टीवी एंकर-रिपोर्टर नेताओं की राजनीति पर कड़ी टिप्पणी करें, व्यंगात्मक टिप्पणी करें, आलोचना करें, निंदा करें वह उनका स्वाभाविक अधिकार भी है और कर्त्तव्य भी। लेकिन अगर किसी नेता की बोली, अंग्रेज़ी-हिंदी भाषा, शैली, वेशभूषा, रंग-रूप, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शिक्षा, आर्थिक स्थिति और प्रांतीयता के आधार पर ताना देते हैं तो उससे पूर्वाग्रह और घृणा ही स्पष्ट दिखती है।
राबड़ी देवी के ट्वीट का मज़ाक उड़ाने वाले आज तक के एंकर ने अपनी वर्गीय सोच ही उजागर की है। यह टिपिकल उत्तर भारतीय सवर्ण दंभ है जो बहुत निंदनीय है। इससे पहले एक एंकर हाल फिलहाल एक चुनावी कार्यक्रम में लालू प्रसाद यादव को ललुआ कह चुके हैं ।
विपक्ष के नेता आए-दिन तमाम एंकरों के व्यंग्य का निशाना बनते रहते हैं जबकि यही महान और तेज़ तर्रार पत्रकार बीजेपी के नेताओं और प्रवक्ताओं के आगे खीसें निपोरते रहते हैं। यह दिखाता है कि टीवी पर दिखने वाले पत्रकारों का एक बड़ा तबका किस हद तक पूर्वाग्रह का शिकार है। दिलचस्प बात यह है कि यही लोग निष्पक्ष पत्रकारिता के झंडाबरदार भी हैं।
- अमिताभ श्रीवास्तव की वॉल से







