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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    बहरे- गूँगों को जगाने की कोशिश है ट्रम्प पर हमला

    ShagunBy ShagunMay 2, 2026 Current Issues No Comments8 Mins Read
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    A Growing Crisis on the Path to Peace: Uncertainty Over Iran Ceasefire Amid Washington's Attacks on Trump
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    डा॰ गिरीश

    व्यवस्था जब अधिकाधिक अन्यायपूर्ण और अलोकतांत्रिक हो जाती है और उसके खिलाफ व्यापक जन-भागीदारी वाले आंदोलन शिथिल हो जाते हैं तो लोग उससे निजात पाने के लिये व्यक्तिवादी और अतिवादी रास्ते तलाशने लगते हैं। इतिहास ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा पड़ा है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर रात्रिभोज के दौरान वाशिंगटन के होटल हिल्टन में हुआ हमला भी ऐसी ही परिस्थितियों की देन है।

    यूं तो संयुक्त राज्य अमेरिका अपने आपको सुप्रीम डेमोक्रेसी होने का ढिंढोरा पीटता है, और दुनियां भर में डेमोक्रेसी के रक्षक के नाम पर खूनी खेल खेलता रहता है। लेकिन सच तो यह है कि लुटेरा साम्राज्यवाद अब लूट की अगली मंजिल- कार्पोरेट्स लूट तक जा पहुंचा है। और लूट की इस व्यवस्था को बनाये रखने को उसे कठोरतम शासन व्यवस्था को अपनाना होता है। यह स्थिति न केवल अमेरिका जैसे विकसित देशों में है, अपितु अनेक विकासशील देशों में भी विद्यमान है।

    हाल के दिनों में दुनियां आर्थिक मंदी की ओर बड़ी है, अतएव प्राक्रतिक संसाधनों की लूट और उन पर कब्जे का सवाल मुंह बायें खड़ा है, खास कर विकसित देशों के सामने जिनका चैंपियन अमेरिका है। हाल के दिनों में अमेरिका द्वारा उठाए गए कई कदम इसकी पुष्टि करने को पर्याप्त हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने देश और अपने कार्पोरेटी मित्रों को लाभ पहुँचाने के लिये अलग अलग बहाने लगा कर कई देशों के विरुद्ध नाकेबन्दी की और टैरिफ युद्ध छेड़ा। इसकी चपेट में न केवल ईरान, चीन, रूस जैसे देश आए अपितु भारत भी आया, जिसके प्रधानमंत्री ट्रंप को व्यक्तिगत मित्र बताते नहीं थकते और अमेरिका के सामने सरेंडर कर चुके हैं।

    गाज़ा में न्रशंस जनसंहार करने वाले इजरायल का अंध समर्थन, कच्चे तेल पर कब्जे के लिये संप्रभु देश वेनेज्वेला पर हमला कर वहाँ के राष्ट्रपति का अपहरण, रूस- यूक्रेन युद्ध में अपनाए गए दोगलापन और ईरान पर नितांत झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगाकर किए हमले और उसकी आड़ में अपने कार्पोरेट्स मित्रों को लाभ पहुंचाने जैसी कारगुजारियों से दुनियां भर में और स्वयं अमेरिका के अन्दर लोगों में उसके खिलाफ भारी गुस्सा है।

    साथ ही खुल कर अथवा छद्म रूप से ट्रंप के साथ खड़े देशों के शासकों और शासक वर्ग के विरुद्ध भी वहाँ के लोगों में भारी आक्रोश है। इस गुस्से का इजहार अलग अलग देशों में अलग अलग रूपों में देखने को मिल रहा है। कहीं जेन- जी आंदोलन भड़क रहे हैं तो कहीं मजदूर और किसानों के आंदोलन। लेकिन दुनियाँ का बड़ा भाग व्यापक भागीदारी वाले जनान्दोलनों से अछूता है।Preparations Underway for a Prolonged War! US Ferries Massive Military Hardware to West Asia, Planning Another Powerful Strike Against Iran.

