठन लश्कर-ए-तैयबा को प्रतिबंधित कर रखा है, मगर उसके बारूदी और नापाक कारनामे अब भी जारी है
हाफिज मोहम्मद सईद अकेला नहीं है, जिसे पाकिस्तान ने पनाह दी है, और भी आतंकी सरगना हैं। उनमें हाफिज सईद का इतिहास ज्यादा काला और घिनौना है। हाफिज सईद 1948 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सरगोधा में पैदा हुआ था। इस लिहाज से उसकी उम्र 69 साल है। 30 साल पहले 1987 में उसने अब्दुल्लाह आजम और जफर इकबाल के साथ मिल कर लश्कर-ए-तैयबा नाम से आतंकी संगठन बनाया था। वह तभी से भारत के खिलाफ साजिश रच रहा है और आतंकी वारदातों को अंजाम दे रहा है।
मौलाना मसूद अजहर ने साल 2000 में हरकत-उल मुजाहिद्दीन से अलग होकर जैश ए-मोहम्मद बनाया।उसमें हरकत-उल-मुजाहिद्दीन के भी कई आतंकी शामिल हुए थे। इसी जैश ए-मोहम्मद ने भारतीय संसद पर हमला किया था और इसका मास्टर माइंड हाफिज सईद था। इसने 13 दिसंबर 2001 को भारतीय संसद पर हमला कराया था। तब पाकिस्तान ने उसे 21 दिसंबर 2001 को हिरासत में लिया, मगर महज चार माह बाद ही 31 मार्च 2002 को उसे रिहा कर दिया गया। करीब चार साल बाद 2006 में उसने मुंबई ट्रेन में धमाका कराया। पाकिस्तान ने उसे फिर 9 अगस्त 2006 को गिरफ्तार किया, मगर इस बार भी ज्यादा दिन उसे जेल में नहीं रख सका। लाहौर हाइकोर्ट में पाकिस्तान उसकी गिरफतारी की ठोस वजह नहीं बता सका और महज 19 दिन बाद 28 अगस्त 2006 को उसे रिहा कर दिया गया।
हम केवल लफ्फाजी, नारों की दुनिया में जीते हैं, एक वैश्विक आतंकी को तो हम पकड़ नहीं पाए या उसका शिकार नहीं कर पाए, रामदेव जैसे बाबाओं का महंगा सामान बिकवाने के लिए चीन के खिलाफ दुष्प्रचार में पिचकारी पर गुस्सा निकाल रहे हैं, एक बात और चीन का जो माल हमारे देश में आता है, उस पर तो हमारे व्यापारी कि पूंजी लग चुकी, उस पर चीन अपना मुनाफ़ा खा चुका, ऐसे में इस माल के बहिष्कार का अर्थ अपने ही व्यापारी का नुक्सान करना है और यह सब कुछ कथित व्यापारी बाबाओं पर हो रहा है।
क्यों न सवाल पूछा जाए कि जो पहले से ग्लोबल टेरोरिस्ट घोषित है उसकी मौत सुनिश्चित करने को क्या किया गया ?
चीन से अब माल आये ही न, इसके लिए सरकार आयात द्युति बढ़ने, डंपिंग टेक्स लगाने और स्तःनीय उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिए क्या कर रहे हैं ? सरदार पटेल की प्रतिमा हो या देश भर में चल रहे ई रिक्शा (इसकी स्प्प्लाई चीन से एक केन्द्रीय मंत्री की कम्पनी की ही है ) या फिर योग दिवस की छातियाँ– उन्हें थोक में चीन से मंगवा कर थोक में माल काटते समय देश-प्रेम कहीं घुस जाता है, आम भारतीय बाजिब दाम में पर्व-त्यौहार मना सकें, उस समय स्वदेशी प्रेम का प्रोपेगंडा करने वाले आखिर उस समय क्यों नहीं विरोध करते, काश काने बाबा ने सरदार पटेल के प्रतिमा कनखल पतंजली में बनवाई होती।
– पंकज चतुर्वेदी की वॉल से







