रेप मामले पर उल्टा- पुल्टा बोलोगे तो फंसोगे ही! आखिर रेप या फिर गैंगरेप जैसे गंभीर मामले पर गलत बयानबाज़ी क्यों ? वह भी माननीय द्वारा! अभी बीते दिनों उत्तर प्रदेश के जल संसाधन, वन एवं पर्यावरण मंत्री ने कहा है कि छोटी बच्चियों के रेप में दिक्कत है, हां, शादीशुदा महिला के रेप की बात अलग है। कानपुर के सांसद ने तो यहां तक कह दिया है कि कानून उनके हाथ में होता तो रेप करने वाले को मार देते।
बलात्कार के मामलों में ऐसे अगंभीर और त्वरित बयानों से राजनेताओं के अगंभीर व्यक्तित्व का ही खुलासा होता है। ऐसे संवेदनशील मामलों में बयानबाजी भी संवेदनशील होकर ही की जानी चाहिए। कठुआ कांड के बाद नन्हीं बच्चियों के बलात्कार के मामलों में सरकार की तंद्रा टूटी थी। उसने ताबड़तोड़ आपराधिक न्याय संशोधन विधेयक पेश किया था, जिसे पिछले ही साल दोनों सदनों में पारित भी कर दिया गया। इसमें बारह से कम उम्र की बच्चियों के साथ रेप पर मौत की सजा का प्रावधान था। सोलह साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ रेप करने पर कम से कम 20 साल की सजा थी।
गैंग रेप के मामलों में भी न्यूनतम सजा बढ़ाई गई थी। जाहिर सी बात है कि छोटी बच्चियों के रेप के दोषियों को सजा होनी ही चाहिए। लेकिन फिर भी मौत की सजा से रेप रु कने वाले हैं, इस बात के अब तक कोई पुख्ता प्रमाण नहीं हैं। इसीलिए मौत की सजा को लेकर तमाम विरोध किए गए थे।
जस्टिस वर्मा कमिटी ने 2012 में साफ किया था कि मौत की सजा से कोई फायदा नहीं होने वाला। हां, त्वरित न्याय की प्रक्रिया जरूर लागू होनी चाहिए-जिसे फास्ट ट्रायल कहा जाता है। यह रेप के किसी एक तरह के मामले में नहीं, सभी मामलों में होना चाहिए। रेप इज अ रेप.. इसमें सख्त सजा होनी ही चाहिए-पीड़िता का आयु वर्ग चाहे जो हो।

अपराध किसी खास उम्र का होने पर किसी भी कोण से कम नहीं हो जाता। लेकिन न्याय व्यवस्था की विद्रूपता की अपनी कोई सीमा नहीं है। यहां कई बार न्याय पीड़ित और आरोपित के चरित्रों के आधार पर तय होता है। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली में एसो. प्रोफेसर मृणाल सतीश ने अपनी किताब ‘‘डिस्क्रिशन, डिस्क्रिमिनेशन एंड रूल ऑफ लॉ : रिफॉर्मिग रेप सेनटेंसिंग इन इंडिया’ में कई खुलासे किए थे। मृणाल का कहना था कि अगर रेप का आरोपित पीड़िता का जानकार है, तो अधिकतर उसे कम सजा, और अगर अजनबी है, तो अपेक्षाकृत अधिक सजा मिलती है। पीड़िता शादीशुदा है, और सेक्सुअली ऐक्टिव है तो भी आरोपित को आम तौर पर हल्की सजा देने की कोशिश की जाती है। मृणाल सतीश ने 1984 से 2009 के बीच उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के 800 मामलों का अध्ययन करने के बाद यह खुलासा किया था। जब उत्तर प्रदेश के जल संसाधन, वन एवं पर्यावरण मंत्री शादीशुदा औरतों के बलात्कार को ‘‘दूसरी’ बात कहते हैं, तो उनके दिलो-दिमाग में भी ऐसे ही भाव तैरते होंगे। जैसा कि मृणाल अपनी किताब में 1992 के मदन गोपाल कक्कड़ बनाम नवल दुबे के मामले का जिक्र करते हैं।
इस मामले में अदालत ने कहा था-उसकी जिंदगी में बारिश का मौसम नहीं आया था। यह रेप पीड़िता का उल्लेख था, जो शादीशुदा नहीं थी। मृणाल का कहना है कि कुमारियों के बलात्कार पर अदालतें अधिक कड़ी सजा देती हैं क्योंकि वे भी मानती हैं कि पीड़िता का कौमार्य भंग होना अपूरणीय क्षति है। शादीशुदा औरतों का क्या..मंत्री जी भी तो यही सोचते हैं। दूसरा बयान भी ऐसा ही अगंभीर था। रेप करने वालों को मार देने का। क्या ऐसा बयान देकर सांसद महोदय अधिक संवेदनशील हो गए हैं? कोई भी यही समझेगा। पर ऐसी तत्काल प्रतिक्रिया से न सिर्फ सांसद महोदय को, हम सबको बचना चाहिए।
हमारे चारों ओर यंतण्रा तथा अन्याय की इतनी कहानियां बिखरी हुई हैं कि हम इनकी परवाह भी नहीं करते। हमारे देश में औसतन हर घंटे करीब तीन बलात्कार होते हैं। इस लेख को लिखने के दौरान भी कहीं कोई लड़की परेशान की जा रही होगी। पर हमारी चुप्पी कायम रहती है। एक दिन अचानक उठकर उत्तेजित होने से ऐसा नहीं कि हम जीवन में कोई अन्याय होने ही नहीं देंगे।
सांसदों का जिम्मा कानून हाथ में लेना नहीं, कानून का सख्ती से पालन कराना होता है। अगर उनकी पार्टी के साथी कठुआ कांड में आरोपितों के समर्थन में आयोजित रैली में हिस्सा लेते हैं, तो सांसद महोदय का दामन भी दागदार होता है।सांसद महोदय कानून हाथ में नहीं ले सकते-लेकिन ऐसे बयान से एक मिसाल जरूर पेश करते हैं। अगर हममें से हर किसी ने सजा देने की अपनी शैली तय कर ली तो क्या होगा।
सजा देने की अपनी शैली के कारण मॉब लिचिंग जैसे परिणाम सामने आते हैं। आवारा भीड़ अपनी तरह से न्याय देने का काम करती है, और समाज में अन्याय का ही साम्राज्य कायम होता है। कहीं आवारा भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए-लोकतंत्र के नाश के लिए न कर लिया जाए-जैसा कि व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने 1991 में अपने निबंध में चेताया था। हमें यह भी समझना होगा। –माशा से साभार