    इसके अलावा दुनियां भर के शासक वर्ग की घनघोर अनैतिक, लंपटई और अय्याशी भरी कारगुजारियों ने भी लोगों में सत्तासीनों के प्रति गहरी नाराजगी पैदा की है। एप्स्टिन फायल प्रकरण इनमें से एक है। अधिकांश लोग मानते हैं कि 28 मार्च को अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर संयुक्त रूप से किया गया हमला एप्स्टिन फायल से ध्यान हटाने की गरज से किया गया। हमले से ऐन पहले भारत के प्रधानमंत्री की इजरायल यात्रा और अमेरिकी- इजरायली हमलों में ईरान के सुप्रीमो अयातुल्लाह खोमेनी और नेत्रत्व के अन्य लोगों की हत्या पर भारत सरकार द्वारा कई दिनों तक चुप्पी साधे रहना भारत के सत्ताधारियों को शक के कटघरे में खड़ा करता है।

    गत दिनों डोनाल्ड ट्रम्प पर हुआ हमला ऐसे हालातों के खिलाफ प्रस्फोट है, जिसका मकसद हत्या करना कम, लोगों को आगाह करना ज्यादा नजर आता है। हमें 31 वर्षीय हमलावर कोल टामस एलन के उस सन्देश पर गौर करना होगा जो उसने गोलीबारी करने से लगभग 10 मिनट पहले अपने परिवार के सदस्यों को भेजा था। इसमें उसने शिकारों के खिलाफ ‘पेडोफाइल, रेपिस्ट और गद्दार’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया था। ट्रंप के खिलाफ घोषणापत्र में कोल एलन ने सबसे पहले अपने द्वारा उठाए जा रहे कदम के लिए अपने माता पिता, अपने छात्रों, और लोगों से माफी मांगी और बताया कि उसके निशाने पर कौन कौन हैं।

    उसने लिखा, जानमाल का नुकसान कम से कम हो अतएव मैं गोलियों की जगह छर्रों का इस्तेमाल करूंगा। उसने आगे लिखा कि मैं अपने लक्ष्यों तक पहुँचने के लिये वहाँ मौजूद हर किसी को मार डालूँगा। क्योंकि वहाँ मौजूद ज़्यादातर लोगों ने एक बाल यौन शोषण करने वाले, बलात्कारी और देशद्रोही का भाषण सुनने का चुनाव किया है। और इस तरह वे भी इसमें शामिल हैं। लेकिन ऐसी नौबत नहीं आयेगी।

    उसके ये शब्द एप्स्टिन कांड और प्रभुत्वशाली लोगों द्वारा किये गये ऐसे ही कुक्रत्यों पर आक्रोश का इजहार हैं।

    निश्चय ही उसके आक्रोश के कारण व्यापक थे। वह आगे लिखता है कि मैं कोई स्कूली बच्चा नहीं हूं जिसे बम धमाके में उड़ा दिया गया हो। न ही कोई भूखा बच्चा हूं, न ही कोई किशोरी हूं जिसका इस प्रशासन के कई अधिकारियों ने शोषण किया हो। लेकिन जब कोई पीड़ित हो रहा हो, तो चुप रहना ईसाई व्यवहार नहीं है। यह उत्पीड़क के अपराधों में मिलीभगत है। कोल एलन के ये शब्द गाजा और ईरान में बच्चों, बच्चियों और मानवता पर ढाये जुल्मों पर गुस्से का इजहार हैं।Deadline Expires, Trump Now in ‘Action Mode’: Flatly Refuses to Extend Ceasefire

    गनीमत है कि कोल एलन टामस ईसाई है और उसने ईसाइयत के अन्याय के खिलाफ होने का उल्लेख किया। यदि वो मुसलमान होता तो निश्चय ही उसे इस्लामिक आतंकवादी करार तो दिया ही गया होता, ट्रंप की हत्या की साजिश का आरोप ईरान पर जड़ दिया जाता। भारत के गोदी मीडिया और वाट्सएप यूनिवर्सिटी ने भी आसमान सिर पर उठा दिया होता। मुसलमानों को आतंकवादी साबित करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी होती।

    अमेरिकी प्रशासन इस घटना को भले ही सुरक्षा में चूक बताये पर इसे मात्र सुरक्षा में चूक बता कर किनारे नहीं किया जा सकता। आरोपी भले ही सबको मार डालने की बात कहे पर उसके द्वारा गोली की जगह छर्रों का प्रयोग करना इस बात का प्रतीक है कि उसका इरादा हत्या करना नहीं था। अपितु उसका लक्ष्य ट्रंप प्रशासन द्वारा थोपे गये युद्धों, हत्याओं, बरवादी और यौन उत्पीड़न की कारगुजारियों पर सशक्त प्रतिक्रिया जाहिर करना था। एक ऐसे समय में जब इन अत्याचारों और अपराधों के विरोध में सशक्त आवाजें नहीं उठ रही हैं, कोल टामस एलन लोगों को झकझोरना चाहता था।

    अपने ऊपर लगे आरोपों पर ट्रम्प की प्रतिक्रिया उनकी ही कमजोरियों को उजागर करने वाली है। पत्रकार नोरा ओडोनल ने जब उनसे पूछा कि क्या कोल टामस एलन के आरोप उन्हीं की तरफ इशारा करते हैं। इस पर ट्रम्प बिफर गये, और कहा कि मैं न तो दुष्कर्मी हूं, न ही मैंने किसी से दुष्कर्म किया है। आपने एक बीमार आदमी की बकवास टीवी पर पढ़ दी। मुझे उन चीजों से जोड़ा गया जिनसे मेरा कोई लेना देना नहीं है। मुझे पहले ही पूरी तरह क्लीन चिट मिल चुकी है। मैं दुष्कर्मी नहीं हूं। वो बीमार आदमी है।

    ट्रम्प भले ही अपनी सफाई में कुछ भी कहें, लेकिन सारी दुनियाँ उनके चाल- चरित्र के बारे में अच्छी तरह से जानती है। एप्स्टिन फाइल के खुलासों के बाद तो कहने को कुछ भी बचा ही नहीं है। लेकिन जिस कोल टामस एलन को बीमार बता कर वे अपने को बेदाग साबित करना चाहते हैं, आइये उसके बारे में भी जान लेते हैं।

    अमेरिकी मीडिया के अनुसार एलन टामस नासा में काम कर चुका है। उसने साल 2014 में नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी में समर अंडर गेजुएट रिसर्च फ़ेलोशिप के तहत काम किया था। आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, बल्कि वह एक बेहद प्रतिभाशाली और उच्च शिक्षित पेशेवर है। उसने दुनियाँ के प्रतिष्ठित कैलिफोर्नियां इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक की डिग्री हासिल की है। पेशे से वह एक मेकैनिकल इंजीनियर, कंप्यूटर वैज्ञानिक और एक कुशल इंडी गेम डेवलपर है। उसने शिक्षक के रूप में भी काम किया है।

    एलन पर एक संघीय अधिकारी पर हमला करने और हिंसात्मक अपराध के दौरान आग्नेयास्त्र का उपयोग करने के आरोप लगाये गये हैं। मामला क्योंकि हाई प्रोफ़ायल है अतएव उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी। लेकिन इतिहास उसका मूल्यांकन एक ऐसे योद्धा के रूप में करेगा जिसने बहरे– गूँगों को जगाने की कोशिश की। मानवता के प्रति अपराध करने वालों के खिलाफ सशक्त प्रतिक्रिया दर्ज की।

    8 अप्रेल 1929 को शहीदे आजम भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने नेशनल असेंबली में उस समय बम फेंका था जब वायसराय ‘पब्लिक सेफ़्टी बिल’ पेश कर रहे थे। हम एलन टामस को भगत सिंह के समकक्ष रखने की जुर्रत कदापि नहीं कर सकते पर उसके इस कदम को उसे बीमार बता कर खारिज भी नहीं कर सकते। उसने हमले से पहले जो सन्देश दिया वह वैचारिक रूप से उतना सशक्त भले ही न जितना सशक्त सन्देश भगत सिंह ने दिया था, लेकिन दोनों के उद्देश्य में समानता के तत्व मौजूद हैं। वे तत्व हैं अन्याय के खिलाफ लोगों को चेताना।

    असेंबली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना’ की ओर से बांटे गये पर्चे में कहा था “बहरों को सुनाने के लिये बहुत ऊंची आवाज की आवश्यकता होती है,” प्रसिद्ध फ्रांसीसी अराजकतावादी शहीद वैलियाँ के यह अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं आदि आदि।

    उनके इस कार्य के लिये राज सत्ता ने उन्हें फांसी की सजा जरूर दी लेकिन इतिहास ने उन्हें शहीदे आजम के खिताब से नवाजा। राजसत्तायें अपने द्वारा गढ़े गये क़ानूनों के फ्रेमवर्क में सजायें मुकर्रर करती हैं, पर इतिहास का मूल्यांकन निरपेक्ष और व्यावहारिक होता है। एलन टामस पर भी अंतिम फैसला इतिहास सुनायेगा।

    डा. गिरीश, राष्ट्रीय सचिव, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी

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